Black magic In Bengal: इस बार तड़ी पार,खेला तो होने 

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Black magic In Bengal: इस बार तड़ी पार,खेला तो होने 

रमण रावल

हकीकत में भले कुछ न हो, कहानी-किस्सों में बंगाल के काले जादू के खासे चर्चे रहते हैं। इस लिहाज से कयास लगाये जा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में बंगाल की जनता ने ममता बैनर्जी के खिलाफ काला जादू कर दिया है । मदारी थे मोदी-शाह और जनता ने जमूरे की भूमिका बखूबी निभाई । ममता वो मूक दर्शक रही जो झोली से कबूतर निकलने की आस लिये मदारी को बीन बजाते देखती रही और मदारी ने चादर के नीचे जमीन पर सोई हुई बंगाली चेतना को जागृत कर उपस्थित समुदाय को हतप्रभ कर वाहवाही लूट ली। इसे ही तो हाथ की सफाई कहते हैं, जो कहीं काला जादू कहलाती है।

इस बार के विधानसभा चुनाव का जो भी नतीजा रहे, वह चौंकाने वाला ही रहेगा। ममता हारे-जीते या भाजपा । यदि ममता विजयी रही, तब यह समझ पाना मुश्किल होगा कि बंगाली जनता आखिरकार किस तरह की अराजकता पसंद सोच वाली है, जो तृणमुल कार्यकर्ताओं की सरेआम गुंडागर्दी के बावजूद उससे मुक्ति का रास्ता अपनाने की बजाय उसी दलदल की ओर बढ़ चली है। जिस बंगाली चेतना ने वामपंथी सरकार की साढ़े तीन दशक की ज्यादती को सहा, वह 2011 में परिवर्तन के बावजूद तृणमुल के उसी ढर्रे के साथ समायोजन कैसे बैठा सकी ? संभवत यह ऐसा यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब इस बार बंगाल की जनता देने जा रही है। यह जवाब स्पष्ट होगा ।

पहले इस संभावना पर बात करते हैं कि क्या इस बार भाजपा गंगासागर के पार उतरने वाली है। इसे चमत्कार तो माना जायेगा, लेकिन भाजपा के स्तर पर पांच साल से इसकी तैयारियां चल रही थीं,इसे नजरअंदाज न करें। भाजपा ने यह तो जान लिया था कि ममता के नेतृत्व में तृणमुल गैंग की ओर से बंगाली जनता पर जो दमन चक्र चलाया जा रहा था, उससे आमजन बुरी तरह परेशान है। उसे माकपा व कांग्रेस से कतई उम्मीद नहीं थी। ये दोनों दल कब्र में लेटे उस मानव ढांचे की तरह वहां हो चुके हैं, जिसके अतीत की चर्चा की जा सकती है, तृणमुल से उसकी तुलना की जा सकती है, लेकिन उसमें प्राण नहीं फूंके जा सकते । ऐसे में किशोर वय की भाजपा में उसे अपनी पीड़ा बयान करने का माद्दा दिखा। ममता से लोहा लेने की ताकत नजर आई।

कोई लाख दुहाई दे, तृणमुल ने बंगाल को चरम अराजकता की अंधी खाई में धकेल दिया है। कानून का पालन तो खुद मुख्यमंत्री नहीं करती तो उसके सिपाही भला क्यों बेवकूफी करते ? जब एक मुख्यमंत्री अपनी पार्टी का अभियान चलाने वाली पीआर एजेंसी पर ईडी के छापे के बीच जाकर उनके हाथों से फाइलें छीन लाये, जो राष्ट्रपति की अगवानी न करे, जो प्रधानमंत्री के आगमन पर सौजन्य भेंट के लिये न आये, जो सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ पुलिस में प्रकरण दर्ज करवा दे, उसके कार्यकर्ता गांव से लेकर शहर तक निजी या व्यावसायिक निर्माण,कारोबार,उद्योग स्थापना पर चौथ वसूले, जो पुलिस का उपयोग लोगों को डराने-धमकाने पर करे, जो भाजपा समर्थित लोगों की बहन-बेटियों से हर संभव दुर्व्यवहार करे, जहां किसी की भी सरेआम हत्या कर दी जाती हो, जो राज्य सरकार बाहरी लोगों को तमाम पहचान पत्र उपलब्ध कराकर नागरिक सुविधायें देकर अपना वोट बैंक मजबूत करे,जिस राज्य में व्यापारी,कामकाजी,उद्योगपति,प्रवासी मजदूर अपनी जान सांसत में महसूस करें, उस राज्य के लोग बिना हल्ला मचाये, लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन के लिये कटिबद्ध व एकजुट हो जायें तो आश्चर्य कैसा ?

इसका मतलब यह भी नहीं कि भाजपा बस बहुसंख्यक बंगालियों के उत्पीड़न के प्रतिशोध के भरोसे बंगाल की जंग में उतरी। इस मुद्दे ने तो उसे ताकत दी कि वह संपूर्ण चेतना के साथ मैदान संभाले। जैसी कि भाजपा की कार्य पद्धति है,उसने पिछली हार के समय से ही संगठन की मजबूती और व्यूह रचना पर ध्यान दिया। उसके जीवनदायी कार्यकर्ता सबसे पहले उन इलाकों में तैनात हुए, जहां तृणमुल का वर्चस्व रहा। वहां उनकी ज्यादतियों और कमजोरियों का अध्ययन किया। फिर, स्थानीय निवासियों में ऐसे प्रभावी लोगों को चिन्हित किया, जो भाजपा की रीति-नीति को समझते हैं और बदलाव में सहयोग देने को तत्पर हों। फिर, उनमें ये हौसला पैदा किया कि वे अपनी तरह के दूसरे लोगों को जोड़ सकें। बूथ स्तर तक के समूह बनाकर इनका नियमित मिलन प्रारंभ हुआ और इनका दायरा बढ़ता गया।

जब लगा कि पैर जम गये हैं तो विधानसभावार प्रमुख मुद्दों पर जनमत बनाकर तृणमुल को घेरने की रणनीति पर काम शुरू हुआ । फोकस किया गया,मूल बंगाली,मारवाड़ी,उप्र,बिहार के प्रवासी मजदूर, कारोबारी, कायस्थ, ब्राह्मण,क्षत्रिय,जैन आदि ऐसे वर्ग पर,जो अन्य प्रांतों में भाजपा का कोर वोट बैंक है। इनके बीच बैठकें कर व जहां जरूरी हुआ, वहां प्रत्यक्ष संपर्क कर यह विश्वास दिलाया गया कि भाजपा उनके हितों का रक्षण करेगी। इसके लिये विशेष तौर से छत्तीसगढ़,ओड़िसा,उप्र,बिहार,राजस्थान से भाजपा के चुनाव विशेषज्ञ और संबंधित समुदाय के नेता,मंत्री की तैनाती की गई। ये काम करीब छह महीने पहले किया गया, ताकि वे कार्यकर्ता संबंधित इलाकों में अपनी पैठ जमा सकें। वहां के लोगों से आत्मीयता कायम कर सकें और वास्तविक हालात का जायजा ले सकें, ताकि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व चुनाव पूर्व रैलियों,भाषणों में उन मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर माहौल बना सके। यह प्रयोग जबरदस्त सफल रहा । स्थानीय लोगों में इससे साहस पैदा हुआ ।

कोई भी एग्जिट पोल के नतीजों को न मानने के लिये स्वतंत्र है और उन्हें भाजपा का प्रबंधन करार दे सकता है। ये भी सही है कि अनेक मौकों पर एग्जिट पोल गलत साबित हुए हैं। पहले यह जान लेते हैं कि बंगाल में भाजपा को बहुमत मिला तो सरकार क्या करेंगी और तृणमुल का क्या होगा ? मुझे लगता है, तत्काल ममता बैनर्जी की गिरफ्तारी कतई नहीं होगी। भाजपा की केंद्र व राज्य सरकारों की कार्य प्रणाली पर नजर डालें तो उसने कहीं भी पूर्ववर्ती को खड़े दम जेल में नहीं डाला। केजरीवाल भी अपने शासनकाल के आखिरी साल में जेल गये , वह भी पूरी वैधानिक प्रक्रिया के तहत । अलबत्ता, ममता को ऐसी दहशत में तो धकेलेंगे जरूर। हां, उसके कुछ ऐसे नेता-कार्यकर्ताओं को जरूर नकेल डाली जायेगी, जिन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं पर जुल्म ढाये। जिस तरह से उप्र में गैंगस्टर्स को ठिकाने लगाया गया, धीरे-धीरे बंगाल के गुंडों को भी कानूनी दायरे में लेकर इंतजाम तो किये जायेंगे।

इसी के साथ बंगाल की जनता के बीच अपनी छवि को विकासात्मक बनाने के लिये तेजी से केंद्र की ओर से वृहद योजनाओं का सिलसिला प्रारंभ किया जायेगा । बंगाल की सीमा को अधिक सुदृढ़ बनाने का अभियान तेजी से चलेगा। जो घुसपैठिये बचे होंगे, उनकी तलाशी व खदेड़ने की कार्रवाई तेज हो जायेगी। बहुसंख्यक वर्ग के सम्मान और अपने प्रति विश्वास बढ़ाने के लिये जो भी आवश्यक होगा, वह करना शुरू करेंगे। इसके साथ यह भी समझना जरूरी होगा कि ममता चुप नहीं बैठ जायेंगी । वे तात्कालिक तौर पर तो जितना हंगामा करना होगा, अवश्य करेगी। धरने,प्रदर्शन,तोड़फोड़ जैसे हथकंडे भी अपनायेगी। जेल भरो आंदोलन भी कर सकती है।

इसी तरह से यदि ममता के नेतृत्व में बंगाल में फिर से तृणमुल का परचम फहराया तो जो हम सोच रहे हैं,उससे कहीं अधिक तमाशा संभावित है। सबसे पहले तो वह बंगाल को राज्य की बजाय अपना राष्ट्र समझकर पेश आयेंगी याने केंद्र के ऐसे कोई आदेश नहीं मानना, जो असुविधाजनक हो। केंद्रीय सहायता और विभागों के बजट पर हक जतायेंगी ही। सबसे पहले तृणमुल के कार्यकर्ता भाजपा समर्थकों को ढ़ूंढ़कर प्रताड़ित करेंगे। लूटमार,बलवा,आगजनी जैसी हरकतें तो सामान्य होंगी। यदि सीपीआरएफ वहां कुछ दिन रुक भी गई तो कितना ? फिर स्थानीय पुलिस के साथ के बिना वह कुछ विशेष नहीं कर पायेगी। बंगाल में सीबीआई व ईडी जैसी एजेंसियों के लिये कुछ भी कर पाना टेढ़ी खीर होगा। इतना ही नहीं तो ममता की महत्वाकांक्षा आसमान में कुलांचे भरती नजर आयेंगी और वह विपक्षी गठबंधन इंडी की नेता बनने को बेताब रहेंगी। कांग्रेस इसे शायद ही बरदाश्त करे और तात्कालिक मान भी लिया तो गांधी परिवार ममता के वर्चस्व को लंबे समय तक सहन तो नहीं कर पायेगा। ममता हर हाल में तब प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखेंगी और दिल्ली कूच में कसर भी नहीं रखेंगी। वे अन्य राज्यों में तृणमुल के विस्तार पर बल देंगी। तब यह भी संभ‌‌व है कि दो-चार महीने बाद बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाये।

ये तो प्रारंभिक तौर पर सामने आने वाली प्रतिक्रियाएं हैं। बहुमत भाजपा को मिले या तृणमुल को, बंगाल में राजनीति नई करवट लेगी और देश किसी बड़े बदलाव या बड़े तमाशे का गवाह जरूर बनेगा। तो आइये, इंतजार करते हैं 4 मई की उस सुबह का,जो आशा और विश्वास की किरणें लेकर आयेंगी या अराजकता,फसाद,अवज्ञा,असहयोग और तुष्टिकरण के नये दौर का आगाज करेंगी,इसकी अभी तो अटकलें ही लगा सकते हैं।