राज-काज:इसे लेकर ‘लाटसाहब’ की अफसरों को खरी-खोटी….

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राज-काज:इसे लेकर ‘लाटसाहब’ की अफसरों को खरी-खोटी….

* दिनेश निगम ‘त्यागी’

इसे लेकर ‘लाटसाहब’ की अफसरों को खरी-खोटी….

 

– एक वीडियाे कांफ्रेंसिंग के दौरान नौकरशाही को मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने ही नहीं चेताया, प्रदेश के लाटसाहब अर्थात महामहिम मंगूभाई पटेल ने भी एक कार्यक्रम में प्रदेश के अफसरों को सार्वजनिक तौर पर खरी-खोटी सुना दी। आदिवासियों से जुड़े एक कार्यक्रम में उन्होंने नाराजगी का इजहार करते हुए कहा कि अफसरों के व्यवहार में अपनेपन की कमी है। इसलिए आदिवासियों खासकर उनके बच्चों का शोषण हो रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या आदिवासी बच्चे सिर्फ डांस करने के लिए हैं कि वे सुबह कहीं डांस करें और इसके बाद यहां। उन्होंने कहा कि प्रदेश में 21 फीसदी से ज्यादा आदिवासी आबादी है। इसे देखते हुए हर विभाग को बजट का कुछ हिस्सा आदिवासियों पर खर्च करना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि बजट की 299 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च ही नहीं हुई और वापस हो गई। उन्होंने कहा कि टीएसपी की यह राशि केंद्र से आती है लेकिन कोई आदिवासी विभाग से नहीं पूछता कि पैसा कहां खर्च करना है। उन्होंने इस प्रवृत्ति की आलोचना की। महामहिम ने यह बात जनजातीय समाज के विकास के लिए भोपाल में हुई दो दिवसीय वर्कशाप में कही। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि ऐसे अफसरों पर कार्रवाई की जाना चाहिए, क्योंकि कर्नाटक और तेलांगना जैसे राज्यों में ऐसा करने वालों को बख्शा नहीं जाता।

0 हार के बाद भी भाजपा में इनका वजूद कम नहीं….

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– राजनीतिक दलों में कुछ नेता ऐसे होते हैं जो चुनाव भले हार जाएं लेकिन पार्टी में उनका दबदबा कम नहीं होता। भाजपा द्वारा तैयार कोर ग्रुप में शामिल कुछ नेताओं के बारे में भी यह कहा जा सकता है। भाजपा के 16 सदस्यों वाले नवगठित कोर ग्रुप में शामिल ऐसा पहला नाम है पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का। ये विधानसभा का पिछला चुनाव हार गए थे लेकिन पार्टी मेें इनकी धमक लगातार बरकरार है। देश भर के विभिन्न चुनावों में इनकी पूछपरख होती ही है, प्रदेश में भी इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाता। कोर ग्रुप में शामिल दूसरा नाम है लालसिंह आर्य का। ये भी विधानसभा का पिछला चुनाव हार गए थे लेकिन अब भी भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कोर ग्रुप में शामिल कर इन्हें प्रदेश में ताकतवर बनाए रखा गया है। कोर ग्रुम में शामिल तीसरा नाम है अरविंद भदौरिया का। मिश्रा और आर्य की तरह ये भी विधानसभा का चुनाव हारे थे लेकिन ये भी अपना वजूद बनाए रखने में सफल हैं। मजेदार बात यह है कि कोर ग्रुप में शामिल ये तीनों नेता चंबल-ग्वालियर अंचल से हैं जिन्हें हार के बावजूद सरकार और संगठन में समन्वय के लिए बने ताकतवर कोर ग्रुप में शामिल किया गया है। जबकि लगातार जीतने के बावजूद प्रदेश के कद्दावर नेताओं गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह जैसे नेताओं को जगह नहीं मिली।

0 राम निवास की तरह नरोत्तम पर दांव की तैयारी….! 

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– पूर्व मंत्री राम निवास रावत की तरह नरोत्तम मिश्रा भी इन दिनों चर्चा में हैं। रावत विजयपुर से विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद उप चुनाव लड़े थे, क्योंकि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने के बाद उन्होंने सदस्यता से इस्तीफा दिया था। जबिक नरोत्तम दतिया से इसलिए उप चुनाव लड़ेंगे क्योंकि कांग्रेस के राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद सीट खाली हुई है। चर्चा यह भी है कि उप चुनाव से पहले नरोत्तम को ठीक उसी तरह मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है जैसे राम निवास को शपथ दिलाई गई थी। यह बात अलग है कि मंत्री बनने के बावजूद रावत उप चुनाव हार गए थे, नरोत्तम हारेंगे या जीतेंगे, यह उप चुनाव के नतीजे बताएंगे। राजेंद्र भारती ऊपरी अदालत से राहत पाने की कोशिश में हैं, न मिली तो दतिया सीट से उप चुनाव तय है। नरोत्तम दतिया में पहले से सक्रिय हैं लेकिन सीट रिक्त होने के बाद वे ज्यादा एक्टिव हो गए हैं। उन्हें भाजपा के कोर ग्रुप में शामिल किया गया है और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने उनके घर जाकर मुलाकात की है। यह सब नरोत्तम का दबदबा बढ़ने के संकेत हैं। इसीलिए उप चुनाव से पहले उन्हें मंत्री बनाए जाने की चर्चा ने जोर पकड़ा है ताकि उप चुनाव जीतने में उन्हें कोई समस्या न आए। हालांकि राजेंद्र भारती के रहते यह बहुत आसान नहीं क्योंकि क्षेत्र में उनके प्रति सहानुभूति देखी जा रही है।

0 तो क्या मुख्यमंत्री के निर्देश नहीं मान रहे कलेक्टर….?

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– मंत्रिमंडल सदस्य एक बार मुख्यमंत्री के निर्देश मानने में लापरवाही करें तो चलेगा क्योंकि वे जनप्रतिनिधि हैं और कई मंत्री राजनीतिक अनुभव में मुख्यमंत्री से भी वरिष्ठ। लेकिन यदि नौकरशाही मुख्यमंत्री के निर्देश न माने और उन्हें किसी मसले पर बार-बार चेतावनी देना पड़े तो बात गंभीर हो जाती है। इसका अंदाजा पिछले दिनों कमिश्नरों-कलेक्टरों की वीडियो कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव द्वारा दी गई चेतावनी से लगा। उन्होंने कहा कि ‘जब मैंने कह दिया कि रात्रि विश्राम करना है तो इसका मतलब है कि करना है। जिन कलेक्टरों का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं है, वे सुधार करें। अब पिछले एक साल में किए गए कामों के आधार पर रैंकिंग होगी। जनप्रतिनिधियों से दूरी ना रखें। लगातार भ्रमण और संवाद करें। डिलिवरी सिस्टम को कस्टमर फ्रेंडली बनाएं।’ इससे ही सरकार मजबूत रहती है। लहजे से साफ है कि मुख्यमंत्री ने यह निर्देश पहली बार नहीं दिए, इसीलिए उन्हें चेतावनी देना पड़ी। याद नहीं पड़ता कि किसी कलेक्टर और कमिश्नर ने अपने क्षेत्र का भ्रमण कर किसी गांव में रात्रि विश्राम किया हो। आखिर नौकरशाह मुख्यमंत्री का निर्देश मानने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? मुख्यमंत्री के तेवरों से साफ है कि अब यह नाफरमानी नहीं चलेगी। यदि वे नहीं सुधरे तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है क्योंकि मुख्यमंत्री अब सीधे एक्शन ले सकते हैं।

0 ऐसे मामलों के लिए कोई गाइडलाइन क्यों नहीं….?

– ओबीसी महिला आरक्षण पर इंदौर और ग्वालियर हाईकोर्ट के आए अलग-अलग फैसलों से भ्रम की स्थिति बन गई है। सवाल है कि क्या ऐसे मामलों के लिए कोई गाइडलाइन नहीं होना चाहिए? विवाहित होकर मप्र आई जालौन की अर्चना दांगी को शिक्षक भर्ती परीक्षा के लिए इसलिए अपात्र ठहरा दिया गया क्योंकि उसका जाति प्रमाण पत्र उप्र से बना है, जबिक उनकी जाति दोनों राज्यों में आरक्षित वर्ग में आती है। ग्वालियर हाईकोर्ट ने कहा कि अन्य राज्य का जाति प्रमाण पत्र मप्र में मान्य नहीं किया जा सकता। लेकिन इसी तरह के कुछ मामले इंदौर हाईकोर्ट के पास पहुंचे तो उसने फैसला दिया कि शादी के बाद अन्य राज्य से मप्र आकर स्थाई रूप से बसने वालों को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, पर इसके लिए जरूरी है कि संबंधित जाति दोनों राज्यों में आरक्षति वर्ग में हो। इतना ही नहीं गरिमा राठौर के एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ग्वालियर ने ही यह फैसला भी दे दिया कि जाति का पैमाना मां-बाप की स्थिति से तय होता है, इसलिए शादी के बाद उसे आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। इसकी वजह से गरिमा को नौकरी मिल गई। है न अजीब बात, हाईकोर्ट के एक फैसले ने एक की नौकरी छीन ली जबिक उसी तरह के दूसरे मामलों में अन्य को नौकरी मिल गई। क्या ऐसे मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट को कोई गाइडलाइन नहीं बनाना चाहिए?

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