
पत्नी की पाती पति के नाम :मेरे पापा ने दुनिया का सबसे बेहतरीन इंसान मेरे लिए तलाश किया
शादी की सालगिरह पर एक प्रेम पाती क्यों लिखी जानी चाहिए ?”पत्नी की पाती” यानी पत्नी का पत्र या संदेश, दांपत्य जीवन में प्यार, विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव को व्यक्त करने का एक खूबसूरत जरिया है। यह संवाद को बेहतर बनाता है, गलतफहमियों को कम करता है और रोजमर्रा की भागदौड़ में प्रेम को जीवित रखने में मदद करता है।-आप भी हमें पाती लिख कर भेज सकते हैं – सम्पादक
श्री नरेंद्र सूर्यवंशी और श्रीमती नीलम सूर्यवंशी को शादी की सालगिरह पर बधाई और शुभकामनाएं –



फिर से एक नई शुरुआत है यह —
नीलम सूर्यवंशी

आनंद, उत्साह, उमंग ये वैभव, ये चमक, ये दमक और साथ में माथे की इन रेखाओं का उभरना, उस पर सजी हुई ये सुर्ख लाल रंग की बिंदी, घनी काली जुल्फें जिस पर अब कुछ-कुछ सफेद चाँदनी कहीं -कहीं छिटकीं हुई हैं। इन्ही जुल्फों में कभी-कभी तुम्हारें अक्स का उभर आना, ये बरसों का सफ़र है, जिसमें हम, तुम साथ-साथ चलें हैं। ये साथ सुख दुख की परछाई तले कच्ची, गुनगुनी धूप में मखमली एहसास लिए हुए आज भी है।
इस बरस दर बरस के सफ़र को आसान बनाने के लिए कभी रिश्तों की भट्टी में तपकर सोना बनना पड़ा है, तो कभी संगम के पानी में डुबकीं लगाकर ठंडाई को औढ़ना पड़ा है। तब कहीं जाकर इस दुनिया में एक खुशनुमा, खूबसूरत घरौंदे का सपना साकार हुआ है।
अच्छा घर-परिवार जहाँ भाई-बहन जैसे ननंद-देवर हों, अच्छा पढ़ा-लिखा, कमाऊ पति मिले जो देखने-सुनने में भी कुछ ठीक-ठाक हो— हमारें दौर की हर लड़की सिर्फ़ यही सपना देखती थीं। जैसे ही उसकी ये दो-तीन बातें पूरी हो जाती थीं, वो अपनी पहचान भूल कर उसमें ही अपनें अस्तित्व को घुलामिला देती थीं।
मुझें आज भी बहुत अच्छी तरह याद हैं, जब मैं B.Com. 1st year में नई-नई कॉलेज में गई थीं, हमारे एक प्रोफेसर नें सब लड़कियों से पूछा था कि कौन क्या बनना चाहता हैं?
मेरा वीज़न बहुत साफ़ था, मुझें शादी करना है और होम-मेकर बनना है। उस समय की लड़कियों की परवरिश ही ऐसी होती थी। और भी सोचूँ तो माँ की बहुत सी बातें याद आती है, जैसे कभी-कभी वो मुझसें दो-चार रोटियाँ बनवातीं थी; कभी कहतीं मैं यहीं पर खड़ी हूँ तुम सब्ज़ी में छौंक लगाओं; कभी कहतीं तुम सिलाई, कढ़ाई, बुनाई सीख लो, काम आयेगा। एक दिन मैंने चिढ़ कर कहा, “मुझें कुछ नहीं सिखना है ,सब कुछ बाज़ार में मिलता है और आप देखना मेरे घर में दरवाजा खोलनें के लिए भी लोग होंगे।” तब मुझे क्या पता था कि अंजाने में कही गई बात एक दिन सच हो जाएगी। माँ नहीं मानी तो ग्यारहवीं कक्षा में होम साइंस सब्जेक्ट दिलवा दिया था, जो बाद में मैंने तीन महीनें पढ़ कर सब्जेक्ट बदल लिया था।

आज मुझें ऐसा लगता है; जैसे ये सारी बातें मेरे सपनों को साकार करने के लिए आधार स्तंभ की तरह थीं।
मुझें नहीं मालूम कि कितनें लोगों के सपनें साकार हुए होंगे। लेकिन आज मैं पूरें यकीन के साथ कह सकती हूँ कि मेरा यह सपना साकार हुआ है। एक अच्छा परिवार, एक नेक इंसान, जो मन का सच्चा और कमाऊ है, और जो दूसरों से बहुत अलग हैं, वो मुझें पति के रूप में मिला है। मेरे पापा की खोज पर मुझें बहुत गर्व है।
नरेंद्र सिर्फ़ अपने मम्मी-बाबूजी, भाई-बहनों, पत्नी और बच्चों के साथ ही रहना पसंद करते हैं, उनकीं सारी दुनिया मम्मीं की डाँट में, बाबूजी जी की उम्मीदों में, बहनों के अधिकार में, छोटें भाई के दिए गए सम्मान में, बच्चों के दुलार में और घर के हर एक कोने में मेरी मौजूदगी में बसती हैं। बस इतनी ही छोटी उनकीं दुनियाँ है। जल्दी किसी और से घुलतें मिलतें नहीं हैं। पान, बीड़ी-सिगरेट, शराब जैसी ख़राब आदतें इतनें सालों में मैंने कभी नहीं देखीं।
रोज़ सुबह उठना, दो घंटे में आराम से तैयार होना, फिर ऑफिस में सारा दिन काम करना और फिर शाम को बिना समय गवाए वापस घर लौट आना। बरसों से यही दिनचर्या है। छुट्टी लेना, घूमना, आराम करना तो जैसे जानते ही नहीं हैं। वो कहतें हैं ना कि “जहाँ नाम हो तो फिर आराम नहीं हो सकता।”
जब कोई किसी को प्रेम करता है तो वो कहनें के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती है, ना ही उसे परिभाषित किया जा सकता है, बल्कि वो अपने आप व्यवहार में, आदतों में हर दिन की दिनचर्या में छलकता है। जिसें सिर्फ महसूस करने की जरूरत होती हैं।
जब दो लोग एक ही जिंदगी में अपने तमाम गिले-शिकवों को भुलाकर साथ-साथ बूढ़े होनें को तैयार हों, एक दूसरे का अपने आप सहारा बननें लगे, तो समझों बस यही इस दुनिया का प्यार है।

कई बार मैं महसूस करती हूँ की उन्हें मानव जीवन कुछ विशिष्ट करनें और लोगों की सेवा करने के लिए मिला है, जिस दिन भी वो किसी और की मदद कर देतें हैं, और वो अपने किए हुए काम से संतुष्ट हो जातें हैं, तो उनकें चेहरें पर एक अलग़ तरह की संतुष्टि का भाव मुझें दिखाई देता है।
बैतूल के कलेक्टर निवास में एक छोटा सा तालाब है और वो हजारो मछलियों का घर है। नरेंद्र उन्हें रोज़ सुबह ख़ुद के खाना खाने से पहले उनकों खाना ख़िलातें। दो साल से अधिक हमें यहाँ पर हो गए थे, अब यहाँ से जानें का समय नज़दीक था। किसी भी समय सरकारी फरमान जारी हो सकता था। नरेंद्र की चिंता थी कि इन मछलियों को गर्मी में पानी कैसे मिलेगा ताकि ये जीवित रह सकें, गर्मिया भी सर पर थी।
तभी उन्हें याद आया बंगले में एक कुवाँ भी है जो बरसों से बंद पड़ा है, उसमें देखा तो पानी तो था। फिर कुवें को जीर्णोद्धार किया गया, सफ़ाई करवाई। कुवें से लेकर तालाब तक एक पाइप लाइन बिछाई गई, और उसमें मोटर लगाकर पानी सीधे तालाब में मछलियों तक पहुंचाया गया।
ये सारा काम कई दिनों की मेहनत और मशक़्क़त के बाद पूरा हुआ। उसके बाद उन्होंने मुझें बताया कि मैंने मछलियों के लिए परमानेंट व्यवस्था कर दी है और अब मैं निश्चिंत होकर यहाँ से जा सकता हूँ।
मछलियाँ हों या इंसान हों या ख़ुद का परिवार हो, हर एक के लिए सोचते हैं कि मैं हर वो काम कर दूँ जो मैं कर सकता हूँ, जिससे एक राह बन जाये और इनका आगे का जीवन आसान हो जाए।
उनकीं यही दूर की सोच है जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है।
उनका निरंतर चलते रहना, बिना रुके काम करना, हर किसी के लिए अच्छा सोचना ये जितनें भी गुण हैं, मैं चाहती हूँ की वो सब हमारी अगली पीढ़ी ऐसे के ऐसे ही विरासत में उनसें ले लें।
अब मैं पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ की मेरे पापा की पसंद पर मुझे बहुत गर्व है। उन्होंने दुनिया का सबसे बेहतरीन इंसान मेरे लिए तलाश किया है।ऐसा नहीं है कि उनमें कोई कमी नहीं है, शायद परफेक्ट कोई नहीं होता है, इसलिए वो इंसान होते हैं।
अब ३१ बरसों बाद कुछ नए रिश्तें कुछ नए बंधन में हम बंध गए हैं, परिवार बड़ा हुआ है मन का आँगन खिल उठा है।
सास-ससुर, समधी-समधन की नई भूमिका मिली है, इन नए रिश्तों को सजाना संवारना है।
फिर से एक नई शुरुआत हुई है,
ये प्यार के बंधन यूँ ही बनें रहें।
गर फुर्सत हो तो बैठ
मेरे पास,
तुझ पर एक किताब
लिखूँ ,
कितना सोचती हूँ तेरे बारे में
शब्दों में बेहिसाब लिखूँ ।।





