
कस्तूरबा गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष: कस्तूरबा नहीं होतीं तो मोहनदास कभी महात्मा गांधी नहीं होते
अगर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करें तो हमारे मस्तिष्क में अनेकों महिलाओं का नाम प्रतिबिंबित होता है पर वो महिला जिनका नाम ही स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है वो हैं ‘कस्तूरबा गाँधी’। ‘बा’ के नाम से विख्यात कस्तूरबा गाँधी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की धर्मपत्नी थीं और भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर गांधीजी का साथ दिया। निरक्षर होने के बावजूद कस्तूरबा ने ताउम्र बुराई का डटकर सामना किया और कई मौकों पर तो गांधीजी को चेतावनी देने से भी नहीं चूकीं। बकौल महात्मा गाँधी, “जो लोग मेरे और बा के निकट संपर्क में आए हैं, उनमें अधिक संख्या तो ऐसे लोगों की है, जो मेरी अपेक्षा बा पर कई गुना अधिक श्रद्धा रखते हैं”। कस्तूरबा की तरह ही गांधीजी के सचिव महादेव देसाई ने भी गांधीजी की गोद में ही अपने प्राण त्यागे।
14 साल की कस्तूर का विवाह 13 साल के मोहनदास से हुआ। मोहनदास इंग्लैंड गए और बैरिस्टर बने। वे कस्तूर से कस्तूरबा बन गईं। फिर गांधी महात्मा, बापू और राष्ट्रपिता बन गए। इस पूरी प्रक्रिया में कस्तूरबा उनके साथ कदमताल करती रहीं। महादेव देसाई ने ठीक ही कहा था “गांधी का सचिव होना मुश्किल है मगर गांधी की पत्नी होना दुनिया में सबसे मुश्किल है.”
गांधी जीवनभर अपने उसूलों पर अडिग रहे। गांधी फ़िल्म में एक दृश्य है जिसमें गांधी अपनी पत्नी कस्तूरबा को दक्षिण अफ्रीका में एक दलित के पाखाने की बाल्टी साफ न करने पर धक्का देते हुए बाहर ले जाते दिखते हैं। गांधी उनसे कहते हैं कि अगर ये नहीं कर सकतीं तो इस घर में नहीं रहोगी। कस्तूरबा रोती हुई कहती हैं कि आप विदेश में मुझे लाये हो और इस तरह बाहर धक्का दे रहे हो । विदेश में कहाँ रहूंगी मैं? गांधी को अपने बर्ताव पर बहुत पछतावा होता है। लेकिन अपने उसूल पर नहीं। गांधी कस्तूरबा को बड़े धीरज से समझाते हैं कि हम जिसे गंदा कहते हैं और जिसे साफ करने के लिए हमने एक पूरी जाति बना दी है। हमको उसी गंदगी को खुद साफ करना होगा। ऐसा करने से या तो यह जाति खत्म हो जाएगी या हम सब लोग उस जाति में चले जायेंगे। कितना मुश्किल है गांधी की पत्नी होना।
कस्तूरबा भी समझ गईं कि ये साधारण सा दिखने वाला आदमी कितना असाधारण है। यह आदमी किसी खास प्रयोजन के लिए इस दुनिया में आया है और मुझे इसके रास्ते को नहीं रोकना चाहिए। इसीलिए ठीक कहा है कि अगर कस्तूरबा नहीं होतीं तो मोहनदास महात्मा गांधी नहीं बनते।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब पुलिस 9 अगस्त 1942 को सुबह के अँघेरे में गाँघी और महादेव देसाई को गिरफ़्तार करने पहुँची, तो महादेव के पुत्र नारायण देसाई, जो उस समय सात साल के थे, ने अपने पिता के लिए थोड़ा-सा सामान बाँघना शुरू कर दिया। महादेव ने उनको यह कहकर रोका कि ‘इन सब चीज़ों की कोई ज़रूरत नहीं है। बापू का अनशन मेरे सिर पर डेमाक्लीज़ की तलवार की तरह लटक रहा है। अगर वे अनशन पर बैठते हैं, तो मुमकिन है अंग्रेज सरकार उनको मर जाने दे। मैं यह सब देखने के लिए जीवित रहने वाला नहीं हूँ। मैं नहीं जानता कि मैं जेल में एक हफ़्ते से ज़्यादा जीवित रह पाऊँगा या नहीं।’
जेल में महादेव गाँघी पर उद्विग्न नज़र रखे हुए थे, क्योंकि उनको भय था कि वे किसी भी समय वह घातक अनशन शुरू कर सकते थे। कस्तूरबा महादेव को पुत्र से बढ़कर मानती थीं। महादेव को बार-बार यह दोहराते हुए सुना गया था कि ‘ईश्वर से मेरी एक ही प्रार्थना है, ‘मेहरबानी करके मुझे बापू से पहले उठा लें,’ और कस्तूरबा यह कहा करती थीं कि ये दिन देखने से पहले मुझे इस दुनिया से उठा ले।
भगवान ने कस्तूरबा की अर्जी कुछ समय के लिए पेंडिंग में डाल दी और महादेव की अर्जी स्वीकार कर ली। 15 अगस्त 1942 को महादेव अचानक ढह गये। उनकी मृत्यु गाँघी की बाँहों में हुई।
महादेव की मृत्यु के बाद कुछ दिन गांधी बहुत अधिक विचलित रहे इसके बाद उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ 21 दिन के उपवास की घोषणा कर दी। लेकिन इस बार अंग्रेज भी गांधी के सामने न झुकने का मन बना चुके थे। वायसराय लार्ड वेवेल को चर्चिल ने लिखित रूप से कहा-
” यदि बुढ़ऊ गांधी का विचार भूखे रहकर आत्महत्या करने का है तो इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने की छूट उन्हें अवश्य और सहर्ष दी जानी चाहिए। लेकिन ब्रिटिश सरकार गांधी के सामने झुकेगी नहीं चाहे फिर जो भी कीमत चुकानी पडे।”
गांधीजी के उपवास को अभी 10 दिन ही हुए थे और उनकी तबियत तेजी से बिगड़ने लगी। चर्चिल ने बेबेल से गांधी के मरने के बाद उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए आगा खान महल में ही चुपके चुपके उनके अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था के आदेश दिए। हिन्दू पद्यति से अंतिम संस्कार करने के लिए दो ब्राह्मण आगा खां महल में बिठा दिए गए। ताकि अग्निदाह के समय व्यर्थ की हड़बड़ी न हो । चंदन की लकड़ी , शुद्ध घी के कनस्तर और ऋग्वेद के दशम मण्डल के पुरुष सूक्त के श्लोक का पाठ करने वाले पंडितों की व्यवस्था महल में कर दी गई।
अंततः भगवान ने कस्तूरबा की अर्जी पर विचार किया । 22 फरवरी 1944 को शाम 7 बजकर 35 मिनिट पर जब महाशिवरात्रि पर मंदिरों के घण्टे घनघना रहे थे, भगवान ने कस्तूरबा की अर्जी स्वीकार कर ली।
अचानक पुलिस व अंग्रेज अधिकारियों की गाड़ियों के सायरन बजने लगे। कस्तूरबा की मृत्यु भी गांधी की बांहों में हुई।
लार्ड बेबेल के पास जैसे ही खबर आई कि गांधी की पत्नी कस्तूरबा का निधन हो चुका है। बेबेल ने आदेश दिया कि गांधी को सम्मान सहित तत्काल रिहा किया जाए क्योंकि इसी में सरकार की भलाई है। गांधी इस बार भी अपनी जिद तोड़ने से बच गए और अंग्रेज सरकार गांधी की हत्या के कलंक से बाल बाल बच गयी । इस तरह कस्तूरबा ने इस बार गांधीजी को बचा लिया। अंग्रेजों ने जो सामग्री गांधीजी के अंतिम संस्कार के लिए जुटाई वह कस्तूरबा गांधी के अंतिम संस्कार में लगा दी।
गांधीजी की इच्छा के अनुरूप आगा खां महल पूना में ही उनके प्रिय पुत्र तुल्य महादेव के बगल में उनकी माँ तुल्य कस्तूरबा का अंतिम संस्कार किया गया। मां बेटे की समाधि के प्रतीक के रूप में दो पौधे आज भी लगे हुए हैं।




