राम के केवट से राजनीति के केवट तक: भाजपा का यूपी 2027 मिशन शुरू?

72

राम के केवट से राजनीति के केवट तक: भाजपा का यूपी 2027 मिशन शुरू?

जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने 2023 में मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के यादव मतदाताओं तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश की थी, उसी तरह अब मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीसरी सीट के लिए महेश केवट को उम्मीदवार बनाना भी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस फैसले के जरिए उत्तर प्रदेश के नाविक, मछुआरा और निषाद-केवट समुदाय को साधने का प्रयास कर रही है।

मध्य प्रदेश राज्य मछुआ कल्याण बोर्ड के 2 दिन पहले तक अध्यक्ष रहे महेश केवट को राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि भाजपा केवल मध्य प्रदेश की राजनीति नहीं, बल्कि पड़ोसी उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों को भी ध्यान में रख रही है। उत्तर प्रदेश में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 150-160 नदी तटीय क्षेत्रों में मछुआरा और नाविक समुदाय की उल्लेखनीय उपस्थिति है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप और बिंद जैसी अत्यंत पिछड़ी जातियां गंगा, यमुना, गोमती और घाघरा जैसी नदियों के किनारे स्थित 60 से अधिक विधानसभा सीटों पर प्रभावी भूमिका निभाती हैं। ये समुदाय किसी दल को अकेले जीत नहीं दिलाते, लेकिन करीबी मुकाबले में चुनावी नतीजे प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ भाजपा नेता का कहना है कि 2018 के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनावों में भाजपा की हार के पीछे इन समुदायों का एकजुट समर्थन महत्वपूर्ण कारण था। इसके बाद भाजपा ने निषाद समुदाय के साथ अपने राजनीतिक रिश्तों को मजबूत किया और संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ गठबंधन को महत्व दिया।
हालांकि बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच भाजपा अब सीधे इस सामाजिक समूह के भीतर अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महेश केवट की उम्मीदवारी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

एक चुनावी विश्लेषक के मुताबिक , विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश साहनी उत्तर प्रदेश में निषाद-बिंद वोट बैंक को संगठित करने के लिए सक्रिय हैं। वहीं हाल में गाजीपुर के कमलेश बिंद एनकाउंटर मामले पर संजय निषाद का अपनी ही सरकार की पुलिस के खिलाफ कड़ा रुख भी भाजपा के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।
ऐसे में भाजपा महेश केवट को राज्यसभा भेजकर पूरे नाविक-मछुआरा वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सम्मान का संदेश देना चाहती है।
एक अन्य जानकार का कहना है निवाड़ी जिले के महेश केवट की उम्मीदवारी का असर मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में भी दिखाई दे सकता है। दोनों राज्यों के बुंदेलखंड क्षेत्र सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से काफी हद तक जुड़े हुए हैं।

उनके अनुसार, किसी समुदाय को पड़ोसी राज्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलने का सकारात्मक संदेश दूसरे राज्य तक भी पहुंचता है। इससे भाजपा को उत्तर प्रदेश में इस वर्ग के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और क्षेत्रीय सहयोगी दलों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
महेश केवट की उम्मीदवारी को और महत्वपूर्ण उनका सामाजिक और धार्मिक जुड़ाव बनाता है। उनका परिवार वर्षों से ओरछा स्थित हरदौल का बैठक के प्रमुख पुजारियों से जुड़ा रहा है। वर्तमान में उनके भाई मुकेश वहां पुजारी हैं, जबकि उनकी अनुपस्थिति में महेश केवट स्वयं भी पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभाते हैं।
बुंदेलखंड में लोकदेवता हरदौल के प्रति गहरी आस्था है और इसी कारण महेश केवट तथा उनका परिवार नाविक और मछुआरा समुदाय के बीच विशेष सम्मान रखता है।

WhatsApp Image 2026 06 09 at 3.36.18 PM

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की राजनीति में राज्यसभा उम्मीदवारों का चयन केवल संबंधित राज्य तक सीमित नहीं रहता। जिस तरह पंजाब के नेता तरुण चुघ को मध्य प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर पंजाब के राजनीतिक संदेश से जोड़ा जा रहा है, उसी तरह महेश केवट की उम्मीदवारी को भी उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है
हालांकि कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्यसभा की एक उम्मीदवारी से सीधे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दूरगामी राजनीतिक निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। उनका कहना है कि भाजपा अक्सर अप्रत्याशित राजनीतिक फैसलों के लिए जानी जाती है और महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर उसने एक बार फिर यह साबित किया है। इन जानकारों के अनुसार, इस निर्णय को उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों से जोड़कर देखने के बजाय मध्य प्रदेश में सामाजिक संतुलन साधने और अत्यंत पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

ऐसे में मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट पर महेश केवट की दावेदारी केवल एक संसदीय चुनाव नहीं, बल्कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले नाविक, मछुआरा और निषाद-केवट समुदाय को साधने की भाजपा की व्यापक सामाजिक और राजनीतिक रणनीति के रूप में देखी जा रही है।