
न्याय पालिका के विरुद्ध केजरीवाल के मोर्चे के घातक परिणाम
आलोक मेहता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तरह भारत के दो नेता – कांग्रेस के राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल हाल के वर्षों में संवैधानिक संस्थाओं – चुनाव आयोग , संसद , अदालत के निर्णयों को चुनौतियाँ देते हुए उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर संकट उत्पन्न कर रहे हैं | प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी , उनकी सरकार और पार्टी के विरुद्ध अभियान चलाते हुए अब सी बी आई , इंफोर्समेंट डिपार्टमेंट ( ई डी ) की कार्रवाई के साथ न्याय पालिका के वरिष्ठ न्यायाधीशों पर भी पूर्वाग्रह , पक्षपात के आरोप लगा रहे हैं | मतलब वह जनता और दुनिया को बताना चाहते हैं कि न्याय पालिका पर भी भरोसा न किया जाए | यह एक बेहद खतरनाक अभियान है |
पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पिछले दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय में वकील के बजाय स्वयं पेश होकर न्यायाधीश के विरुद्ध दलीलें पेश करते हुए खूब प्रचार लूटा | यदि इसी मामले में उनकी ओर से कोई सामान्य वकील पेश होता , तो उसकी बातों का प्रचार नहीं हो सकता था | केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष शराब नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने के लिए अपनी दलील पेश की | सीबीआई की याचिका की सुनवाई कर रही न्यायाधीश के खिलाफ कई आपत्तियां उठाईं, जिनमें यह भी शामिल है कि उन्होंने पहले उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया था, मनीष सिसोदिया और के कविता सहित अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर राहत देने से इनकार कर दिया था, और साथ ही “मजबूत और निर्णायक” निष्कर्ष भी दिए थे। यही नहीं बाद में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया । यह हलफनामा केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका से संबंधित है, जिसमें केजरीवाल को इस मामले में बरी किए जाने को चुनौती दी गई है। अपने नए आवेदन में केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़े हितों के टकराव की आशंका जताई है। उन्होंने बताया कि न्यायाधीश के बेटे और बेटी दोनों को केंद्र सरकार के कानूनी सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है, जो सीबीआई के माध्यम से इस मामले में पक्षकार है।
उन्होंने मामले की राजनीतिक संवेदनशीलता पर भी प्रकाश डाला और बताया कि वे एक प्रमुख विपक्षी नेता हैं जिनकी केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच की जा रही है। जांच एजेंसियों के कामकाज पर सर्वोच्च न्यायालय की पिछली टिप्पणियों का हवाला देते हुए, उन्होंने ऐसे मामलों में निष्पक्षता और निष्पक्षता के दिखावे दोनों के महत्व पर जोर देने के लिए “पिंजरे में बंद तोता” मुहावरे का प्रयोग किया। उनका तर्क इस कानूनी सिद्धांत पर आधारित है कि पूर्वाग्रह की उचित आशंका भी न्यायाधीश को हटाने की मांग के लिए पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि ‘ न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। ‘
एक सवाल उठता है कि सामान्य नियम परम्परा के अनुसार कई मामलों में स्वयं किसी प्रकरण या व्यक्ति से कोई पुराना सम्बन्ध होने पर अलग हट जाते रहे हैं | फिर प्रभावशाली केजरीवाल की तरह कोई सामान्य व्यक्ति अदालत में तारीखें या फैसला टलवाने के लिए जज की जाति , धर्म या किसी अन्य कारण बताकर जज को बदलने की मांग करने लगे , तब अदालत क्या सुनेगी ? सही बात तो यह है कि फैसले के बाद भी ऐसा आरोप लगाने पर अदालत की अवमानना के आधार पर सजा तक हो सकती है |
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने केजरीवाल के मामले से खुद को अलग करने के अनुरोध का विरोध करते हुए तर्क दिया कि इस तरह तो कई न्यायाधीश सरकारी मामलों की सुनवाई करने के लिए अयोग्य होने लगेंगे । एजेंसी के वकील ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि ऐसे दावे कानूनी रूप से निराधार हैं और सम्पूर्ण न्यायिक व्यवस्था को बाधित कर सकते हैं। निश्चित रूप से देश की अदालतों में नियुक्त होने वाले हर जज की छात्र जीवन से लेकर पारिवारिक पृष्ठभूमि रहती है | उनके माता पिता , भाई बहन , पति पत्नी , मित्र किसी न किसी कार्य , संस्था , व्यवसाय , राजनीतिक संगठन से जुड़े हो सकते हैं | उच्च न्यायालय के जज तो एक लम्बे क़ानूनी अनुभव के बाद नियुक्त होते हैं | उस दौरान वे किसी संस्था के सार्वजनिक कार्यक्रम में भी जाते रह सकते हैं | यों पिछले पचास साठ साल में कई वरिष्ठ जज न केवल राजनीतिक पार्टी से आए , पार्षद , विधायक अथवा सांसद रहे या कई वर्ष जज रहने के बाद सांसद बन गए | तो क्या उन सबके कामकाज और फैसलों पर राजनीतिक पूर्वाग्रह के आरोप लगाए जा सकते थे या लगाए जा सकते हैं ?
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक माना जाता है। परंतु समय-समय पर यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या न्यायपालिका वास्तव में पूरी तरह राजनीति से मुक्त रही है? पिछले 70 वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां न्यायाधीशों का राजनीति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध देखा गया। न्यायपालिका ने कई बार अपनी स्वतंत्रता सिद्ध की है, परंतु राजनीति से उसके संबंधों ने बार-बार सवाल खड़े किए हैं।
आपातकाल में न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव दिखाई दिया | जस्टिस ए एन रे को वरिष्ठता को दरकिनार कर मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। जस्टिस बहरुल इस्लाम पहले कांग्रेस के सांसद रहे , फिर न्यायाधीश और फिर पुनः राजनीति में आ गए | यह भारतीय न्यायिक इतिहास का एक अनोखा और विवादास्पद उदाहरण है।जस्टिस विजेंद्र जैन मेरे भी मित्र थे |न्यायाधीश बनने से पहले वे कांग्रेस पार्टी के नेता रहे और उन्होंने दिल्ली नगर निगम के पार्षद के रूप में कार्य किया | बाद में उन्होंने वकालत शुरू की | फिर दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए और कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की और ऐतिहासिक फैसले भी दिए | हाल के वर्षों में भी रिटायर होने के बाद कुछ बड़े न्यायाधीश सांसद या राज्यपाल भी बने | राजनीतिक विवादों के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका सीमित हुई और कोलेजियम प्रणाली शुरू हुई। लेकिन तब परिवारवाद और पक्षपात के आरोप स्वयं कानूनविद लगाने लगे | लेकिन आरोपी ही जज तय करने लगेंगे तब न्याय व्यवस्था का क्या होगा ?
केजरीवाल ने अपनी याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (एबीएपी) के साथ उनके वैचारिक जुड़ाव की संभावना की ओर इशारा किया था, जो वकीलों का एक संगठन है जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध माना जाता है। केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से अपने मामले से हटने की मांग करते हुए पक्षपात की आशंका जताई और कहा कि उनकी अदालत में सांसदों/विधायकों से संबंधित आपराधिक मामलों के विश्लेषण से पता चलता है कि केवल दो मामले ऐसे हैं – जिनमें से एक उनका अपना है और दूसरा भाजपा के एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से संबंधित है – जिनमें अदालत मामलों की सुनवाई तेजी से कर रही है।केजरीवाल ने राजनीतिक आधार पर पक्षपात की आशंका जताते हुए, साथ ही सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर भी अपनी आशंका व्यक्त की, और कहा कि वह “इस अदालत के हितों के टकराव को दर्शाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर इस अदालत के पक्षपात से बुरी तरह प्रभावित हैं और इसकी आशंका जताते हैं”।
दूसरी तरफ दिल्ली उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार , न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा, जिनका न्यायिक करियर तीन दशकों से अधिक का है, ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में बीए (ऑनर्स) किया था, जहां उन्हें दौलत राम कॉलेज में वर्ष की सर्वश्रेष्ठ सर्वांगीण छात्रा घोषित किया गया था।1991 में उन्होंने एलएलबी की डिग्री हासिल की और 2004 में एलएलएम की उपाधि प्राप्त की। न्यायमूर्ति शर्मा के पास मार्केटिंग मैनेजमेंट, विज्ञापन और जनसंपर्क में डिप्लोमा भी है।मार्च 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत होने से पहले, वह राउज़ एवेन्यू कोर्ट में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश (सीबीआई) थीं। नवंबर 2019 में, उन्हें प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (उत्तरी जिला) नियुक्त किया गया था।पिछले साल, उन्हें “न्यायिक शिक्षा के माध्यम से न्याय की संवैधानिक दृष्टि को प्राप्त करना: यूके, यूएसए, सिंगापुर और कनाडा में सर्वोत्तम प्रथाओं का एक तुलनात्मक अध्ययन” शीर्षक वाले उनके डॉक्टरेट शोध प्रबंध के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया था।न्यायमूर्ति शर्मा ने अपने कॉलेज के दिनों में वाद-विवाद और विभिन्न सह-पाठ्यक्रम एवं अतिरिक्त पाठ्यचर्या गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया और कई पुरस्कार एवं प्रमाण पत्र प्राप्त किए। उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा दो वर्ष तक राष्ट्रीय सेवा स्वयंसेवक के रूप में सेवा पूरी करने के लिए प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किया गया था।सभी स्तरों पर उत्कृष्ट शैक्षणिक रिकॉर्ड वाली एक ऊर्जावान छात्रा, उन्होंने 24 वर्ष की आयु में एक मजिस्ट्रेट के रूप में न्यायपालिका में प्रवेश किया और 35 वर्ष की आयु पूरी होने पर सत्र न्यायाधीश बन गईं।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कई पुस्तकें भी लिखी हैं। उनकी पहली पुस्तक, ‘डोंट ब्रेक आफ्टर ब्रेक-अप’, उन महिलाओं को मार्गदर्शन प्रदान करती है जिन्होंने अविवाहित रहने का विकल्प चुना है या जिन्होंने कठिन ब्रेक-अप का अनुभव किया है। ‘बियॉन्ड बागबान’ वरिष्ठ नागरिकों द्वारा सामना की जाने वाली भावनात्मक और वित्तीय चुनौतियों का विश्लेषण करती है, जबकि ‘तुम्हारी सखी’ महिलाओं को उनके अधिकारों और हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने के महत्व के बारे में जागरूक करने का प्रयास करती है।अपनी चौथी रचना, ‘लव फुल सर्कल’ के साथ, न्यायमूर्ति शर्मा ने कथा लेखन में कदम रखा, जबकि ‘न्यायिक शिक्षा – न्याय की संवैधानिक दृष्टि को प्राप्त करना’ न्याय वितरण प्रणाली को मजबूत करने और न्यायाधीशों को न्याय की संवैधानिक दृष्टि को साकार करने में मदद करने पर विस्तार से चर्चा करती है। इतने अनुभव और न्यायिक अनुभव वाली सम्मनित न्यायाधीश पर पक्षपात के आरोप क्या उचित कहे जा सकते हैं ? जबकि केजरीवाल के शराब नीति घोटाले पर जांच एजेंसियों और उच्च अदालतों में कई गंभीर आरोपों के सबूतों पर भी सुनवाई कार्रवाई जारी है |





