
बजट पर ‘छोरा-छोरी’ टिप्पणी से बवाल: विधायक के बयान पर राजनीति गरमाई
Jaipur: राजस्थान विधानसभा में बजट पर चर्चा के दौरान वैर (भरतपुर) से भाजपा विधायक बहादुर सिंह कोली की एक टिप्पणी ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया। सरकार के बजट की तुलना “लड़के के जन्म” से और पिछली कांग्रेस सरकार के बजट की तुलना “लड़की के जन्म” से करने वाला उनका बयान सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर विधानसभा तक तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। विधायक ने कहा कि वर्तमान सरकार का बजट “छोरा पैदा होना” जैसा है, जबकि पूर्ववर्ती सरकार का बजट “छोरी पैदा होना” जैसा था। इस टिप्पणी को विपक्ष ने महिलाओं के प्रति अपमानजनक और भेदभावपूर्ण बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।
*● क्या कहा विधायक ने*
विधानसभा में बोलते हुए कोली ने राज्य सरकार के बजट को विकासोन्मुख बताते हुए उसकी तुलना “छोरा पैदा होने” से की। उन्होंने कहा कि सरकार के पहले, दूसरे और तीसरे बजट भी इसी तरह के रहे हैं, जबकि पूर्व सरकार के बजट को उन्होंने चुनावी और लोकलुभावन करार दिया। उनकी इस टिप्पणी का वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। बड़ी संख्या में लोगों ने इसे लैंगिक असमानता को बढ़ावा देने वाली सोच बताया।
*● विपक्ष का तीखा हमला*
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने इस बयान को “महिला-विरोधी और पितृसत्तात्मक मानसिकता” का उदाहरण बताया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी की मांग करते हुए कहा कि बेटा-बेटी के आधार पर किसी नीति या बजट की तुलना करना संकीर्ण सोच को दर्शाता है और समाज में गलत संदेश देता है। जूली ने कहा कि आज के दौर में जब बेटियों को समान अवसर देने और लैंगिक समानता की बात हो रही है, तब इस तरह की भाषा बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।
*● विधायक का बचाव*
विवाद बढ़ने के बाद भी कोली अपने बयान पर कायम रहे। उनका कहना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा और यह ब्रज क्षेत्र में प्रचलित सामान्य मुहावरा है, जिसका अर्थ केवल “बेहतर” और “कमतर” से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि उनका उद्देश्य केवल वर्तमान बजट की प्रशंसा करना था, न कि किसी का अपमान करना।
*● राजनीतिक संदर्भ से बढ़ी संवेदनशीलता*
इस बार राज्य का बजट उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री दीया कुमारी ने प्रस्तुत किया था, जो स्वयं महिला नेता हैं। ऐसे में बेटा-बेटी की तुलना वाला बयान और अधिक विवादास्पद हो गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा जैसे संवैधानिक मंच पर इस्तेमाल की गई भाषा का प्रभाव व्यापक होता है, इसलिए इस टिप्पणी को गंभीरता से लिया जा रहा है।
*● सोशल मीडिया और संगठनों की प्रतिक्रिया*
घटना के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। महिला संगठनों, छात्र समूहों और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बयान की आलोचना करते हुए इसे 21वीं सदी में भी बेटियों को कमतर समझने वाली मानसिकता का प्रतीक बताया। कई पोस्ट में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों का हवाला देते हुए जनप्रतिनिधियों से संवेदनशील भाषा के प्रयोग की अपेक्षा जताई गई।
*● क्यों बढ़ा विवाद*
भारत में लिंग समानता आज एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा है। ऐसे में किसी सार्वजनिक प्रतिनिधि द्वारा बेटा-बेटी के आधार पर श्रेष्ठता का संकेत देने वाली तुलना तुरंत संवेदनशील बन जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक मंचों पर कही गई बातें केवल राजनीतिक बयान नहीं रहतीं, बल्कि सामाजिक सोच को भी प्रभावित करती हैं।
यह विवाद केवल एक टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भाषा, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के प्रश्न को सामने लाता है। एक पक्ष इसे स्थानीय बोलचाल का मुहावरा बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे महिलाओं के सम्मान और समानता से जुड़ा मुद्दा मान रहा है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या विधायक भविष्य में अपने बयान पर पुनर्विचार करेंगे या राजनीतिक दबाव के बावजूद उसी पर कायम रहेंगे।




