
भोजशाला: एक रिपोर्टर, दंगे, कर्फ्यू और मौत से मुठभेड़
पुष्पेन्द्र वैद्य(टीवी पत्रकार)
धार की भोजशाला की रिपोर्टिंग मैंने उस दौर में शुरू की थी, जब पत्रकारिता का ककहरा सीख ही रहा था। साल 2003 में टीवी मीडिया के मेरे गुरु #Rajesh Badal (#Aajtak के तत्काली ब्यूरो चीफ) ने मुझसे कहा— “तुम धार जाओ, वहाँ भोजशाला को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद गहराता जा रहा है।”
उन दिनों मैं लगभग ट्रेनिंग फेज में ही था। इतने संवेदनशील मुद्दे पर उनका मुझ पर भरोसा जताना मेरे पत्रकारिता जीवन का बड़ा एक्सपोज़र था। कुछ ही घंटों में मैं अपनी टीम के साथ धार पहुँच गया। पूरा शहर पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका था। चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात था और माहौल में एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ था।

तत्कालीन एसपी संजीव शमी मेरे पूर्व परिचित थे। उनसे ऑन-कैमरा बातचीत की, हालात कैमरे में कैद किए और दोनों पक्षों से बात कर एक संतुलित रिपोर्ट तैयार की। मिनी डीवी टेप सड़क मार्ग से ‘आज तक’ के भोपाल दफ्तर भेजी गई। अगले दिन मेरी खबर हेडलाइन बनी।
उस दिन के बाद लगातार 15 दिनों तक दंगे और कर्फ्यू की खबरें कवर करता रहा। धार की होटल पायल में मैंने एक कमरा लिया था। लगभग सभी मीडियाकर्मी वहीं ठहरे हुए थे।

आज भी वह घटना याद कर सिहर उठता हूँ, जब भोजशाला के ठीक सामने पीटीसी करते वक्त दंगे के दौरान एक पत्थर मेरी कनपटी के बेहद करीब से सनसनाता हुआ निकल गया था। कुछ देर के लिए कानों में आवाज तक बंद हो गई थी। उस दिन समझ आया कि ऊपरवाला बाल-बाल कैसे बचाता है।
दंगों के दौरान अमझेरा में घिर जाना, आँसू गैस के गोलों के बीच खुद को और कैमरामैन को बचाना, इंदौर रोड पर एक पक्ष के लोगों द्वारा हमारी गाड़ी रोककर एकतरफा खबर दिखाने का दबाव बनाना— यह सब छोटी उम्र में बड़े अनुभवों की तरह था।

यूँ कहिए कि कई बार मौत को मात देकर हम वहीं डटे रहे और पत्रकारिता के जुनून को जीते रहे।
शुरुआती दौर में हालात नियंत्रित करने के लिए तत्कालीन कलेक्टर और वर्तमान एसीएस ने धारा 144 लागू कर लोगों को घरों में भेजने के उद्देश्य से कर्फ्यू जैसा अलाउंस कराया। हमने उन गाड़ियों की शूटिंग की और उसी आधार पर चैनल पर स्क्रोल चलवा दिया कि “धार में कर्फ्यू लगा दिया गया है।”
उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था। खबरें केवल दो-तीन चैनलों और अखबारों के जरिए ही लोगों तक पहुँचती थीं।
असल में प्रशासन ने औपचारिक रूप से कर्फ्यू लागू नहीं किया था, लेकिन मेरी रिपोर्टिंग के बाद पूरे देश में यह खबर फैल गई कि धार में कर्फ्यू लग चुका है। बाद में कलेक्टर ने नाराजगी जाहिर की। सरकार का दबाव आया तो उन्होंने कहा कि “हमने कर्फ्यू नहीं लगाया।”
लेकिन हम भी अपनी खबर पर डटे रहे, क्योंकि हमारे पास कर्फ्यू अलाउंस करते हुए वाहनों के वीडियो फुटेज मौजूद थे। आखिरकार हालात ऐसे बने कि प्रशासन को मजबूरी में कर्फ्यू लागू करना पड़ा।
उस वक्त कलेक्टर नाराज जरूर हुए, लेकिन बाद में उन्हें यह कहते सुना गया कि अगर उस समय कर्फ्यू नहीं लगाया जाता तो हालात और ज्यादा बेकाबू हो सकते थे, क्योंकि कर्फ्यू के दौरान भी कई घटनाएँ सामने आई थीं।
दंगों के बाद कई दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा। उन दिनों लोग अपने घरों में बैठकर ‘आज तक’ पर हमारे कैमरे से शहर का आँखों देखा हाल देखते थे। हम सड़कों से गुजरते तो लोग हमारी खैरियत पूछते। पूरा शहर मानो हमारा घर-आँगन बन चुका था।
हम किसी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे, लेकिन पूरा शहर हमें नाम और चेहरे से पहचानने लगा था। कोई चाय पर बुलाता, कोई नाश्ते के लिए आग्रह करता तो कोई गरमागरम भोजन के लिए अपने घर के दरवाजे खोल देता।
एक रिश्तेदार की शादी आज भी याद है। धर्मशाला में ठहरे मेहमान कई दिनों तक कर्फ्यू में फँसे रहे थे। हम प्रशासन से उनके लिए राशन और आवागमन की व्यवस्था करवाते थे। बस फिर क्या था— हम उनके लिए मानो देवदूत बन गए थे।
हमारे पहुँचते ही शहर की खबर सुनने के लिए सारे मेहमान इकट्ठा हो जाते। होटल और रेस्टोरेंट बंद थे, लेकिन हमारे लिए खाना हमेशा तैयार रहता। सभी लोग बड़े प्रेम से भोजन कराते।
यही सब यादें आज भी जेहन में ताजा हैं। पता ही नहीं चला कि सूने शहर में पूरा महीना रिपोर्टिंग करते हुए कैसे गुजर गया। धीरे-धीरे हम भोजशाला के “विशेषज्ञ” माने जाने लगे।
प्रदेशभर के पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अफसर और आम लोग दिनभर हमसे धार के हालात पूछा करते थे। इसके बाद भी कई वर्षों तक, चाहे मैं किसी भी चैनल में रहा हूँ, हर शुक्रवार और बसंत पंचमी पर मुझे भोजशाला कवरेज के लिए भेजा जाता रहा।
लगातार दो दशकों तक इस मुद्दे को कवर करने के बाद अब हाल ही में आए हाईकोर्ट के फैसले से कम से कम यह उम्मीद जरूर जगी है कि शायद अब यहाँ स्थायी शांति कायम हो सकेगी।





