सुप्रीम कोर्ट ने सबक सिखाया ‘घूसखोर पंडित सोच’ को…

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सुप्रीम कोर्ट ने सबक सिखाया ‘घूसखोर पंडित सोच’ को…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

पंडितों और ब्राह्मणों को गाली देकर संतुष्टि पाने वालों को सुप्रीम कोर्ट ने करारा तमाचा मारा है। पूरे देश में इस तरह का प्रोपेगंडा चल रहा है, जिसमें जिसके मन में जो भी कचरा जमा है, वह ब्राह्मण और पंडित जैसे शब्दों का उपयोग कर बिना किसी तनाव के फेंक सकता है। फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के टाइटल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने नीरज पांडे, केंद्र सरकार और सीबीएफसी को नोटिस जारी कर फिल्म की रिलीज पर सवाल उठाए हैं। साथ ही एक आदेश भी दे डाला है। मनोज बाजपेयी स्टारर फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ विवादों में फंसी हुई है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिल्ममेकर नीरज पांडे की फिल्म के टाइटल को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि किसी समाज के एक वर्ग को इस तरह के नाम से क्यों बदनाम किया जा रहा है?

सबसे बड़ी बात यह है कि टाइटल तय करने के समय क्या यह बात पांडे के जेहन में नहीं थी। और अगर थी, तो फिर यह टाइटल जानबूझकर तय किया गया है, ताकि फिल्म विवादों में आकर अच्छा राजस्व अर्जित कर सके। और शायद पांडे, बाजपेयी यह भूल गए कि अब ऐसी सड़ी गली मानसिकता के दिन नहीं रहे। पंडित होकर पंडितों को ही कोसकर, घूसखोर बताकर पांडे, वाजपेयी यह सोच रहे होंगे कि ब्राह्मण एकजुट नहीं है इसको ही आसानी से टारगेट किया जा सकता है। और निर्माता और अभिनेता भी पंडित ही हैं तो फिर किसकी हिम्मत जो इन पर पलटवार कर यह बता सके कि ऐसे निर्माता अभिनेता की सोच ही करप्ट हो गई है। और ऐसी ही स्वच्छन्दिता ने देश में वैमनस्यता को शीर्ष पर पहुँचा दिया है। इनकी सोच भी इतनी गिरी हुई है कि पैसा कमाने के लिए इन्होंने अपनी जाति को ही पूरी तरह से कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब सुप्रीम कोर्ट की दो टूक सामने आ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सोच रखने वालों पर शिकंजा कस दिया है। सुनवाई के वक्त सुप्रीम कोर्ट ने नीरज पांडे से पूछा, “आप किसी समाज के हिस्से को ऐसे शब्दों से क्यों नीचा दिखाना चाहते हैं?” कोर्ट ने ये भी कहा कि फिल्म का टाइटल नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ लगता है। कोर्ट ने नीरज पांडे को निर्देश दिया है कि वे एक हलफनामा दाखिल करें, जिसमें ये साफ तौर पर बताया जाए कि फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ किसी भी समाज या वर्ग का अपमान नहीं करती है। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “जब तक आप हमें ये नहीं बताते कि फिल्म का नाम बदला गया है, तब तक हम इसे रिलीज करने की अनुमति नहीं देंगे।” अब इस मामले में अगली सुनवाई 19 फरवरी को होगी। तब तक देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की नसीहत का पांडे वाजपेयी की सोच पर कितना असर पड़ता है। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने मौखिक रूप से कहा- ये नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है। जागरूक होना अलग बात है, लेकिन देश में पहले से ही अशांति का माहौल है, ऐसे में इस तरह की अशांति पैदा करना ठीक नहीं है। उन्होंने आगे कहा, “हमें लगता था कि फिल्ममेकर, पत्रकार और अन्य लोग जिम्मेदार होते हैं और वो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और उस पर लगने वाली उचित सीमाओं को समझते हैं। आप हमें बताइए कि टाइटल बदलने के लिए क्या नाम सुझा रहे हैं।”

आखिरकार, ऐसे निर्माता इन्हें समाज में यह नजर नहीं आ रहा है कि भ्रष्टाचार का दायरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है और

किसी वर्ग विशेष से जोड़कर इसे अब कतई नहीं देखा जा सकता है। बेहतर होता कि वह भ्रष्टाचार के मामलों का विश्लेषण ही कर लेते हैं, तो शायद यह समझ सकते और तब सुप्रीम कोर्ट को निर्माता पत्रकार पर यह अपमानजनक टिप्पणी नहीं करनी पड़ती। फिलहाल, तो यह देखने की बात है कि अब

फिल्म निर्माता को क्या टाइटल रास आता है…सुप्रीम कोर्ट ने ‘घूसखोर पंडित सोच’ को सबक तो सिखा ही दिया है…।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।