‘शतक’: राष्ट्रभक्ति और संकल्प को समर्पित फिल्म

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राष्ट्रवाद की ​तात्विक विवेचना -समीक्षा

‘शतक’:राष्ट्रभक्ति और संकल्प को समर्पित फिल्म

डॉ. तेज प्रकाश ‘पूर्णानंद’ व्यास

​राष्ट्र की आत्मा तब जागृत होती है जब उसके नागरिक अपनी विरासत और भविष्य के प्रति सजग होते हैं। धार की पावन धरा मे मेरे दशको निवास उपरान्त माँ देवी अहिल्या की इंदौर की पवित्र धरा पर निवासरत हू . इस फिल्म को दिल की गहराइयों से अवलोकित करने की की मेरी यह यात्रा केवल एक फिल्म देखने की यात्रा नहीं , बल्कि एक ‘बोध’ की प्राप्ति थी। आरएसएस (RSS) का हृदय से आभार, जिन्होंने मुझे इंदौर के उस प्रथम प्रीमियम शो का हिस्सा बनाया, जहाँ ‘शतक’ के रूप में राष्ट्रवाद का सूरज उगते देखा गया।

​एक पिता, एक शिक्षक और एक जागरूक नागरिक के रूप में, मैंने अनुभव किया कि इस फिल्म को केवल एक बार देखना पर्याप्त नहीं है। इसे सपरिवार, अपने पाँच वर्षीय अबोध बालक के साथ कम से कम दो बार देखना अनिवार्य है। क्यों? क्योंकि आज के पाँच वर्ष के बालक ही कल के भारत के नीति-निर्धारक होंगे। यदि हम उन्हें आज राष्ट्र की एकता, अखंडता और ‘अकाट्यता’ का पाठ नहीं पढ़ाएंगे, तो भविष्य सुरक्षित नहीं होगा।

​शताब्दी का महाशंखनाद:
“शतक” – संघ के १०० गौरवशाली वर्ष

शतक में संघ का 100 साल का सफर: विचारधारा-समर्थित सिनेमाई प्रस्तुति

​यह केवल एक चलचित्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण की वह महागाथा है, जिसने एक पूरी शताब्दी को अपने निस्वार्थ सेवा-भाव से सींचा है। “शतक: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के १०० वर्ष” वह ऐतिहासिक फीचर फिल्म है, जो १९ फरवरी २०२६ को संपूर्ण भारत के सिनेमाघरों में एक नए युग का सूत्रपात कर of चुकी है। १९२५ के उस संकल्प से लेकर २०२५ की सिद्धियों तक, यह फिल्म राष्ट्र-निर्माण के उस अदृश्य पथ को रूपहले पर्दे पर जीवंत करती है, जिसे संघ ने अपने पसीने और तपस्या से बनाया है।
​महागाथा का स्वरूप
​आशीष मॉल के कुशल निर्देशन और अनिल डी. अग्रवाल की ओजस्वी परिकल्पना से सजी यह फिल्म, अजय देवगन की उस गूँजती और गंभीर आवाज़ में पिरोई गई है, जो श्रोताओं के हृदय में राष्ट्रवाद का ज्वार उठा देती है। फिल्म की प्रत्येक कड़ी, संघ के वैचारिक अधिष्ठान, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक अभ्युदय के उन अनछुए पहलुओं को उजागर करती है, जिन्होंने आधुनिक भारत की नियति को गढ़ा है।
​संगीत और स्वर
​जब सुखविंदर सिंह की बुलंद आवाज़ में फिल्म का मुख्य गान “भगवा है अपनी पहचान” गूँजता है, तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि करोड़ों स्वयंसेवकों के संकल्प की हुंकार बन जाता है। यह संगीत उस अस्मिता का प्रतीक है, जो सदियों की सुप्त चेतना को जागृत करने का सामर्थ्य रखती है।
​ऐतिहासिक यात्रा: संकल्प से सिद्धि तक
​वीर कपूर द्वारा निर्मित यह महाकाव्य, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा १९२५ में रोपे गए उस बीज की कहानी है, जो आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। फिल्म उन ऐतिहासिक झंझावातों को भी साहस के साथ दर्शाती है, जिनमें ‘आपातकाल’ जैसे कठिन समय में संघ की अडिग भूमिका और राष्ट्र के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को परखा गया।
​डॉ. हेडगेवार के प्रथम चरण से लेकर आज के सेवा कार्यों और वैश्विक पहचान तक, “शतक” हमें उन गलियों और गाँवों में ले जाती है जहाँ स्वयंसेवकों ने बिना किसी प्रचार के राष्ट्र की सेवा को ही अपना परम धर्म माना। यह फिल्म उन लाखों गुमनाम नायकों को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपना जीवन ‘भारत माता’ के चरणों में समर्पित कर दिया।

​’शतक’ फिल्म की देखने के उपरांत में 11 मर्मभेदी एवं ओजस्वी संवाद मेरे मन की भावना के अनुरूप अभिवाक अभिव्यक्त हैं वैदिक
​फिल्म केवल दृश्यों का समूह नहीं, बल्कि वैदिक
मंत्रों का उच्चारण है।
मेरी अभिव्यक्ति जो रोंगटे खड़े कर देने वाली है , बच्चों तक को बच्चों तक को फिल्म को दिखाने में मदद मिलेगी :

​”शतक केवल संख्या नहीं, यह सौ वर्षों के आरएसएस का संघर्ष, बलिदानों और संकल्पों की वह शक्ति है जो भारत को पुनः विश्वगुरु बनाएगी।”

​”जब तक घर का हर बच्चा अपनी मिट्टी को तिलक नहीं लगाता, तब तक सरहद पर खड़ा सैनिक सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता।”

​”शत्रु की तलवार से अधिक घातक अपनों की उदासीनता होती है; जागो! इससे पहले कि इतिहास तुम्हें विस्मृत कर दे।”

​”अखंडता कोई समझौता नहीं है, यह हमारा अस्तित्व है। खंडित भारत एक शरीर है जिसकी आत्मा छटपटा रही है।”
​”मेरे रक्त की हर बूँद में ‘शतक’ का संकल्प है—जब तक एक भी राष्ट्रविरोधी जीवित है, मेरा विश्राम हराम है।”

​”सत्ताएँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र की संस्कृति सनातन है। इस संस्कृति की रक्षा ही हमारा परम धर्म है।”

​”इंदौर की गलियों से लेकर
पूरे राष्ट्र एवं विश्व भर में सनातन धर्मावलम्बियो भारतीयो तक,गूँज एक ही होनी चाहिए—भारत माता की जय!”

​”इतिहास पन्नों में नहीं, पूर्वजों के बलिदानों में होता है। फिल्म ‘शतक’ उन्हीं बलिदानों का डिजिटल अभिषेक है।”

​”कायर वह नहीं जो युद्ध हार जाए, कायर वह है जो युद्ध के मैदान में उतरने से पहले ही वैचारिक हार मान ले।”

​”अपनी संतानों को विरासत में संपत्ति दें या न दें, पर राष्ट्रभक्ति का ऐसा संस्कार अवश्य दें कि वे देश के लिए मर मिटना गौरव समझें।”

​”अकाट्यता हमारी पहचान है। हमें न कोई काट पाया है, न कोई बाँट पाएगा—शतक यही सत्य सिद्ध करती है।”

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​साहित्य समाज का दर्पण होता है और राष्ट्रवाद की मशाल। मात्र विचारों को पुष्ट करते हुए ये पाँच कविताएँ ‘शतक’ के मूल संदेश को परिभाषित करती हैं:

​1. पं. माखनलाल चतुर्वेदी – ‘पुष्प की अभिलाषा’
​”चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ…”
“मुझे तोड़ लेना वनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।”
​विवेचना:’शतक’ देखने का आग्रह इसी पुष्प की अभिलाषा का विस्तार है। जैसे पुष्प वैभव के बजाय बलिदान के मार्ग को चुनता है, वैसे ही यह फिल्म हमें व्यक्तिगत सुखों से ऊपर उठकर राष्ट्र-पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।

​2. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ – ‘रश्मिरथी’
​”क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसका क्या जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल हो।”

​विवेचना: ‘शतक’ फिल्म में जो शक्ति और सामर्थ्य दिखाया गया है, वह दिनकर जी की इन पंक्तियों का साक्षात रूप है। शांति केवल सामर्थ्यवान को ही शोभा देती है। राष्ट्र को अखंड रखने के लिए शक्ति संचय अनिवार्य है।

​3. सुभद्रा कुमारी चौहान – ‘झाँसी की रानी’
​”खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।”
​विवेचना: यह कविता वीरता का पर्याय है। फिल्म ‘शतक’ में स्त्री शक्ति और मातृशक्ति का जो स्वरूप चित्रित है, वह झाँसी की रानी के उसी अदम्य साहस की याद दिलाता है। बच्चों को यह फिल्म दिखाना, उन्हें इसी साहस से परिचित कराना है।

​4. जयशंकर प्रसाद – ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से’
​”प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्ज्वला! स्वतंत्रता पुकारती!”
​विवेचना: यह एक प्रयाण गीत है। ‘शतक’ फिल्म को देखने का अनुभव भी एक आध्यात्मिक और राष्ट्रीय प्रयाण जैसा है, जहाँ दर्शक स्वयं को स्वतंत्र और प्रबुद्ध भारत का रक्षक अनुभव करता है।

​5. सोहनलाल द्विवेदी – ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’
​(या ‘उठो धरा के अमर सपूतों’)
​”नया प्रात है, नई बात है, नई किरण है, ज्योति नई…”

​विवेचना: ‘शतक’ एक नए भारत के उदय की फिल्म है। यह टूटे हुए मनोबल को जोड़कर पुनरुत्थान की बात करती है, जैसा द्विवेदी जी ने अपनी कविताओं में सदा आह्वान किया।

Film Review-Shatak: आरएसएस विरोधियों को जरूर देखना-दिखाना चाहिये