भारत मंडपम में कांग्रेसियों का नंगा नाच विरोध, लेकिन भूल गए अपने फर्जीवाड़े

169

भारत मंडपम में कांग्रेसियों का नंगा नाच विरोध, लेकिन भूल गए अपने फर्जीवाड़े

आलोक मेहता

भारत मंडपम में राहुल गांधी के युवा कॉंग्रेसियों के नंगे नाच से दुखी मुंबई के एक प्रभावशाली मित्र ने फोन करके मुझसे जानना चाहा कि ‘ काँग्रेस को मोदी सरकार से विरोध है या अमेरिका से समझौते से घोर नाराजगी या ए आई विश्व सम्मेलन में गलगोटिया यूनिवर्सिटी के चीनी मॉडल के फर्जीवाड़े का गुस्सा ?’ मित्र के विभिन्न दलों के कई प्रमुख नेताओं और औद्योगिक समुदाय से पुराने संपर्क संबंध रहे हैं | इसलिए मैंने उत्तर दिया ‘ आप मुझसे अधिक काँग्रेस के अमेरिकी संबंधों और कॉंग्रेसियों के अपने फर्जीवाड़ों को | सत्ता के लिए मोदीजी भाजपा का विरोध बहाना है असली समस्या अपने पुराने कारनामों पर कार्रवाई का | यही नहीं विश्वविद्यालयों के फर्जीवाड़ों में उनका रिकार्ड तो भयावह है | ‘
इस संदर्भ में मुझे ध्यान आया छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अजित जोगी के कार्यकाल में वर्ष 2002 में एक नया कानून विश्वविद्यालयों की मान्यता के लिए लाया गया। इसके तहत राज्य सरकार ने मात्र अधिसूचना के आधार पर दर्जनों निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दे दी।बिना पर्याप्त भूमि, फैकल्टी, प्रयोगशाला और शैक्षणिक ढांचे के 100 से अधिक विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गए। यह भारतीय उच्च शिक्षा इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय माना गया। हमने हिन्दी आउट्लुक में अपने ब्युरो प्रमुख राजेश सिरोठिया की एक खोजपूर्ण प्रामाणिक रिपोर्ट प्रकाशित की | नए कानूनी प्रावधानों के तहत राज्य सरकार सीधे निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दे सकती थी बिना यह सुनिश्चित किये कि वे राष्ट्रीय उच्च शिक्षा मानकों, खासकर यूजीसी नियमों का पालन करते हैं या नहीं। एक वर्ष के भीतर 100 से अधिक यूनिवर्सिटीज़ की मान्यता दे दी गई — जिनमें कई संस्थाओं का वास्तविक दर्जा, सुविधाएँ, निवेश, या शैक्षणिक क्षमता स्पष्ट रूप से नहीं थी | पराकाष्ठा यह थी कि एक मकान के बेसमेंट के ऑफिस को यूनिवर्सिटी की मान्यता दे दी गई थी | क्या यह बिना भ्रष्टाचार के संभव था ? हमारी रिपोर्ट पर हंगामा स्वाभाविक था | तब सत्ता के अहंकारी जोगी के नजदीकी लोग मेरे दफ्तर में आकर धमकी देने लगे | मुझे गार्ड्स बुलाकर उन्हें बाहर भिजवाया |
फिर यू जी सी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. यशपाल ने इन मान्यताओं पर जनहित याचिका दाखिल की, जिसमें यह तर्क दिया गया कि सिर्फ सरकारी अधिनियम के तहत बिना यू जी सी की विस्तृत जांच के मान्यता देना संविधान और उच्च शिक्षा के मानकों के उल्लंघन के अंतर्गत आता है। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में इन विश्वविद्यालयों की मान्यता रद्द कर दी। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि विश्वविद्यालय स्थापित करना केवल राज्य सरकार का प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शैक्षणिक हित का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के निजी विश्वविद्यालयों को स्थापित करने वाले कानून को रद्द कर दिया और कई विश्वविद्यालयों की मान्यता को शून्य घोषित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यू जी सी की प्रक्रिया को दरकिनार करना कानून के तहत असंगत है और इससे छात्रों के भविष्य पर गहरा असर पड़ेगा। यह फैसला केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी बना।सुप्रीम कोर्ट का छत्तीसगढ़ के मामलों में हस्तक्षेप ने यह संकेत दिया कि राज्य नियमों की मर्यादा में रहकर निर्णय नहीं ले सकते, बल्कि राष्ट्रीय नियामक मानकों का पालन ज़रूरी है। इस पूरे विवाद से स्पष्ट हुआ कि “मान्यता मिलना पर्याप्त नहीं है”, बल्कि इसकी मान्यता के बाद निरंतर निगरानी और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है।राज्य सरकारों द्वारा मान्यता प्रदान करना लाभकारी तो हो सकता है, लेकिन नियमन और निगरानी के मजबूत तंत्र का अभाव भ्रष्टाचार, छात्रों के हितों का क्षय, और मानी हुई शिक्षा गुणवत्ता को खतरे में डाल देता है।गैर-संगठित, ग़ैर-पारदर्शी और ग़लत प्रक्रियाओं से संचालित विश्वविद्यालयों से केवल तत्काल राजस्व तो उत्पन्न हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक सामाजिक और शैक्षिक क्षति के खतरों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता।निजी विश्वविद्यालयों के मामले में उत्तरदायित्व, जवाबदेही और उच्च शिक्षा के सर्वोच्च मानकों का पालन अब केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक आवश्यक आवश्यकता बन चुका है | समस्या केवल किसी एक विश्वविद्यालय या सरकार की नहीं, बल्कि पूरे ढाँचे की है। यदि शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाता है, तो निजी विश्वविद्यालयों के लिए सख्त, पारदर्शी और निष्पक्ष नियमन अनिवार्य है। अन्यथा, शिक्षा का यह बाज़ार लोकतंत्र और विकास—दोनों के लिए जोखिम बनता जाएगा।
जहाँ तक गलगोटिया यूनिवर्सिटी की बात है उसने एक स्थानीय शैक्षणिक संस्था के रूप में शुरुआत की और 2011 में यू जी सी की मान्यता के साथ निजी विश्वविद्यालय का दर्जा पाया | राहुल गांधी को याद न हो लेकिन उनके ‘ महा ज्ञानी ‘ सलाहकारों को यह कैसे ध्यान नहीं है कि तब केंद्र में उनकी सरकार थी |गलगोटिया यूनिवर्सिटी के खिलाफ शुरुआती विवाद 2014 में सामने आए, जब उस समय विश्वविद्यालय की पैरेंट संस्था पर आरोप लगे कि उसने ₹100-120 करोड़ से अधिक की उधार राशि समय पर लौटाई नहीं, और उसके कागज़ों में फर्जी दस्तावेज़ों का उपयोग किया गया। यही नहीं परिवार के दो सदस्यों को
गिरफ्तार किया गया।दोनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में रखा गया। बाद में मामला आर्बिट्रेशन/न्यायपालिका की प्रक्रिया में बदल गया और पुनर्भुगतान के निर्देश जारी किए गए, लेकिन ब्याज और विवाद न्यायालय में लंबित रहे। यह विवाद यह संकेत देता है कि यूनिवर्सिटी की स्थापना और वित्तीय संरचना पर प्रारंभिक समय से ही वित्तीय चुनौतियों और आरोप रहे। पिछले वर्षों में यूनिवर्सिटी से जुड़े कुछ छात्रों और पूर्व छात्रों के अनुभव भी रिपोर्ट हुए हैं, जैसे कि शैक्षणिक शुल्क, परीक्षा फीस, प्रबंधन व्यवहार, और संस्थागत अनुभव से जुड़ी शिकायतें — जिनमें छात्रों ने प्रायः व्यवसाय-संस्था-शिक्षा मॉडल को चुनौती के रूप में बताया। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक और छात्र-संबंधी मुद्दे भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। अब चीनी मॉडल को अपना दिखाने पर उसने अपनी सफाई दी है |विश्वविद्यालय ने सफाई दी कि रोबोट शैक्षणिक प्रयोग के लिए खरीदा गया था, लेकिन प्रस्तुति में चूक हुई।
असल में उच्च शिक्षा का क्षेत्र पिछले ढाई दशकों में अभूतपूर्व परिवर्तन से गुज़रा है। सरकारी विश्वविद्यालयों की सीमित संख्या, बढ़ती आबादी, और शिक्षा के बाज़ारीकरण ने निजी विश्वविद्यालयों के लिए रास्ते खोले। लेकिन इस विस्तार के साथ नियमन, पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्न भी उतनी ही तेज़ी से उठे।, निजी विश्वविद्यालयों को राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन मिला। भूमि आवंटन, त्वरित स्वीकृति और निवेश-मैत्री वातावरण ने गलगोटिया जैसे समूहों को तेज़ी से विस्तार का अवसर दिया।देश की शीर्ष उच्च शिक्षा नियामक संस्था है।कांग्रेस शासित राज्यों से लेकर अन्य दलों के शासन तक, निजी विश्वविद्यालयों को अक्सर सत्ता का संरक्षण मिला। एक बार मान्यता मिल जाने के बाद डी-रिकॉग्निशन (मान्यता रद्द) की प्रक्रिया लगभग निष्क्रिय दिखती है।छात्रों के भविष्य पर असर डालने वाले संस्थानों पर कठोर कार्रवाई राजनीतिक रूप से असुविधाजनक मानी जाती रही है।

हाल के वर्षों में यू जी सी ने दर्जनों निजी विश्वविद्यालयों को डिफॉल्टर घोषित किया, फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी की और सार्वजनिक चेतावनियाँ दीं। लेकिन आलोचक कहते हैं कि यू जी सी की कार्रवाई अक्सर नोटिस और चेतावनी तक सीमित रहती है। मान्यता रद्द करने की प्रक्रिया लंबी और राजनीतिक दबावों से प्रभावित होती है। यू जी सी को समाप्त करने की बहस भी शुरू हो गई | मोदी सरकार के दौर में उच्च शिक्षा सुधारों के तहत नए ढाँचों की चर्चा हुई। यह बहस इसी पृष्ठभूमि से जुड़ी है कि क्या मौजूदा संस्थाएँ शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित कर पा रही हैं |2023 में न्यायालय में पेश एक PIL में यह आरोप लगाया गया कि कई निजी विश्वविद्यालय प्रमाणपत्रों की बिक्री, मार्क-शीट जारी करने में मनमानी और रिकॉर्ड बनाए रखने में अव्यवस्था की जा रही है, मगर मामले पर जांच और सी बी आई स्तर तक की अपील अस्वीकार कर दी गई। अर्थात् जांच और दंडात्मक कार्रवाई का अभाव, छात्रों के हितों की सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता के लिए बड़ा जोखिम है।यूजीसी ने 2025 में मध्य प्रदेश की 10 निजी यूनिवर्सिटीज़ को डिफॉल्टर घोषित किया, जो पब्लिक सेल्फ-डिस्क्लोजर नियमन का पालन नहीं कर रहे हैं | राजस्थान में दो निजी यूनिवर्सिटी मालिकों सहित 3 लोग गिरफ्तार किए गए, जब फर्जी डिग्री और पेपर लीक मामले का पर्दाफाश हुआ — जिसमें उच्च अधिकारियों की भी भूमिका संदेह के घेरे में आई। हाल ही के दिल्ली में हुए आतंकवादी हमले के मामलों में अल फतह यूनिवर्सिटी के एक संस्थापक को पहले ही धोखाधड़ी के अपराध में सजा मिल चुकी थी और अब तो अनेक गंभीरतम भारत विरोधी मामले अदालत पहुंचे हैं , जो चिंताजनक संकेत है जब इस तरह के संस्थानों को उच्च शिक्षा प्रदान करने वाली इकाई के रूप में अनुमति दी जाती है। इस प्रकार राज्य-स्तर पर नियमन की कमी और भ्रष्टाचार व अस्तित्वहीन मान्यता से जुड़े चरम मामलों का प्रभाव छात्रों और शिक्षा प्रणाली दोनों पर गहरा पड़ा है।