NTRO में पदस्थ 2013 बैच के IPS अभिषेक तिवारी का VRS, सागर हादसे के बाद बदली दिशा

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NTRO में पदस्थ 2013 बैच के IPS अभिषेक तिवारी का VRS, सागर हादसे के बाद बदली दिशा

▪️राजेश जयंत

New Delhi: मध्य प्रदेश कैडर के 2013 बैच के आईपीएस अधिकारी अभिषेक तिवारी ने भारतीय पुलिस सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर एक लंबा और चर्चित अध्याय समाप्त करने का फैसला किया है। फिलहाल वे केंद्र सरकार के अधीन National Technical Research Organisation में पदस्थ थे और वहीं से उन्होंने VRS के लिए आवेदन किया। कई जिलों में पुलिस अधीक्षक के रूप में सक्रिय भूमिका निभा चुके, राष्ट्रपति से वीरता पुरस्कार प्राप्त कर चुके इस अधिकारी का सेवा से अलग होना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा। प्रशासनिक गलियारों में इसे सागर की दीवार गिरने की घटना के बाद बदले हालात, सिस्टम के भीतर जवाबदेही तय करने के तरीके और एक सक्षम अधिकारी की सीमित होती कार्य स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जा रहा है।

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कहां-कहां पदस्थ रहे, किन जिलों में निभाई अहम भूमिका

आईपीएस सेवा में आने के बाद अभिषेक तिवारी को मध्य प्रदेश के कई चुनौतीपूर्ण जिलों में जिम्मेदारी सौंपी गई। उनकी पहली एसपी पोस्टिंग बालाघाट में हुई, जो नक्सल गतिविधियों और सीमावर्ती अपराधों के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। यहां उन्होंने फील्ड पुलिसिंग, इंटेलिजेंस आधारित कार्रवाई और अपराध नियंत्रण पर फोकस किया। इसके बाद वे सागर और रतलाम जैसे महत्वपूर्ण जिलों में एसपी रहे। रतलाम में उन्होंने संगठित अपराध, अवैध कारोबार और कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों में सख्त प्रशासनिक छवि बनाई।

● उल्लेखनीय उपलब्धियां और प्रोफेशनल पहचान

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अभिषेक तिवारी को एक ऐसे अधिकारी के रूप में जाना गया जो निर्णय लेने में संकोच नहीं करते थे। फील्ड में मौजूद रहकर काम करना, तकनीक का उपयोग करना और अधीनस्थों से सीधा संवाद उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा। कानून व्यवस्था को लेकर उनका रुख स्पष्ट और सख्त रहा, वहीं पुलिसिंग को आधुनिक बनाने की सोच भी उनके काम में दिखी। इन्हीं गुणों के चलते उन्हें राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।

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एक लोक सेवक के रूप में छवि और आमजन से जुड़ाव

एक लोक सेवक के रूप में अभिषेक तिवारी की छवि एक ऐसे अफसर की रही जो सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं था। आमजन के बीच वे सुलभ, संवाद शील और कार्रवाई करने वाले अधिकारी के रूप में पहचाने गए। कई मामलों में उन्होंने पीड़ितों से सीधे संवाद कर समाधान निकालने की कोशिश की। यही वजह रही कि ट्रांसफर या पद से हटाए जाने के बाद भी उनके समर्थकों और शुभचिंतकों की संख्या बनी रही।

युवा वर्ग में क्रेज और प्रेरणा का चेहरा

अभिषेक तिवारी का व्यक्तित्व और शैक्षणिक पृष्ठभूमि युवाओं के बीच खासा आकर्षण रखती रही। इंजीनियरिंग, आईआईएम की पढ़ाई, कॉरपोरेट अनुभव और फिर आईपीएस तक का सफर उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए एक प्रेरक उदाहरण बनाता है। सोशल मीडिया और सिविल सेवा से जुड़े मंचों पर उनका नाम अक्सर एक ऐसे अधिकारी के रूप में लिया जाता रहा, जिसने वैकल्पिक करियर छोड़कर सेवा का रास्ता चुना।

पारिवारिक बैकग्राउंड और शिक्षा दीक्षा

अभिषेक तिवारी मूल रूप से सिवनी जिले के निवासी हैं। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले अभिषेक ने पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी। उन्होंने जबलपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इंदौर स्थित आईआईएम से फाइनेंस में जीपीडीएम किया। यह शैक्षणिक संयोजन उन्हें प्रशासनिक सेवा में एक अलग पहचान देता है, जहां तकनीक और मैनेजमेंट दोनों की समझ जरूरी होती है।

यूपीएससी की तैयारी और आईपीएस बनने की राह

कॉरपोरेट सेक्टर में काम करते हुए भी अभिषेक तिवारी के भीतर सिविल सेवा में जाने की इच्छा बनी रही। उन्होंने यूपीएससी की तैयारी शुरू की और 2013 में भारतीय पुलिस सेवा के लिए चयनित हुए। उनका चयन यह दर्शाता है कि निजी क्षेत्र में स्थिर करियर के बावजूद उन्होंने जोखिम उठाकर सेवा का रास्ता चुना।

भारतीय पुलिस सेवा से पहले का प्रोफेशनल अनुभव

आईपीएस बनने से पहले अभिषेक तिवारी ने मुंबई की एक निजी मैनेजमेंट कंपनी में लगभग दो वर्षों तक डिप्टी मैनेजर के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्हें कॉरपोरेट गवर्नेंस, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और प्रोफेशनल डिसीजन मेकिंग का अनुभव मिला, जिसका असर बाद में उनकी प्रशासनिक कार्यशैली में भी दिखाई दिया।

सागर हादसा और करियर का टर्निंग प्वाइंट

सागर में दीवार गिरने की घटना उनके करियर का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुई। इस हादसे में मासूम बच्चों की मौत के बाद प्रशासनिक स्तर पर तत्काल कार्रवाई हुई और तत्कालीन एसपी के रूप में उन्हें पद से हटा दिया गया। हालांकि यह घटना शहरी अव्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की लापरवाही से जुड़ी थी, फिर भी पुलिस प्रशासन की जवाबदेही तय की गई। इस फैसले को लेकर लंबे समय तक सवाल उठते रहे कि क्या यह संतुलन बनाने की कार्रवाई थी या एक अफसर को उदाहरण बनाने की प्रक्रिया।

NTRO में प्रतिनियुक्ति और सोच में बदलाव

सागर प्रकरण के बाद अभिषेक तिवारी की प्रतिनियुक्ति नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन में हुई। यहां उन्होंने साइबर सुरक्षा, तकनीकी इंटेलिजेंस और आधुनिक सुरक्षा ढांचे से जुड़े कामों में अनुभव हासिल किया। इसी दौरान उनके भीतर यह सोच और मजबूत हुई कि वे पारंपरिक पुलिसिंग से आगे बढ़कर टेक्नोलॉजी आधारित क्षेत्र में योगदान देना चाहते हैं।

VRS और बदली हुई दिशा

आधिकारिक तौर पर VRS का कारण निजी और प्रोफेशनल योजनाएं बताई गई हैं। लेकिन व्यापक तौर पर यह फैसला सिस्टम के भीतर सीमाओं, जवाबदेही की राजनीति और एक सक्षम अधिकारी की बदलती प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है। यह केवल सेवा से विदाई नहीं, बल्कि एक नई दिशा की शुरुआत मानी जा रही है।

● आगे क्या

अब माना जा रहा है कि अभिषेक तिवारी साइबर सिक्योरिटी, टेक्निकल कंसल्टेंसी या राष्ट्रीय स्तर की टेक्नोलॉजी परियोजनाओं में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। उनका सफर यह संकेत देता है कि प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी कई अधिकारी अब अपने लिए नई राहें तलाश रहे हैं।

कुल मिलाकर, आईपीएस अभिषेक तिवारी का VRS एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है जहां काबिलियत, जवाबदेही और स्वतंत्रता के बीच संतुलन लगातार चुनौती बना हुआ है।