बिहार में अब असली चुनौती शराबबंदी की नीति और आर्थिक प्रगति के कदम

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बिहार में अब असली चुनौती शराबबंदी की नीति और आर्थिक प्रगति के कदम

आलोक मेहता

बीस वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद नीतीश कुमार के राष्ट्रीय राजनीति में आने पर बिहार के लिए असली राजनीतिक सामाजिक आर्थिक चुनौतियाँ क्या होंगी ? नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड और भाजपा की सरकार को कोई खतरा नहीं है | प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ पिछले वर्षों में बने संबंध और नीतियों कार्यक्रमों पर आपसी सहमतियों के कारण नीतीश कुमार और उनके साथियों को भविष्य में तालमेल में भी संकट के आसार बहुत कम हैं | असली चुनौती शराबबंदी की नीति को जारी रखने या बदलने और भ्रष्टाचार को नियंत्रित रखते हुए तेजी से आर्थिक प्रगति के कार्यक्रमों और जन कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन होगा | अपराधों पर नियंत्रण के मुद्दे पर चर्चा अधिक होती है , लेकिन यह समस्या पड़ोसी राज्यों में कम नहीं है और हर घर मोहल्ले में पुलिस की पहरेदारी दुनिया के किसी सम्पन्न देश के शहर कस्बे में संभव नहीं है | हाँ यदि शीर्ष नेता भ्रष्ट नहीं होंगे , तो प्रशासन और पुलिस के भ्रष्टाचार और अत्याचार या अपराध बहुत हद तक नियंत्रित हो सकते हैं | नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की सफलताओं में भी बड़ा कारण यही रहा और रहेगा | नीतीश के राष्ट्रीय राजनीति में रहने से बिहार पर उनकी पकड़ कम नहीं हो सकती है | मोदी , शरद पवार , चरण सिंह जैसे कई नेता राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका में पहुंचे लेकिन अपने प्रदेशों में उनका राजनीतिक वर्चस्व कम नहीं हुआ |

नीतीश कुमार द्वारा बिहार में लागू की गई शराबबंदी नीति पिछले एक दशक में भारत की सबसे चर्चित सामाजिक-राजनीतिक नीतियों में से एक रही है। अप्रैल 2016 में लागू इस नीति का उद्देश्य केवल शराब की बिक्री रोकना नहीं था, बल्कि समाज में व्याप्त कई समस्याओं—जैसे घरेलू हिंसा, गरीबी, अपराध और सामाजिक विघटन—को कम करना भी था।इस नीति के लागू होने के बाद जहां कई सामाजिक सकारात्मक परिणाम सामने आए, वहीं इसके साथ कई गंभीर चुनौतियां और विवाद भी जुड़े रहे। आज बिहार की शराबबंदी नीति को एक बड़े सामाजिक प्रयोग के रूप में देखा जाता है, जिसकी सफलता और सीमाओं दोनों पर लगातार बहस होती रही है। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान महिलाओं के बीच शराब के खिलाफ मजबूत जनभावना उभरकर सामने आई। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं ने खुले तौर पर शिकायत की कि शराब के कारण परिवार की आय नष्ट हो रही है और घरेलू हिंसा बढ़ रही है। इसी सामाजिक दबाव और राजनीतिक वादे के आधार पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सत्ता में लौटने के बाद 5 अप्रैल 2016 को राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी।इसके लिए बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम 2016 बनाया गया, जिसके तहत राज्य में शराब के निर्माण, बिक्री, भंडारण, परिवहन और सेवन को अपराध घोषित किया गया।

शराबबंदी लागू करने के पीछे सरकार के कई सामाजिक उद्देश्य थे | गरीब परिवारों की आय को शराब में खर्च होने से बचाना, महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को कम करना , समाज में अपराध की घटनाओं को घटाना , जनस्वास्थ्य में सुधार लाना, सामाजिक वातावरण को अधिक अनुशासित बनाना | सरकार का तर्क था कि शराब से होने वाली सामाजिक क्षति, उससे मिलने वाले कर राजस्व से कहीं अधिक बड़ी है।शराबबंदी के बाद सबसे अधिक सकारात्मक प्रतिक्रिया महिलाओं की ओर से आई। बिहार के अनेक गांवों में महिलाओं ने कहा कि अब पति शराब पीकर घर नहीं आते , परिवार की आय बचने लगी , घरेलू झगड़े कम हुए , महिला स्वयं सहायता समूहों ने भी शराबबंदी को लागू कराने में सक्रिय भूमिका निभाई।शराबबंदी से पहले बड़ी संख्या में मजदूर वर्ग की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा शराब पर खर्च हो जाता था। प्रतिबंध के बाद कई परिवारों ने बताया कि अब बच्चों की पढ़ाई पर अधिक खर्च हो रहा है , घर की आवश्यकताओं पर पैसा लग रहा है , सामान्य परिवारों में बचत भी बढ़ी है , सार्वजनिक जीवन में बदलाव शराब की खुली बिक्री बंद होने के का गांवों और कस्बों में शराब की दुकानें समाप्त हो गईं , सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने की घटनाएं कम हुईं , सड़क पर नशे में झगड़े और उत्पात की घटनाएं कम दिखाई देने लगीं|शराबबंदी नीति ने महिलाओं के बीच नीतीश कुमार की लोकप्रियता को काफी बढ़ाया। बिहार की राजनीति में महिला मतदाताओं का समर्थन एक महत्वपूर्ण कारक बन गया।

हालांकि शराबबंदी से सामाजिक लाभ की चर्चा होती है, लेकिन इसके आर्थिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहे हैं |शराबबंदी लागू होने से पहले बिहार सरकार को शराब से लगभग 4 से 5 हजार करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था। शराबबंदी के बाद यह आय लगभग समाप्त हो गई। राज्य सरकार को इस नुकसान की भरपाई अन्य करों और केंद्रीय सहायता के माध्यम से करनी पड़ी।शराबबंदी की सबसे बड़ी चुनौती अवैध शराब तस्करी है। बिहार की सीमाएं कई राज्यों से लगती हैं, जिनमें प्रमुख हैं – उत्तर प्रदेश , झारखंड और पश्चिम बंगाल | यही नहीं सीमा पार सूर्य अस्त , नेपाल मस्त कहलाने वाला क्षेत्र भी प्रभावित करता है |

पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी लगातार होती रही है। कई जिलों में अवैध शराब के नेटवर्क सक्रिय पाए गए। यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि अवैध शराब की महंगी बोतलों की खपत समाज के प्रभावशाली सम्पन्न वर्ग , नेता और अधिकारियों के खास वर्ग में होती है | पाखंड यह है कि उसी वर्ग के लोग शराबबंदी नीति और सरकार को अधिक कोसते हैं |

शराबबंदी के बाद बिहार में जहरीली शराब से मौतों की घटनाएं भी सामने आईं। इनमें सबसे चर्चित घटना 2022 में हुई, जब जहरीली शराब पीने से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो गई। यह बात अलग है कि कुछ अन्य राज्यों में शराबबंदी न होते हुए भी जहरीली शराब से मौतें हुई हैं | इन घटनाओं ने शराबबंदी नीति की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए।शराबबंदी कानून के तहत बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया।हजारों मामले अदालतों में पहुंचे ,जेलों में भीड़ बढ़ गई

, कई मामलों में गरीब मजदूर या छोटे अपराधी भी कानून के शिकंजे में आ गएबाद में सरकार को कानून में संशोधन करके कुछ प्रावधानों को नरम करना पड़ा।विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि शराबबंदी के कारण:पुलिस और प्रशासन में भ्रष्टाचार बढ़ा ,अवैध शराब के कारोबार में संरक्षण मिलने लगा , निर्दोष लोगों को भी कभी-कभी परेशान किया गया | हालांकि सरकार ने इन आरोपों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।

देश में में शराबबंदी का कानून पहले भी लागू हुआ है। सबसे बड़ा उदाहरण गुजरात है , जहाँ लंबे समय से शराबबंदी लागू है। हरियाणा में शराबबंदी का प्रयोग बहुत कम समय के लिए हुआ। 1996 में मुख्यमंत्री बंसीलाल ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की। यह उनकी पार्टी का संकल्प था |लेकिन यह नीति लगभग 21 महीने ही चल सकी। 1998 में सरकार ने इसे वापस ले लिया। शराबबंदी हटाने के पीछे कई कारण बताए गए | राज्य को आबकारी राजस्व में भारी नुकसान, पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी , अवैध शराब का बढ़ता कारोबार और प्रशासनिक कठिनाइयाँ |इस अनुभव के बाद हरियाणा में फिर कभी पूर्ण शराबबंदी लागू करने का गंभीर प्रयास नहीं हुआ।कई अन्य राज्यों ने भी शराबबंदी का प्रयोग किया, लेकिन अधिकतर जगह यह लंबे समय तक नहीं टिक सकी।आंध्र प्रदेश में एन टी रामा राव ने शराबबंदी लागू की थी। महिलाओं के आंदोलन के कारण यह फैसला लिया गया था। लेकिन कुछ वर्षों बाद राजस्व नुकसान और प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण इसे समाप्त कर दिया गया। तमिलनाडु में शराबबंदी कई बार लागू और समाप्त हुई। 1937 में सी राजगोपालचारी के समय इसकी शुरुआत हुई थी। बाद में विभिन्न सरकारों ने इसे बदलते राजनीतिक और आर्थिक कारणों से हटाया या लागू किया। नागालैंड और मिजोरम में भी शराबबंदी लागू की गई थी। लेकिन व्यवहार में अवैध बिक्री और तस्करी के कारण इन राज्यों को भी कई बार नीति में बदलाव करना पड़ा।इससे यह स्पष्ट होता है कि शराबबंदी केवल कानून बनाने से सफल नहीं होती, बल्कि इसके लिए सामाजिक समर्थन, प्रशासनिक क्षमता और आर्थिक संतुलन भी आवश्यक है। शराबबंदी पर बहस आगे भी जारी रहेगी क्योंकि यह केवल आर्थिक नीति नहीं बल्कि समाज और राजनीति से जुड़ा संवेदनशील विषय है।

शराबबंदी कानून को लेकर आलोचनाओं के बाद बिहार सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए: पहली बार पकड़े गए लोगों के लिए सजा में नरमी , छोटे अपराधियों के बजाय बड़े तस्करी नेटवर्क पर ध्यान ,शराब विरोधी जनजागरण अभियान

,नशामुक्ति कार्यक्रमों को बढ़ावा |इन कदमों का उद्देश्य कानून को अधिक व्यावहारिक बनाना था।बिहार की शराबबंदी नीति को एक सामाजिक सुधार के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। उपलब्धियां -महिलाओं में संतोष और समर्थन , कई परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार , खुले रूप से शराब पीने की प्रवृत्ति में कमी | चुनौतियां अवैध शराब का कारोबार ,जहरीली शराब की घटनाएं . प्रशासनिक और न्यायिक दबाव , राजस्व की कमी| मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रयोग है। इस नीति ने यह दिखाया कि सरकार यदि सामाजिक सुधार के उद्देश्य से कठोर कदम उठाती है तो उसे जनता का समर्थन मिल सकता है, लेकिन साथ ही प्रशासनिक चुनौतियां भी सामने आती हैं। भविष्य में इस नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार अवैध शराब के नेटवर्क पर कितना नियंत्रण कर पाती है और समाज में नशामुक्ति की संस्कृति को कितना मजबूत बना पाती है।

नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार की राजनीति और अर्थव्यवस्था में पिछले लगभग दो दशकों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं। वर्ष 2005 में जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब बिहार को देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता था। कमजोर बुनियादी ढांचा, उद्योगों का अभाव, पलायन, खराब कानून व्यवस्था और बेहद कम निवेश राज्य की पहचान बन चुके थे।इन परिस्थितियों में नीतीश सरकार ने शासन, आधारभूत संरचना और सामाजिक योजनाओं पर जोर देते हुए राज्य को विकास की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। हालांकि बिहार आज भी औद्योगिक दृष्टि से अग्रणी राज्यों में शामिल नहीं है, लेकिन कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति भी दर्ज की गई है।

2005 से पहले बिहार की अर्थव्यवस्था कई गंभीर समस्याओं से घिरी हुई थी।राज्य में बड़े उद्योग लगभग समाप्त हो चुके थे।

बुनियादी ढांचा जैसे सड़क, बिजली और परिवहन बेहद कमजोर था।कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होने से निवेशक राज्य से दूर रहते थे।बड़े पैमाने पर युवाओं का पलायन अन्य राज्यों की ओर होता था।2005 के बाद नीतीश कुमार सरकार ने विकास के लिए कुछ प्रमुख रणनीतियां अपनाईं:बुनियादी ढांचे का विस्तार ,कानून व्यवस्था में सुधार , शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश ,औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहन ,कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा | इन नीतियों के परिणामस्वरूप बिहार में आर्थिक गतिविधियों में धीरे-धीरे वृद्धि होने लगी।नीतीश शासन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में सड़क और पुल निर्माण को माना जाता है।राज्य में हजारों किलोमीटर नई सड़कों का निर्माण किया गया और कई प्रमुख पुल बनाए गए। इससे गांवों और शहरों के बीच संपर्क बेहतर हुआ और व्यापारिक गतिविधियों को गति मिली।बिजली उत्पादन और वितरण में भी सुधार हुआ। पहले बिहार में बिजली की भारी कमी रहती थी, लेकिन पिछले वर्षों में बिजली आपूर्ति की स्थिति काफी बेहतर हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों तक बिजली पहुंचने से छोटे उद्योगों और व्यापार को भी लाभ मिला।

नीतीश सरकार ने उद्योगों को आकर्षित करने के लिए कई नीतियां लागू कीं। बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति के तहत उद्योगों को कई प्रकार की सुविधाएं दी गईं, जैसे: कर में छूट ,भूमि उपलब्ध कराना , बिजली और बुनियादी ढांचा सहायता राज्य सरकार ने औद्योगिक क्षेत्रों और औद्योगिक पार्कों के विकास पर भी ध्यान दिया बिहार की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। इसलिए सरकार ने कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई।राज्य में खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी और कृषि उत्पादों से जुड़े उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया। इस दिशा में डेयरी क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई। राज्य की सहकारी संस्था सुधा डेयरी ने दूध उत्पादन और विपणन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज बिहार में डेयरी उद्योग लाखों किसानों के लिए आय का स्रोत बन चुका है।बिहार में बड़े उद्योगों की संख्या सीमित होने के कारण लघु मध्यम क्षेत्र के उद्योगों का महत्व अधिक है। नीतीश सरकार ने छोटे उद्योगों और स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं। इनमें प्रमुख है | इस योजना के तहत युवाओं को उद्योग शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।इसके परिणामस्वरूप राज्य में हजारों छोटे उद्योग स्थापित हुए हैं, जिनसे स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़े हैं। बिहार की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, व्यापार और संचार सेवाओं में तेजी से विस्तार हुआ पिछले दो दशकों में बिहार की आर्थिक विकास दर कई वर्षों तक राष्ट्रीय औसत से अधिक रही। कई आर्थिक अध्ययनों के अनुसार 2005 के बाद बिहार की वृद्धि दर कई वर्षों में 10 प्रतिशत के आसपास भी पहुंची। यह वृद्धि मुख्य रूप से निर्माण, सेवा क्षेत्र और सरकारी खर्च के कारण हुई |न पिछले वर्षों में इसमें लगातार सुधार हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली और सरकारी योजनाओं के कारण आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं।

बिहार की अर्थव्यवस्था में प्रवासी मजदूरों की कमाई भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।राज्य के लाखों लोग कई अन्य राज्यों में काम करके घर पैसा भेजते हैं |वहां से भेजा गया पैसा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है |अभी भी बड़े उद्योग बहुत कम हैं। भारी उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र का विकास सीमित रहा है।विकास के लिए कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है, लेकिन बिहार में कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था अभी भी पर्याप्त नहीं है |बिहार में औद्योगिक विकास के लिए कई संभावनाएं भी मौजूद हैं। कृषि आधारित उद्योगों का विस्तार , खाद्य प्रसंस्करण उद्योग , पर्यटन क्षेत्र का विकास , आईटी और सेवा क्षेत्र में निवेश |यदि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से निवेश किया जाए तो बिहार आर्थिक रूप से और मजबूत हो सकता है।

बिहार की राजनीति में पिछले तीन दशकों में दो प्रमुख राजनीतिक दौर रहे हैं—एक दौर लालू प्रसाद यादव और उनके सहयोगियों का रहा, जिसे आमतौर पर “लालू राज” कहा जाता है, और दूसरा दौर नीतीश कुमार के नेतृत्व का है, जिसे “नीतीश राज” के रूप में देखा जाता है।इन दोनों दौरों की तुलना अक्सर कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुधार और विकास के आधार पर की जाती है। बिहार की जनता, राजनीतिक विश्लेषक और मीडिया लंबे समय से इस बहस को आगे बढ़ाते रहे हैं कि इन दोनों शासनकालों में राज्य की स्थिति किस प्रकार बदली |1990 से 2005 तक का समय अक्सर आलोचकों द्वारा “जंगलराज” के रूप में वर्णित किया गया। इस दौरान राज्य में अपहरण, अपराध और प्रशासनिक शिथिलता के आरोप लगाए जाते रहे। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में बिहार में अपराध की घटनाओं को लेकर व्यापक चर्चा होती रही। 1990 और 2000 के शुरुआती वर्षों में बिहार में अपहरण की घटनाएं काफी बढ़ गई थीं। कई उद्योगपतियों, व्यापारियों और डॉक्टरों के अपहरण की घटनाएं सामने आईं। इस कारण कई व्यापारियों और निवेशकों ने राज्य से दूरी बना ली आलोचकों का आरोप था कि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता था और कई अपराधी स्वयं राजनीति में सक्रिय हो गए थे। इससे प्रशासन की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा।उस समय पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की कार्यक्षमता को लेकर भी सवाल उठते थे। कई मामलों में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई धीमी मानी जाती थी।लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में सबसे चर्चित मामला चारा घोटाला रहा, जिसमें सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लगे। इस मामले में बाद में न्यायालय द्वारा कार्रवाई भी हुई और वह जेल में भी रहे | यह मामला बिहार की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा |

2005 में जब नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली, तब उन्होंने सबसे पहले कानून-व्यवस्था सुधार को प्राथमिकता दी।उन्होंने प्रशासनिक सुधार, पुलिस व्यवस्था में बदलाव और तेज न्याय प्रक्रिया के माध्यम से अपराध नियंत्रण की रणनीति अपनाई।नीतीश सरकार के शुरुआती वर्षों में कानून-व्यवस्था में सुधार के कई प्रयास किए गए।सरकार ने अपराधियों के खिलाफ मामलों की तेज सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था की।इसके परिणामस्वरूप कई अपराधियों को सजा हुई और अपराध पर कुछ हद तक नियंत्रण स्थापित हुआ। 2005 के बाद बिहार में अपहरण की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।इससे राज्य की छवि में सुधार हुआ और व्यापारिक गतिविधियों को भी कुछ हद तक प्रोत्साहन मिला।पुलिस बल की संख्या बढ़ाई गई और आधुनिक तकनीक का उपयोग शुरू किया गया। इससे अपराध नियंत्रण की क्षमता में वृद्धि हुई नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए। सरकार ने भ्रष्टाचार निरोधक इकाइयों को मजबूत किया और कई अधिकारियों की संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई की गई। कुछ मामलों में भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति को स्कूल या सार्वजनिक उपयोग के लिए परिवर्तित करने जैसे कदम भी उठाए गए, जो महत्वपूर्ण माने गए | सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बिहार जैसे राज्य में केवल नीतीश कुमार लगभग बीस वर्ष मुख्यमंत्री पद पर रहे | आजादी के बाद बड़े बड़े कांग्रेसी या समाजवादी नेता अधिक वर्ष मुख्यमंत्री नहीं रह सके | अब नीतीश राज के बाद आने वाले मुख्यमंत्री के लिए यह एक बड़ी परीक्षा होगी |