
आत्महत्या के मामले में मध्यप्रदेश देश के शीर्ष 3 राज्यों में; पिछले 2 वर्षों में आत्महत्या के 32,000 से अधिक केस दर्ज
वरिष्ठ पत्रकार के के झा की रिपोर्ट
भोपाल | मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान गुरुवार को प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों ने राज्य की सामाजिक और मानसिक स्थिति को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है। सरकार द्वारा लिखित उत्तर में बताया गया कि 13 दिसंबर 2023 से 20 जनवरी 2026 के बीच राज्य में 32,385 लोगों ने आत्महत्या की। यानी औसतन प्रतिदिन लगभग 44 लोग इस भयावह कदम को उठा रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या करने वालों में युवाओं और छात्रों की संख्या सबसे अधिक रही। इस अवधि में 987 छात्रों ने आत्महत्या की — जो औसतन प्रतिदिन एक से अधिक छात्र की मौत दर्शाता है। यह तथ्य राज्य की शिक्षा व्यवस्था, प्रतिस्पर्धात्मक दबाव और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की स्थिति भी चिंताजनक रही। आंकड़ों के अनुसार: 667 कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की 562 पंजीकृत किसानों ने अपनी जान ली
इस प्रकार कुल 1,229 लोग सीधे या परोक्ष रूप से कृषि क्षेत्र से जुड़े थे। जबकि मध्यप्रदेश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, ऐसे में यह आंकड़ा अत्यंत गंभीर माना जा रहा है।
यदि मध्य प्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत दो वर्षीय आंकड़ों को देखा जाए, तो मध्यप्रदेश आत्महत्या के मामलों में देश के शीर्ष तीन राज्यों में बना हुआ है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की नवीनतम उपलब्ध रिपोर्ट (2023) के अनुसार मध्य प्रदेश देश में वर्ष 2023 में 18000 से अधिक आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, देश में आत्महत्या के सबसे अधिक 22000 + मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए। वहीं तमिलनाडु, 19,000 + आत्महत्याओं के साथ देश में दूसरे स्थान पर है। पश्चिम बंगाल लगभग 15,000+ आत्महत्याओं के साथ चौथे तथा कर्नाटक लगभग 14,000+ आत्महत्याओं के साथ देश में पांचवें स्थान पर है।
जनसंख्या के अनुपात (Suicide Rate per lakh population) के आधार पर भी मध्यप्रदेश राष्ट्रीय औसत के आसपास या कई बार उससे अधिक दर्ज किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेरोजगारी, शैक्षणिक दबाव, पारिवारिक तनाव, आर्थिक संकट और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।
दो वर्षों में सामने आए ये आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि केवल आंकड़ों की प्रस्तुति पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यापक मानसिक स्वास्थ्य नीति, छात्र परामर्श व्यवस्था, कृषि क्षेत्र में आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक सहयोग तंत्र को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है।





