श्री अरबिंदो विवि की पहल पर लिखी पुस्तक “हीलिंग विज्डम ऑफ सेंट्रल इंडिया – एथनोमेडिसिनल प्रैक्टिस ऑफ मध्य प्रदेश ट्राइब्स” का विमोचन

*“इंटेग्रेटेड मेडिसिन कोर्स” शुरू करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त संस्थान है “सैम्स”*

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श्री अरबिंदो विवि की पहल पर लिखी पुस्तक “हीलिंग विज्डम ऑफ सेंट्रल इंडिया – एथनोमेडिसिनल प्रैक्टिस ऑफ मध्य प्रदेश ट्राइब्स” का विमोचन

*इंदौर।* आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा का अत्यंत प्रतिष्ठित केंद्र होने के बावजूद “श्री अरबिंदो इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (सैम्स)” के फाउंडर चेयरमैन डॉ. विनोद भंडारी, जिस तरह से पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को संग्रहित, संकलित और सुव्यवस्थित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। उनके प्रयासों का ही मूर्त रूप है पुस्तक “हीलिंग विज्डम ऑफ सेंट्रल इंडिया – एथनोमेडिसिनल प्रैक्टिस ऑफ मध्य प्रदेश ट्राइब्स”। जिसे वनविभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी पीसी दुबे की मार्गदर्शन में होलकर कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. संजय व्यास और वन विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ. सुशील उपाध्याय ने लिखा है।

देश की किसी भी मेडिकल यूनिवर्सिटी या कॉलेज द्वारा पहली बार इस तरह का सार्थक प्रयास किया गया है। इन प्रयासों से सिद्ध होता है कि सैम्स, इंटेग्रेटड मेडिसिन कोर्सेस शुरू करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त संस्थान है।

ये सुझाव पारंपरिक चिकित्सा को पुस्तकीय दस्तावेज के रूप में संग्रहित करने के लिए लिखी गई पुस्तक के विमोचन समारोह में वक्ताओं ने दिया। इर्काड-इंडिया स्थित श्री एस.एम. भंडारी सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि, “एम.पी. प्रायवेट यूनिवर्सिटी रेगुलरिटी कमीशन” के चेयरमैन खेमसिंह देहरिया ने कहा कि इंटेग्रेटेड मेडिसिन के कार्य को आगे बढ़ाने में श्री अरबिंदो समूह पहले स्थान पर है। सभी चिकित्सा पद्धतियों का अपना महत्व है लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि पारंपरिक और आयुर्वेदिक दवाएं पर विश्वास इतना अधिक है कि इन्हें राष्ट्रपति भवन तक भी भेजा जाता है। इस पुस्तक के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा का एक ही स्थान पर संकलन करना बहुत ही उत्कृष्ट कार्य है। मेरा सुझाव है कि इसमें वर्णित दवाओं को पेटेंट कराने की प्रक्रिया भी शुरू की जानी चाहिए।

 

*65 परसेंट घटा, इंसुलिन डोज*

सैम्स के फाउंडर चेयरमैन डॉ. विनोद भंडारी ने निजी अनुभव साझा करते हुए कहा कि सबके सामने लाने से पहले मैंने स्वयं पारंपरिक चिकित्सा को अपनाया है। इससे कुछ ही समय में मेरी डायबिटिक प्रॉबलम में सुधार हुआ है और इंसुलिन का डोज 65 प्रतिशत तक कम हो गया है। मैंने पारंपरिक चिकित्सा के लगभग 650 जानकारों से बात की है और उनका कहना है कि पारंपरिक चिकित्सा के कुछ उपाय तो पुरानी किताबों में भी नहीं लिखे हैं। इसलिए उनका “एविडेंस बेस्ड परफेक्ट कंपाइलेशन” जरूरी था। आप लोगों को ये जानकर खुशी होगी कि हमारे एलोपैथिक डॉक्टर्स भी अब पारंपरिक चिकित्सा को दिल से अपना रहे हैं। यहाँ तक कि अत्याधुनिक न्यूक्लियर मेडिसिन में भी इसके समुचित सदुपयोग की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

 

*अरबिंदो विवि की अनुकरणीय पहल*

विशिष्ट अतिथि देवी अहिल्या विवि के कुलगुरु डॉ. राकेश सिंघई ने कहा कि इस तरह की पहल बहुत पहले ही की जानी चाहिए थी लेकिन निजी संस्थान होने के बावजूद अरबिंदो विवि पारंपरिक चिकित्सा को जिस तरह प्रमोट कर रहा है, वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है। डॉ. पी.सी. दुबे ने कहा कि आधुनिकता की आंधी में अब जनजातियों की नई पीढ़ी भी पारंपरिक चिकित्सकीय ज्ञान से दूरी बना रही है। ऐसे में दो साल पहले मैंने सोचा भी नहीं था कि अरबिंदो जैसा इतना बड़ा मेडिकल कॉलेज, पारंपरिक चिकित्सा को लेकर इतनी दृढ़ता से संपूर्ण समर्पण भाव से काम करेगा। इसके लिए मैं डॉ. भंडारी जी का विशेष रूप से आभारी हूँ। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन करते हुए विवि के कुलसचिव डॉ. आनंद मिश्रा ने कहा कि यह केवल शुरुआत है। हम पारंपरिक चिकित्सा को सहेजने और उसके सदुपयोग की दिशा में बहुत तेजी से काम करते हुए नित नई मंजिलें प्राप्त करेंगे। इस अवसर पर श्री अरबिंदो विवि के कुलपति डॉ. ए.के. मिश्रा और डीन आर.आर. वावरे समेत बड़ी संख्या में गणमान्य जन उपस्थित थे।