
Opposition Attitute:क्या विपक्ष की विश्वसनीयता घटा रहे हैं राहुल
रमण रावल
कांग्रेस व गैर भाजपाई विपक्ष भले ही यह सोचे कि उन्होंने 2014 के बाद से ही कभी-भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैन से नहीं बैठने दिया तो वे इससे फुल कर कुप्पा हो सकते हैं, लेकिन विपक्ष इस बात को भूल रहा है कि इस फुग्गे की हवा जनता हर बार मतदान की सूई चुभोकर निकाल देता है। इस आत्ममुग्ध विपक्ष की अगुवाई व रहनुमाई कर रहे राहुल गांधी अपने प्रत्येक क्रियाकलाप से लोकतंत्र के तड़के में नमक की भूमिका रखने वाले विपक्ष की साख की परवाह किये बिना तरकारी से अधिक नमक डालने से बाज ही नहीं आ रहे। आप ही सोचिये कि इस तरकारी को थू-थू कर थाली से हटा देने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचता है। संसद के वर्तमान बजट सत्र में एक बार फिर विपक्ष सिर्फ शोर मचा कर,अपनी हर बात,हर हाल में सुनाने की खातिर बाल हठ की तरह अड़ा है,जिसमें जनता सीधा हस्तक्षेप तो नहीं कर सकती, लेकिन जब उसकी बारी आयेगी, तब वह पूर्व नतीजों को दोहराने से परहेज नहीं करेगी।
मैं यहां राहुल गांधी की बात इसलिये कर रहा हूं कि वे देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के प्रतिनिधि होने के साथ इस समय नेता प्रतिपक्ष भी हैं। उनके परिवार में तीन प्रधानमंत्री हुए तो उनकी माताजी यूपीए सरकार में सुपर पीएम के रूतबे का लुत्फ उठा चुकी हैं। यह वो परिवार है, जिसके वर्तमान संसद में तीन सासंद हैं । इन सब बातों से जैसे राहुल को कोई लीजे-दीजे ही नहीं है। वे कांग्रेस के मुखिया रहकर अपनी पार्टी का कोई भला नहीं कर सके तो अब नेता प्रतिपक्ष के तौर पर उनसे जिम्मेदारीपूर्ण आचरण की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ?
यह कोई पहला मौका नहीं है, जब राहुल के रवैये ने संसद व लोकतंत्र की गरिमा को आघात पहुंचाया है। वे अपनी ही सरकार के अध्यादेश की प्रति संसद में फाड़कर फेंक चुके हैं। वे प्रधानमंत्री जैसे सम्मानित पद पर बैठे व्यक्ति को वोट चोर कहते हैं। वे उन्हें तू-तुकारे से संबोधित करते हैं, भले ही वह कोई चुनावी सभा हो। वे पचासों बार कह चुके हैं कि नरेंद्र मोदी मुझसे डरता है। जब वे ऐसा बोलते हैं, तब न तो संवैधानिक पद की मर्यादा को मानते हैं, न ही अपने से करीब 20 बरस बड़े एक बुजुर्ग के सम्मान का ध्यान रखते हैं।
इस समय राहुल गांधी पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की आने वाली पुस्तक के एक अंश पर संसद में बहस करना चाहते हैं, सरकार को घेरना चाहते हैं, प्रधानमंत्री से जवाब चाहते हैं। वे दावा भी करते हैं कि उन्हें बोलने से कोई नहीं रोक सकता और वे संसद के भीतर ऐसा कर दिखाते हैं, जब किसी अप्रकाशित पुस्तक पर चर्चा का प्रावधान न होने के आधार पर लोकसभाध्यक्ष बोलने की अनुमति नहीं देते। कांग्रेस समेत विपक्ष हंगामा करता है और कुछ सासंद लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में बलात घुसकर उनसे अभद्रता करते हैं। इससे पहले कुछ महिला सासंद प्रधानमंत्री की सीट को घेर कर खड़ी हो जाती हैं, ताकि वे निर्बाध वहां तक पहुंच नहीं सके। वे सूचना मिलने पर नहीं आते, यह और बात है।
इस पूरे मसले पर उल्लेखनीय बात यह है कि राहुल जिस पुस्तक में चीनी टैंकों के भारत की सीमा में घुस आने या उस तरफ बढ़ने के दावे की बात कह रहे हैं, वह पुस्तक लेखक व प्रकाशक के कथन के अनुसार तो प्रकाशित हुई ही नहीं है। तब दावा कैसा ? यदि यह मान भी लिया जाये कि जब पुस्तक आयेगी और उसमें ऐसी किसी घटना का उल्लेख होगा भी तो सवाल यह है कि यदि सीमा पर दुश्मन कोई बेजा हरकत करता है तो उसे आगे बढ़ने नहीं देना महत्वपूर्ण है या ऐसी किसी भी बात पर संपूर्ण युद्ध छेड़ देना ही एकमात्र विकल्प है ? कथित पुस्तक के ही अनुसार यदि प्रधानमंत्री ऐसे हालात में सेनाध्यक्ष को कहते हैं कि वे जो उचित समझें वह करें तो यह अनिश्चय है या सेना पर भरोसा कि वह मोर्चे की स्थिति के मुताबिक फैसला लेने के लिये स्वतंत्र है । इससे पहले तो सेना को पीछे हट जाने या मुकाबला न करने की हिदायतें दी जाती रही हैं। राहुल भूल रहे हैं कि विभाजन के तत्काल बाद पाक अधिकृत कश्मीर में घुस चुकी भारतीय सेना पर युद्ध विराम लाद दिया गया था। 1962 में वायुसेना को हमले से रोक दिया गया था। 1971 में हमारे दर्जन भर सैनिक वापस लिये बिना 90 हजार पाकिस्तानी सैनिक छोड़ दिये गये थे। क्या राहुल की समझ के हिसाब से सीमा पर विरोधी पक्ष के आचरण का प्रतिरोध किया जाये,रोका जाये,उसे कदम पीछे लेने को बाध्य कर दिया जाये वह सही है या सीधे परमाणु बम डाल देना ही उपाय है ?
यह भी समझ से परे है कि बजट सत्र में देश की आर्थिक नीतियों पर कोई बात नहीं की जा रही । स्वयं की पार्टी की रीति-नीति से देश को क्या फायदा हुआ था और अब क्या नुकसान हो रहा है, यह नहीं बताया जा रहा । दुनिया में भारतीय अर्थ व्यवस्था की मजबूती के चर्चे नहीं किये जा रहे। विपक्ष को यह सम्मानजनक नहीं लगता कि उनका अपना देश चौथी प्रमुख अर्थ व्यवस्था बन गया, जिसे बाबा-भभूति,सांपों का देश कहा जाता था। राहुल कभी आर्थिक मामलों में तार्किक,तुलनात्मक और तथ्यपूर्ण बातें नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें आर्थिक मामलों की समझ ही शायद नहीं है। इसीलिये वे ट्रम्प की भाषा बोलते हैं कि भारत की अर्थ व्यवस्था मृत हो चुकी है । वे ट्रम्प के टैरिफ को पुरानी स्थिति में लौटने का जिक्र नहीं करते। वे संयुक्त बयान जारी करने का भी इंतजार नहीं करते, क्योंकि वे ऐसे विषयों की गहराई में जाने का माद्दा ही नहीं रखते । इसलिये, वे गली-मोहल्ले के क्रिकेट प्रेमियों की तरह टिप्पणी कर देते हैं कि धोनी या विराट को यह बेवकूफी भरा शॉट नहीं खेलना था।
दरअसल, राहुल की मजबूरी यह है कि वे सलाहकारों के बंधक हैं। वे स्वतंत्र सोच रखते हों, ऐसा कभी नहीं लगा। स्वयं के सोच में गंभीरता होती है,तथ्य होते हैं। भड़ास नहीं होती। शेष विपक्ष उनके पीछे इसलिये खड़़ा हो जाता है कि ज्यादातर विपक्षी दल भी कांग्रेस की ही तरह पारिवारिक विरासत की तरह चलाये जा रहे हैं। उनके नेतृत्वकर्ताओं का भी कोई मौलिक सोच नहीं है। इसलिये वे कभी जातिवाद,कभी अगड़़ा-पिछड़ा, कभी अल्पसंख्यक,कभी हिंदू विरोधी बयानबाजी कर अपने वोट बैंक का भावनात्मक शोषण कर उन्हें उकसाते रहते हैं। वे भी चाहते हैं कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस का कबाड़ा होता रहे, ताकि वे अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में भाजपा से सीधे मुकाबला करते रहे, लेकिन कांग्रेस की घुसपैठ न होने पाये। राहुल लोकतांत्रिक व्यवस्था की सलामती चाहने वालों की भावनाओं पर भी कुठाराघात कर रहे हैं । वे अपने उलजलूल बयानों से, संसद न चलने देकर, देश की सरकार को अस्थिर करने के लिये विदेशी ताकतों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष बल देकर अपने लिये ही खाई को गहरा कर रहे हैं।





