रविवारीय गपशप: पढ़ने की दीवानगी के कुछ रोचक किस्से

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रविवारीय गपशप: पढ़ने की दीवानगी के कुछ रोचक किस्से

आनंद शर्मा

कहानी-किस्सों की किताबों के प्रति मैं बचपन से ही एक अद्र्श्य आकर्षण से आबद्ध रहा आया हूँ । मंडला में मेरे पिताजी पोस्ट मास्टर हुआ करते थे , तब मैं कक्षा तीन या चार में पढ़ा करता था । मंडला में पोस्ट ऑफिस से हमारा आवास लगा हुआ ही था , तो फुर्सत के समय खेलते खेलते ऑफिस में भी चले जाते थे । मेरे लिए सबसे ज़्यादा आकर्षण की वस्तु थी पोस्टमैन भैया द्वारा डाक का थैला खोलना । जादू के पिटारे सा उसमें क्या क्या निकलता है , हम बच्चे बड़े ध्यान से देखा करते । उन दिनों कहानी की किताबें पेपरबैक्स पर डाक से भेजी जाया करती थीं , नंदन , चंदामामा , स्पुतनिक और ना जाने क्या क्या । पोस्टमैन भैया इन किताबों में से कोई एक मुझे दे देते और कहते जब तक डाक की सार्टिंग कर रहा हूँ पढ़ लो और घंटे-आधघंटे जब पोस्टमैन डाक को व्यवस्थित करते मैं जितना बन पाता कहानी किससे कविताएँ पढ़ डालता । समय ख़त्म होते ही वे पुस्तक वापस पेपर बैक के लिफ़ाफ़े में डालते और गन्तव्य की और सरकाते और हम घर वापस चल पड़ते । सप्ताह में दो या तीन बार ऐसा सिलसिला चलता ।

एक दिन बाबूजी ने ये प्रक्रिया देख ली और मुझसे पूछा क्या तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है ? मैंने झट हाँ कहा तो मुझे पाँच रुपये के बराबर की अपनी पसंद की किताबें चयन करने को कहा । मेरी तो लॉटरी निकल पड़ी , मैंने बाल उपन्यास की ढेर भर पुस्तकों पर निशान लगा दिया , पाँच रुपये बहुत होते थे , अगले सप्ताह मुझे ढेर सारी किताबें पढ़ने मिल गईं । किताबें पढ़ने के बाद मैंने शाला के अपने सहपाठियों से पूछा , किताबें पढ़ोगे ? कुछ दोस्त मिल गए और अदला बदली कर मैं अनेक पुस्तकें पढ़ता रहा ।

पिताजी का जबलपुर तबादला हो गया , कुछ बड़ी क्लास में एडमिशन हुआ तो पता चला कहानी की किताबों के तो पुस्कालय हुआ करते हैं । बस परीक्षाएं खत्म होतीं और गरमी की छुट्टियों में पुस्तकालय के मालिक से 5 की जगह 10/- जमा कर एक के बदले एक दिन में तीन उपन्यास पढ़ने के लिए लिया करते । क्या दीवानगी थी , दिन भर में तीन तीन उपन्यास ख़त्म कर देते । इसके बाद शासकीय पुस्तकालय का रुख़ किया और कुछ गम्भीर विषय की पुस्तकों पर ध्यान गया । पढ़ाई लिखाई चलती रही पर पुस्तकों के प्रति दीवानगी वैसी ही बनी रही ।


रविवारीय गपशप: प्रशासन में बैचमेट्स के रोचक किस्से!


कालेज का जमाना बीता तो रोजगार की खोज शुरू हुई और सन 1986 में मैं डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हो गया । प्रशासन अकादमी आए तो आकर्षण का एक ही केंद्र था , अकादमी की लाइब्रेरी जो गजब की समृद्ध थी । मेरे मित्र स्वर्गीय जनक जैन , ढूँढ ढूँढ कर अंग्रेजी साहित्य की किताबें लाते और मैं उनसे लेकर पढ़ता ।

अकादमी के बाद जिलों में पदस्थापना हुईं और मुझे राजनांदगांव जिला पहली पदस्थापना के रूप में मिला , कलेक्टर थे हर्ष मंदर , उन्होंने मुझे डोंगरगढ़ अनुविभाग का एसडीएम बना दिया । उन दिनों वीसीआर पर वीडियो केसेट से फ़िल्में दिखाने के छोटे छोटे थियेटर खुल गए थे , जो छोटे पर्दे पर वीसीआर से फ़िल्में दिखाते थे । एक दिन किसी अनजान व्यक्ति की शिकायत आई कि फ़लाँ थियेटर में अश्लील फ़िल्में दिखाई जा रही हैं । मैंने एसडीओ पुलिस के साथ आकस्मिक रूप से जाँच की तो फ़िल्म तो अश्लील नहीं निकली , लेकिन सेंसर बोर्ड से पास फर्स्ट कॉपी न होकर नक़ल थी , यानी थोड़ा अपराध तो बनता था । खैर केसेट जप्त कर नोटिस दिया गया , और जवाब तलब किया गया । दो तीन दिन बाद ही जिला मुख्यालय पर किसी बैठक में भाग लेने मैं ट्रेन से राजनांदगांव जाने के लिए बैठा तो देखा थ्री टायर के डब्बे में पास में ही उसी थियेटर का मालिक बैठा था , जिसके यहाँ दो दिन पहले मैंने छापा मारा था । मेरे हाथ में अमृता प्रीतम की लिखी रसीदी टिकट थी , उसने देखा और पूछा लगता है आपको पढ़ने का शौक है । मैंने हाँ कहा तो उसने कहा , मेरे भाई को पढ़ने का बहुत शौक था , अब वो तो नहीं है , पर उसकी किताबों से अलमारियाँ भरी हुई हैं , आप आकर देख सकते हो और जो चाहो किताब पढ़ सकते हो । मैं कुछ झिझका तो उसने आगे कहा , आप निश्चिन्त रहिये, मेरे प्रकरण से इसका कोई संबंध न होगा और वैसे भी मेरा कोई गम्भीर अपराध तो है नहीं जो जुर्माना होगा मैं अलग भरूँगा । प्रस्ताव आकर्षक था सो दूसरे दिन मैं उस सज्जन के घर गया तो एक तरफ़ से अलमारियों में कृश्न चंदर , मोहन राकेश , कृष्ण सोबती और भी ना जाने कौन कौन से नायाब लेखकों की लिखी पुस्तकों का अंबार था । मैंने उनसे कहा मैं रोज़ रोज़ तो न आ पाऊँगा लेकिन एक तरफ़ से मुझे आप दस पंद्रह पुस्तकें देते जाना , पढ़ने के बाद मैं किसी के हाथ से आपको वापस पहुँचा दूँगा और आप वापस झोला भर देना । उसने सहर्ष सहमति दी और मैं झोला भर किताब के साथ अपने घर वापस आ गया ।

दूसरे दिन ऑफ़िस में बैठ सबसे पहला काम मैंने ये किया की उसके प्रकरण में न्यूनतम जुर्माना लगा कर वसूली हेतु तहसीलदार को भेज प्रकरण समाप्त कर दिया और हाँ उनकी सारी अलमारियों की किताबें मैंने डोंगरगढ़ रहते पढ़ डाली ।