A Story of Administrative Failure: भागीरथपुरा दूषित जल कांड- देरी,अनसुनी चेतावनियाँ और अटके काम त्रासदी की ओर ले गए

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A Story of Administrative Failure: भागीरथपुरा दूषित जल कांड- देरी,अनसुनी चेतावनियाँ और अटके काम त्रासदी की ओर ले गए

के. के. झा की विशेष रिपोर्ट

इंदौर: इंदौर की भगीरथपुरा जल त्रासदी—जिसमें अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है—के बाद एक असहज और गंभीर सवाल सामने खड़ा है: क्या व्यवस्था इस हादसे से कोई सबक लेगी, या अगली चेतावनी को भी जानलेवा बनने का इंतज़ार किया जाएगा?

दिसंबर 2025 के अंतिम दिनों में नर्मदा जलापूर्ति पर निर्भर भगीरथपुरा इलाका जलजनित बीमारी के भीषण प्रकोप का केंद्र बन गया। सीवर से दूषित पानी घरों तक पहुँचा, जिससे कई परिवार उजड़ गए और सैकड़ों लोग गंभीर दस्त, डिहाइड्रेशन और अन्य जटिलताओं के चलते अस्पतालों में भर्ती हुए। इस घटना ने ‘भारत के सबसे स्वच्छ शहर’ की छवि पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया और इंदौर की पेयजल व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को उजागर कर दिया।

शिकायतें दर्ज होती रहीं, कार्रवाई टलती रही

भागीरथपुरा के निवासियों के मुताबिक, संकट के संकेत काफी पहले दिखने लगे थे। मौतों से कई सप्ताह पहले ही लोगों ने नगर निगम की हेल्पलाइन और स्थानीय अधिकारियों को पानी के बदबूदार, मटमैले और असामान्य होने की शिकायतें दर्ज कराई थीं। हालात इतने बिगड़ चुके थे कि कई परिवारों ने नल का पानी पीना बंद कर दिया था।

नगर निगम के रिकॉर्ड और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बयानों से भी पुष्टि होती है कि इलाके की पाइपलाइन में खामियाँ पहले ही चिन्हित कर ली गई थीं। नवंबर 2024 में नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव तैयार किया गया, लेकिन वह महीनों तक फाइलों में दबा रहा। जुलाई 2025 में जाकर टेंडर जारी हुआ—करीब आठ महीने बाद।

टेंडर जारी होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर काम शुरू नहीं हुआ। दिसंबर 2025 के मध्य, जब शिकायतें दोबारा तेज़ हुईं, तब भी न तो जलापूर्ति रोकी गई और न ही कोई आपात मरम्मत कराई गई।

सीवर का पानी नलों तक कैसे पहुँचा

जांच में यह तथ्य सामने आया कि पीने के पानी की पाइपलाइन एक सार्वजनिक शौचालय के बेहद पास से गुजर रही थी, जहाँ सीवर लाइन की स्थिति भी खराब थी। क्षतिग्रस्त पाइपलाइन के माध्यम से सीवर का पानी नर्मदा जलापूर्ति में मिल गया और पूरे इलाके में दूषित पानी फैल गया।

जल विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने शहरी इलाकों में यह एक जाना-पहचाना खतरा है। जर्जर पाइपलाइन, पानी के दबाव में उतार-चढ़ाव और समय पर मरम्मत न होने की स्थिति में ऐसे हादसे लगभग तय हो जाते हैं। भगीरथपुरा में यह जोखिम लंबे समय से मौजूद था, लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया गया।

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जानें जाने के बाद हरकत में आया प्रशासन

जब अस्पतालों में जलजनित बीमारियों के मरीजों की संख्या अचानक बढ़ने लगी और मौतें सामने आने लगीं, तब प्रशासन सक्रिय हुआ। दूषित जलापूर्ति को बंद किया गया, टैंकरों से वैकल्पिक पानी उपलब्ध कराया गया और बड़े पैमाने पर क्लोरीनेशन किया गया। स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर स्क्रीनिंग में जुटीं।

मध्यप्रदेश सरकार ने लापरवाही के आरोप में इंजीनियरों को निलंबित किया, वरिष्ठ नगर निगम अधिकारियों को हटाया और विभागीय जांच के आदेश दिए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की। हालाँकि, प्रभावित परिवारों के लिए यह कार्रवाई बहुत देर से आई।

AMRUT योजना: निवेश हुआ, लेकिन ज़मीन पर असर सीमित

इंदौर, अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT) और AMRUT 2.0 के तहत जलापूर्ति सुधार के लिए बड़े निवेश पाने वाला शहर है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जल शोधन संयंत्र और इंटेक सिस्टम जैसी कुछ परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ा है, लेकिन वितरण नेटवर्क से जुड़े कई अहम कार्य अब भी टेंडर या शुरुआती चरणों में ही अटके हुए हैं।

पुराने इलाकों—जैसे भगीरथपुरा—में जर्जर पाइपलाइनों को बदलना प्रस्तावित था, लेकिन यह काम समय पर पूरा नहीं हो सका।

यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि अब तक किसी आधिकारिक ऑडिट या सरकारी रिपोर्ट ने भगीरथपुरा हादसे के लिए AMRUT योजना में भ्रष्टाचार, धन के दुरुपयोग या सीधे नियम उल्लंघन की पुष्टि नहीं की है। लेकिन उपलब्ध तथ्यों से यह ज़रूर सामने आता है कि कामों की धीमी रफ्तार, बिखरा हुआ क्रियान्वयन और निर्णयों में देरी ने कमजोर ढांचे को लंबे समय तक चालू रहने दिया।

कुछ मामलों में नगर निगम अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया है कि AMRUT परियोजनाओं से टकराव से बचने के नाम पर स्थानीय मरम्मत कार्य टाल दिए गए, जिससे तात्कालिक समाधान और देर से हुआ।

योजना से आगे की विफलता

यह त्रासदी केवल किसी एक योजना की नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की प्रशासनिक उदासीनता की भी कहानी है। वर्ष 2025 में इंदौर में पानी की गुणवत्ता से जुड़ी दर्जनों शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से कई को बिना स्थायी समाधान के ही बंद कर दिया गया। भगीरथपुरा भी उन्हीं इलाकों में शामिल था।

विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे योजना कितनी भी बड़ी क्यों न हो, यदि ज़मीनी निगरानी, समय पर मरम्मत और जवाबदेही सुनिश्चित न हो, तो ऐसी आपदाएँ टाली नहीं जा सकतीं।

शहर के लिए चेतावनी

भगीरथपुरा की घटना नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करती है। स्वच्छता और कचरा प्रबंधन में इंदौर की उपलब्धियाँ हर नागरिक के लिए सुरक्षित पेयजल की गारंटी नहीं बन सकीं।

तेज़ी से फैलते शहर और नई परियोजनाओं के दौर में अब चुनौती योजनाएँ घोषित करने की नहीं, बल्कि उन्हें समय पर लागू करने, नागरिक शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करने और जल सुरक्षा को सार्वजनिक स्वास्थ्य की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाने की है।

जिन परिवारों ने अपनों को खोया, उनके लिए यह सीख बेहद भारी कीमत पर आई है। अब सवाल यही है—क्या व्यवस्था इसे याद रखेगी, या इतिहास खुद को दोहराएगा?

(लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं समसामयिक मामलों के विश्लेषक हैं।)