गुमसुम हो इस जहाँ से गुम हो गए बद्र साहब…

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गुमसुम हो इस जहाँ से गुम हो गए बद्र साहब…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

यह शेर डॉ. बशीर बद्र साहब का है। जो यादों के उजालों की पोटली बांधकर अपने साथ लेकर बकरीद के दिन इस फानी दुनिया से विदा हो गए। उनकी शायरी को उनकी ही आवाज में सुनने की पूरी दुनिया दीवानी थी। पर यह कुदरत का ही कहर था कि बद्र साहब को सालों से गुमसुमी के दौर में रहना पड़ा और 28 मई 2026 को वह मानो गुम होकर ईद मनाने के लिए उस जहाँ में चले गए, जहां से कोई लौटकर वापस नहीं आता। वह सालों से डिमेंसिया बीमारी से पीड़ित थे। 15 फरवरी 1935 को जन्मे बद्र साहब ने आखिरकार इसी हाल में इस दुनिया को अलविदा कहना बेहतर समझा।

डॉ. बशीर बद्र आधुनिक हिंदी और उर्दू साहित्य के सबसे लोकप्रिय और प्रतिष्ठित शायरों में से एक हैं। अपनी बेहद सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा में गहरी बातें कहने के लिए जाने जाने वाले डॉ. बद्र को मुख्य रूप से उनकी मर्मस्पर्शी ग़ज़लों के लिए याद किया जाता है। उनकी शायरी में प्रेम, विरह, और ज़िन्दगी की सच्चाई का बहुत ही खूबसूरत मिश्रण होता है। उनके शेर आम आदमी के दिलों को छू लेते हैं और आसानी से याद हो जाते हैं। यह शेर पढ़कर हम सभी समझ सकते हैं।

‘कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।’

उनके कई ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें ‘इमली के फूल’, ‘आहटें’, ‘कुल्लियात-ए-बशीर बद्र’ और ‘उजाले अपनी यादों के’ काफी प्रसिद्ध हैं। उर्दू साहित्य और शायरी में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार

द्वारा पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है।

बशीर बद्र उर्दू की मक़बूल हस्तियों में से एक हैं जिन्होंने शेर-ओ-शायरी को नया मुकाम दिया। हर हालात को उन्होंने अपने शब्दों में बयां किया। एक और शेर जो दिल को छू जाता है।

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया,

जिस को गले लगा लिया वो दूर हो गया।

और यह भी कि

‘अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना,

हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है।

डॉ बशीर बद्र साहब के कुछ शेर तो दिल को इस तरह छू रहे हैं मानो उन्होंने अपनी विदाई के समय के लिए ही लिखे हों।

‘चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना

बड़ी दूर तक रात ही रात होगी’ और

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।

शायद यह शेर लिखते समय उन्होंने यह कल्पना की होगी कि मानो यह दुनिया उनके लिए कब्र से भी छोटी हो गई हो। और एक दिन वह उस बड़ी दुनिया में इस अपना आशियाना बनाएंगे, जहां

पहुंचकर यह दुनिया बहुत ही छोटी एक विन्दु की तरह नजर आएगी। लेकिन इसके आगे भी, वह लिखना नहीं भूले कि-

‘मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी

किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।’

बशीर बद्र यानि सैयद मोहम्मद बशीर ने प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहाँ से उन्होंने कला स्नातक , कला स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। बाद में, उन्होंने उसी विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में कार्य किया। उन्होंने सत्रह वर्षों से अधिक समय तक मेरठ कॉलेज में भी अपनी सेवाएं दीं। 1987 में मेरठ हिंसा में उनके घर और किताबों समेत उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचने के बाद, वे स्थायी रूप से भोपाल आ गए। डिमेंसिया के चलते वह अपने मुशायरा काल को भूल चुके थे। उन्होंने सात वर्ष की आयु में कविताएँ लिखना शुरू किया। अपने करियर के दौरान, उन्होंने दो पुस्तकें लिखीं, जिनका शीर्षक था आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला (स्वतंत्रता के बाद उर्दू ग़ज़ल का आलोचनात्मक अध्ययन) और बीसवीं सदी में ग़ज़लें (20वीं सदी की ग़ज़लें)।

उन्होंने बिहार उर्दू अकादमी में अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।

उनके दोहों का भारतीय राजनेताओं पर प्रभाव पड़ा है,और कभी-कभी भारत की संसद में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 2014 के कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी जैसे नेताओं द्वारा उनका उद्धरण दिया जाता है। 1972 में, उनके एक दोहे का उद्धरण जुल्फिकार अली भुट्टो ने दिया था। बदर को साहित्य और संगीत नाटक अकादमी में योगदान के लिए 1999 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें 1999 में उनके कविता संग्रह “आस” के लिए उर्दू में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है। बदर भारतीय पॉप संस्कृति में सबसे अधिक उद्धृत शायरों में से एक हैं।

विविध भारती पर एक लोकप्रिय रेडियो शो ‘उजाले अपनी यादों के’ का शीर्षक बद्र के सबसे लोकप्रिय शेर में से एक से लिया गया है। 2015 की फिल्म मसान में बशीर बदर की कविता और शायरी के कई उदाहरण हैं, साथ ही अकबर इलाहाबादी , चकबस्त , मिर्ज़ा ग़ालिब और दुष्यंत कुमार की रचनाएँ भी शामिल हैं। इसे एक सचेत श्रद्धांजलि बताते हुए, फिल्म के गीतकार वरुण ग्रोवर ने समझाया कि वह शालू (श्वेता त्रिपाठी द्वारा अभिनीत) के किरदार को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाना चाहते थे जिसका शौक हिंदी कविता और शायरी पढ़ना है। क्योंकि यह उत्तरी भारत में मिलेनियल और जेनरेशन एक्स के युवाओं का एक आम शौक है, खासकर प्यार में होने पर, लेकिन हिंदी फिल्मों में इस पहलू को शायद ही कभी दिखाया जाता है। फिर बदर साहब का शेर अगर उन्हें ही समर्पित किया जाए तो

‘जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नजर है,

आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा…।’

ईद के दिन ही डॉ. बशीर बद्र साहब ने अपनी मंजिल को छू लिया है और अब फिर उस मोड़ का हम सभी को इंतजार है जब बद्र साहब फिर आएंगे और अपनी कलम से हम सबके दिलों में उतर जायेंगे… अभी तो यही मानकर संतोष करना पड़ेगा कि गुमसुम हो इस जहाँ से गुम हो गए हम सभी के बद्र साहब…।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।