कटनी के पूर्व एसपी अभिजीत कुमार रंजन पर विभागीय जांच की आहट: फाइल सीएम कार्यालय में लंबित

प्रशासनिक गलियारों में हलचल, राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा तेज

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कटनी के पूर्व एसपी अभिजीत कुमार रंजन पर विभागीय जांच की आहट: फाइल सीएम कार्यालय में लंबित

Bhopal/Jabalpur: कटनी जिले के पूर्व पुलिस अधीक्षक अभिजीत कुमार रंजन से जुड़ा मामला अब केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रदेश की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा विषय बन गया है। गृह विभाग से अग्रेषित विभागीय जांच की फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय में लंबित बताए जाने के बाद से शासन और पुलिस महकमे के भीतर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। सूत्रों का कहना है कि प्रारंभिक जांच और तथ्यात्मक प्रतिवेदन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन अंतिम निर्णय शीर्ष स्तर पर होना शेष है।

इस घटनाक्रम ने यह प्रश्न भी खड़ा किया है कि संवेदनशील मामलों में निर्णय की समयसीमा क्या होनी चाहिए और लंबित फाइलों पर देरी के क्या प्रशासनिक कारण हैं। पूरे मामले पर राजनीतिक हलकों में भी नजर रखी जा रही है, क्योंकि यह प्रकरण सीधे तौर पर कानून व्यवस्था और वरिष्ठ प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।

 

● क्या है पूरा विवाद, कैसे शुरू हुआ घटनाक्रम

मामले की जड़ कटनी में उस कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़ी है, जब अभिजीत कुमार रंजन जिले के पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थ थे। तत्कालीन सीएसपी ख्याति मिश्रा के पति और तहसीलदार शैलेंद्र बिहारी शर्मा ने आरोप लगाया कि उनके निवास पर पुलिस टीम ने दबिश दी। शिकायत में दावा किया गया कि कार्रवाई के दौरान परिवार के सदस्यों के साथ अभद्रता हुई और महिलाओं तथा एक आठ वर्षीय बच्चे के साथ मारपीट की गई।

आरोप यह भी है कि यह कदम सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत नहीं बल्कि वरिष्ठ स्तर के निर्देश पर उठाया गया। घटना के बाद मामला तेजी से सार्वजनिक चर्चा में आया और विभिन्न मंचों पर इसकी प्रतिक्रिया देखने को मिली। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए शासन स्तर पर संज्ञान लिया गया और प्रारंभिक जांच के आदेश दिए गए।

 

● मुख्यमंत्री के निर्देश और प्रशासनिक फेरबदल

घटनाक्रम के सामने आने के बाद 1 जून 2025 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से तत्कालीन एसपी को हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद अभिजीत कुमार रंजन को भोपाल स्थित पुलिस मुख्यालय में एआईजी पद पर अटैच कर दिया गया।

इस निर्णय को तत्कालीन परिस्थिति में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और प्रशासनिक संतुलन बनाए रखने की कार्रवाई के रूप में देखा गया। हालांकि, इसके बाद भी शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि विभागीय जांच की औपचारिक प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ी, जिससे मामले ने नया मोड़ लिया।

 

● अधिवक्ता का पत्र, लंबित फाइल और नए आरोप

जबलपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ता देवेंद्र शर्मा द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में कई गंभीर बिंदु उठाए गए हैं। पत्र में दावा किया गया है कि पुलिस मुख्यालय और अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह के स्तर से विभागीय जांच की फाइल लगभग तीन माह पूर्व मुख्यमंत्री कार्यालय भेजी जा चुकी है, लेकिन उस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

शिकायतकर्ता ने आशंका जताई है कि प्रभाव के उपयोग से फाइल लंबित रखी जा रही है। साथ ही अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए संभावित दबाव या षड्यंत्र की आशंका भी जाहिर की गई है।

इसके अतिरिक्त, अखिल भारतीय सिविल सेवा आचरण नियमों के उल्लंघन से जुड़े आरोप भी लगाए गए हैं। सेवा अवधि के दौरान अर्जित कथित संपत्ति की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग भी पत्र में की गई है।

 

● प्रारंभिक जांच में क्या सामने आया

सूत्रों के अनुसार जबलपुर रेंज स्तर पर की गई प्रारंभिक जांच में कुछ आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाया गया है। संबंधित रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय को भेजी गई, जिसके आधार पर विस्तृत तथ्यात्मक प्रतिवेदन तैयार कर गृह विभाग को अग्रेषित किया गया।

बताया जा रहा है कि इस रिपोर्ट में घटना की परिस्थितियों, पुलिस कार्रवाई की वैधानिकता और शिकायतकर्ता के आरोपों की जांच का उल्लेख है। अब अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री कार्यालय के स्तर पर लंबित है, जिसके बाद ही विभागीय जांच की औपचारिक दिशा तय होगी।

● संभावित कार्रवाई और आगे की दिशा

यदि प्रस्तावित विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होते हैं तो सेवा नियमों के तहत वेतन वृद्धि रोकने, पदावनति, निलंबन या सेवा से पृथक्करण जैसी कार्रवाई संभव है। हालांकि अंतिम निर्णय विस्तृत जांच और शासन के विचार-विमर्श के बाद ही होगा।

फिलहाल मामला संवेदनशील स्थिति में है। शिकायतकर्ता पक्ष त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई की मांग कर रहा है, जबकि अधिकारी पक्ष की ओर से अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब सबकी नजर मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्णय पर टिकी है, जिससे स्पष्ट होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई किस दिशा में आगे बढ़ती है।