जब धरती पर जंगल नहीं थे, तब खड़ा था 26 फीट ऊंचा जीव: प्रोटो टैक्साइट्स की वैज्ञानिक कहानी

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जब धरती पर जंगल नहीं थे, तब खड़ा था 26 फीट ऊंचा जीव: प्रोटो टैक्साइट्स की वैज्ञानिक कहानी

New Delhi: पृथ्वी के इतिहास में डिवोनियन काल एक ऐसा दौर था जब जीवन धीरे-धीरे समुद्र से निकलकर जमीन पर फैल रहा था। यह समय लगभग 420 से 370 मिलियन वर्ष पूर्व का माना जाता है। उस समय न आज जैसे पेड़ थे, न जंगल और न ही जटिल स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र। ऐसे वातावरण में एक जीव ऐसा था जो आकार में बाकी सभी स्थलीय जीवों से कहीं बड़ा था। इस जीव का नाम है प्रोटो टैक्साइट्स (Prototaxites)

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डिवोनियन काल का सबसे विशाल स्थलीय जीव

प्रोटो टैक्साइट्स के जीवाश्म उत्तरी अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में पाए गए हैं। इन जीवाश्मों के अध्ययन से पता चलता है कि इसकी ऊंचाई लगभग 6 से 8 मीटर यानी करीब 20 से 26 फीट तक रही होगी। उस समय भूमि पर मौजूद अन्य पौधे कुछ सेंटीमीटर या अधिकतम कुछ फीट ऊंचे थे। इसलिए प्रोटो टैक्साइट्स को उस काल का सबसे ऊंचा और सबसे प्रभावशाली स्थलीय जीव माना जाता है।

यह पौधा क्यों नहीं था

प्रारंभिक शोध में प्रोटो टैक्साइट्स को एक विशाल पेड़ माना गया था, लेकिन बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस धारणा को खारिज कर दिया। इसके ऊतकों में न तो पत्तियों जैसी संरचना मिली और न ही प्रकाश संश्लेषण से जुड़े संकेत। इसके कार्बन आइसोटोप विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि यह सूर्य के प्रकाश से भोजन नहीं बनाता था, यानी यह पौधा नहीं हो सकता।

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वैज्ञानिक इसे क्या मानते हैं

आज की मुख्यधारा वैज्ञानिक सहमति के अनुसार प्रोटो टैक्साइट्स एक विशालकाय कवक (fungus) था। इसके अंदर की संरचना, तंतु जैसी बनावट और पोषण के तरीके आधुनिक कवकों से मेल खाते हैं, हालांकि इसका आकार आज के किसी भी ज्ञात कवक से कई गुना बड़ा था। कुछ वैज्ञानिकों ने इसे पूरी तरह अलग जीवन-रूप मानने का सुझाव दिया था, लेकिन वर्तमान में अधिकांश शोध इसे कवक समूह के अंतर्गत ही रखते हैं।

कैसे पोषण प्राप्त करता था

प्रोटो टैक्साइट्स प्रकाश संश्लेषण नहीं करता था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पदार्थों, सड़ते पौधों और सूक्ष्म जीवों से पोषण लेता था। इस कारण यह उस समय के पारिस्थितिकी तंत्र में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।

विलुप्ति का कारण

जैसे-जैसे डिवोनियन काल के बाद बड़े पेड़ विकसित हुए, जड़ तंत्र मजबूत हुआ, मिट्टी की संरचना बदली और पारिस्थितिकी अधिक प्रतिस्पर्धी बनी, प्रोटो टैक्साइट्स के लिए अनुकूल परिस्थितियां समाप्त होती चली गईं। बदलते पर्यावरण के साथ अनुकूलन न कर पाने के कारण यह जीव धीरे-धीरे विलुप्त हो गया।

यह खोज आज क्यों महत्वपूर्ण है

प्रोटो टैक्साइट्स का अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि स्थलीय जीवन का विकास क्रमिक और प्रयोगात्मक रहा है। आज जो पारिस्थितिकी हमें सामान्य लगती है, वह लाखों वर्षों के बदलाव का परिणाम है। आकार या प्रभुत्व स्थायित्व की गारंटी नहीं देता। यह हमें यह भी सिखाता है कि पृथ्वी पर जीवन के कई ऐसे रूप रहे हैं जो अपने समय में बेहद सफल थे, लेकिन पर्यावरण परिवर्तन के सामने टिक नहीं पाए।

और अंत में•••

प्रोटो टैक्साइट्स कोई रहस्यमयी चमत्कार नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्रारंभिक स्थलीय जीवन का एक प्रमाणित अध्याय है। यह दिखाता है कि प्रकृति में सफलता शक्ति से नहीं, बल्कि अनुकूलन से तय होती है। आज जब मानव स्वयं को सबसे शक्तिशाली प्रजाति मानता है, तब प्रोटो टैक्साइट्स का इतिहास हमें संतुलन और जिम्मेदारी की याद दिलाता है।