साहस को सलाम…20 मासूमों को जीवन दे गई कंचन बाई, खुद मधुमक्खियों के डंक में समा गई

684

साहस को सलाम…20 मासूमों को जीवन दे गई कंचन बाई, खुद मधुमक्खियों के डंक में समा गई

Neemuch: नीमच जिले के रानपुर गांव में सोमवार दोपहर जो हुआ, वह केवल एक हादसा नहीं था, बल्कि ममता, साहस और बलिदान की ऐसी मिसाल थी, जिसने पूरे गांव को स्तब्ध कर दिया। मडावदा पंचायत के आंगनबाड़ी केंद्र परिसर में खेल रहे बच्चों पर अचानक पास के पेड़ से मधुमक्खियों के झुंड ने हमला कर दिया। चीख-पुकार मच गई। मासूम बच्चे जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे।

इसी क्षण आंगनबाड़ी केंद्र से जुड़ी और ‘जय माता दी’ स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष कंचन बाई मेघवाल बिना एक पल सोचे बच्चों की ओर दौड़ीं। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना बच्चों को बचाने का निर्णय लिया। पास पड़ी तिरपाल और दरी को उठाकर उन्होंने एक-एक बच्चे को ढकते हुए सुरक्षित कमरे तक पहुंचाया। मधुमक्खियों का पूरा झुंड उन पर टूट पड़ा, लेकिन कंचन बाई तब तक नहीं रुकीं, जब तक आखिरी बच्चा सुरक्षित नहीं हो गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बच्चों को बचाते समय कंचन बाई के शरीर पर हजारों डंक लगे। दर्द और जलन के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। बच्चों के सुरक्षित होते ही उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। गांव के लोग उन्हें तुरंत 112 एंबुलेंस से सरवानिया स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

WhatsApp Image 2026 02 05 at 16.16.20

कंचन बाई सिर्फ एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता नहीं थीं। वे अपने परिवार की एकमात्र कमाऊ सदस्य थीं। उनके पति शिवलाल लकवा से पीड़ित हैं। घर में एक बेटा और दो छोटी बेटियां हैं। उनके निधन ने परिवार को गहरे शोक और असहाय स्थिति में छोड़ दिया है। गांव में हर आंख नम है और हर जुबान पर एक ही बात है कि अगर कंचन बाई हिम्मत न दिखातीं, तो आज कई घरों के चिराग बुझ चुके होते।

इस घटना के बाद रानपुर गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि कंचन बाई ने जो किया, वह सामान्य साहस नहीं बल्कि सर्वोच्च बलिदान है। उन्होंने अपनी जान देकर बीस बच्चों को नया जीवन दिया। अब गांव और समाज प्रशासन से उम्मीद कर रहा है कि इस बलिदान को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित न रखा जाए।

ग्रामीणों की मांग है कि कंचन बाई के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता दी जाए, उनके बच्चों की शिक्षा और भविष्य की जिम्मेदारी सरकार उठाए और आंगनबाड़ी केंद्रों तथा स्कूलों के आसपास मौजूद खतरनाक मधुमक्खी छत्तों को तत्काल हटाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसा कोई हादसा दोहराया न जाए। साथ ही कंचन बाई के साहस को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत सम्मान दिया जाना चाहिए।

कंचन बाई मेघवाल अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन रानपुर गांव के बीस बच्चे हर सांस के साथ उनकी ममता और बलिदान की कहानी को जिंदा रखेंगे। यह कहानी याद दिलाती है कि सच्चा साहस किसी पद, वर्दी या ताकत का मोहताज नहीं होता। कभी-कभी वह एक साधारण महिला के रूप में सामने आता है, जो दूसरों को बचाने के लिए खुद को दांव पर लगा देती है।