विश्वबोध की काव्य चेतना पर राष्ट्रीय विमर्श: नरेश मेहता की जयंती पर संगोष्ठी सम्पन्न

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विश्वबोध की काव्य चेतना पर राष्ट्रीय विमर्श: नरेश मेहता की जयंती पर संगोष्ठी सम्पन्न

UJJAIN : भारतीय सांस्कृतिक चेतना, वैदिक संवेदना और आधुनिक बौद्धिक दृष्टि के अद्वितीय संगम के रूप में प्रतिष्ठित प्रख्यात कवि एवं कथाकार Naresh Mehta की जयंती के अवसर पर Samrat Vikramaditya University में उनके साहित्यिक अवदान पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का गरिमामय आयोजन किया गया। हिंदी अध्ययनशाला एवं प्रेमचंद सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस अकादमिक आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों ने नरेश मेहता की काव्य दृष्टि, दार्शनिक गहराई और समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीर विचार-विमर्श किया। वक्ताओं ने उनके साहित्य को व्यापक विश्वबोध और मानवीय संभावनाओं का सशक्त दस्तावेज बताया।

▪️व्यापक विश्वबोध की कविता

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि नरेश मेहता की रचनाओं से गुजरना चिर प्रतिष्ठित दृष्टि और व्यापक विश्वबोध से साक्षात्कार करना है। वे हिंदी के उन विशिष्ट कवियों में हैं जिन्होंने अपने युग, परिवेश और समाज से संवाद करते हुए जीवन के शाश्वत प्रवाह को आत्मसात किया।

उन्होंने कहा कि नरेश मेहता की काव्यधारा में प्रसाद, निराला और महादेवी की परंपरा की गूंज सुनाई देती है। उनकी रचनाएं भारतीय काव्य परंपरा, वैदिक ऋचाओं, आरण्यक संस्कृति और औपनिषदिक चिंतन से जीवन का सार ग्रहण करती हैं। मनुष्य की संभावनाओं में उनका अटूट विश्वास उनकी कविताओं को विशिष्ट ऊंचाई प्रदान करता है।

 

▪️भाषा और शोध की दिशा

मुख्य अतिथि पूर्व कुलपति प्रो. अशोक सिंह, वाराणसी ने अपने संबोधन में नई पीढ़ी के शोधार्थियों को भाषा पर सशक्त अधिकार स्थापित करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अपने विषय को अन्य विषयों के साथ जोड़कर अध्ययन करने से नई संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। प्रयोजनमूलक हिंदी, पत्रकारिता, साक्षात्कार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसे क्षेत्रों में भी साहित्यिक दृष्टि का विस्तार आवश्यक है।

उन्होंने नरेश मेहता के साहित्य को स्मरण करते हुए उसे प्रेरणा और बौद्धिक ऊर्जा का स्रोत बताया।

 

▪️वैदिक काव्य परंपरा

ललित कला विभागाध्यक्ष प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा ने कहा कि नरेश मेहता के काव्य को वैदिक कविता की संज्ञा दी जाती है। उनकी रचनाओं में आध्यात्मिक ऊँचाई और मानवीय संवेदना का समन्वय दृष्टिगोचर होता है। उनकी अनेक कहानियां और उपन्यास आज भी अध्ययन और विमर्श के केंद्र में हैं।

प्राचार्य प्रो. दिग्विजय सिंह, बलिया (उत्तर प्रदेश) ने विद्वान केशवप्रसाद मिश्र और नरेश मेहता के साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डालते हुए उनके योगदान को महत्वपूर्ण बताया।

 

▪️प्रास्ताविक और काव्य पाठ

प्रेमचंद सृजन पीठ के अध्यक्ष श्री मुकेश जोशी ने प्रास्ताविक वक्तव्य में संगोष्ठी की रूपरेखा एवं उद्देश्य स्पष्ट किए। उन्होंने कहा कि नरेश मेहता का साहित्य भारतीय चिंतन की गंभीर परंपरा का प्रतिनिधि है।

विशिष्ट अतिथि प्रो. प्रकाश उपाध्याय, भोपाल ने अपने गीत एवं कविताओं का सस्वर पाठ कर वातावरण को साहित्यिक गरिमा से भर दिया।

▪️सम्मान और समापन

कार्यक्रम के दौरान प्रो. अशोक सिंह को अंगवस्त्र, पुष्पमाल एवं साहित्य भेंट कर सारस्वत सम्मान प्रदान किया गया। प्रारंभ में अतिथियों ने वाग्देवी एवं Munshi Premchand के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

संगोष्ठी का संचालन शोधार्थी पूजा परमार ने किया तथा आभार प्रदर्शन प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।