मोहन भागवत का जनसंख्या पर बड़ा बयान: 19 से 25 वर्ष में विवाह और तीन बच्चों पर दिया जोर

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मोहन भागवत का जनसंख्या पर बड़ा बयान: 19 से 25 वर्ष में विवाह और तीन बच्चों पर दिया जोर

Mumbai: देश में जनसंख्या, परिवार और सामाजिक संतुलन को लेकर चल रही बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में विवाह की उम्र, बच्चों की संख्या और जनसंख्या वृद्धि दर को लेकर अपनी स्पष्ट राय रखी। अपने संबोधन में उन्होंने कहा किवे जनसंख्या को केवल आंकड़ों के नजरिये से देखना सही नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक, पारिवारिक और स्वास्थ्य से जुड़े प्रभावों को भी समझना जरूरी है। डॉ भागवत के अनुसार संतुलित जनसंख्या ही समाज और राष्ट्र की दीर्घकालिक मजबूती की आधारशिला होती है।

● 19 से 25 वर्ष में विवाह और तीन बच्चों का सुझाव

डॉ मोहन भागवत ने कहा कि 19 से 25 वर्ष की आयु के बीच विवाह होना चाहिए और दंपती के तीन बच्चे होने चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों की मान्यता है कि इस आयु वर्ग में विवाह और संतुलित परिवार से माता पिता के साथ साथ बच्चों का स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है। उनके अनुसार यह विषय केवल निजी निर्णय का नहीं, बल्कि समाज के दीर्घकालिक हित से जुड़ा हुआ है।

● तीन भाई बहनों से बेहतर तालमेल और पारिवारिक स्थिरता

उन्होंने परिवार की संरचना पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि जब परिवार में तीन भाई बहन होते हैं, तो बच्चों के बीच आपसी समझ, सहयोग और सामंजस्य बेहतर विकसित होता है। इससे बच्चों में साझा जिम्मेदारी की भावना आती है और भविष्य में पारिवारिक बंटवारे, संपत्ति विवाद और आपसी टकराव की आशंका कम हो जाती है।

● एक बच्चा नीति को नकारा

डॉ मोहन भागवत ने एक बच्चा नीति को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि यदि किसी समाज या देश की जनसंख्या वृद्धि दर 2.3 से नीचे चली जाती है, तो इसे विकास का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। उनके अनुसार यह स्थिति सामाजिक और आर्थिक गिरावट की ओर इशारा करती है, क्योंकि इससे कार्यशील आबादी घटती है और सामाजिक संतुलन कमजोर होता है।

● गिरती जनसंख्या से पैदा होने वाले खतरे

उन्होंने कहा कि कई देशों में जनसंख्या घटने के कारण श्रमबल की कमी, बुजुर्गों की देखभाल और सामाजिक ढांचे से जुड़ी गंभीर समस्याएं सामने आई हैं। भारत को ऐसी परिस्थितियों से सबक लेते हुए जनसंख्या संतुलन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

● जनसंख्या नहीं, संतुलन असली मुद्दा

डॉ मोहन भागवत ने कहा कि जनसंख्या स्वयं में समस्या नहीं है, असली चुनौती उसका संतुलन बनाए रखने की है। एक युवा, सक्रिय और जिम्मेदार समाज ही किसी भी देश की वास्तविक ताकत होता है। उनके इस बयान को विवाह, परिवार और जनसंख्या नीति को लेकर व्यापक सामाजिक विमर्श के रूप में देखा जा रहा है।