
इंदौर दूषित जल त्रासदी के बाद प्रशासनिक फेरबदल, पर सवाल बरकरार—क्या जवाबदेही सिर्फ अफसरों की ही बनेगी?
वरिष्ठ पत्रकार के के झा की विशेष रिपोर्ट
इंदौर: देश के सबसे स्वच्छ शहर के तमगे पर एक बार फिर गहरी चोट पड़ी है। भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के सेवन से करीब 15 लोगों की मौत के बाद राज्य सरकार ने त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को हटा दिया और 2014 बैच के IAS अधिकारी क्षितिज सिंघल को नया नगर निगम आयुक्त नियुक्त किया है। सिंघल ने शनिवार को ही पदभार ग्रहण कर लिया।
क्षेत्र में हुई मौतों ने न केवल नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र की जवाबदेही को लेकर भी बहस छेड़ दी है।
नए आयुक्त क्षितिज सिंघल को प्रशासनिक हलकों में एक सख्त, स्पष्टवादी और निर्णय लेने वाले अधिकारी के रूप में जाना जाता है। वे इससे पहले उज्जैन नगर निगम और एक विद्युत वितरण कंपनी में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनकी कार्यशैली कई बार राजनीतिक नेतृत्व से अलग और स्वतंत्र रही है।
जल संकट मामले में सरकार की कार्रवाई यहीं नहीं रुकी।
अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया को कारण बताओ नोटिस जारी कर इंदौर से स्थानांतरित किया गया।
इसके बाद नगर निगम में तीन IAS अधिकारियों—आकाश सिंह, प्रखर सिंह (डायरेक्ट भर्ती) और आशीष पाठक (पदोन्नत IAS) की तैनाती की गई।
गौरतलब है कि दिलीप कुमार यादव का कार्यकाल अब तक का सबसे छोटा रहा—वे 9 सितंबर को ही पदभार संभाल पाए थे और महज चार माह में हटा दिए गए।
हालांकि, इन प्रशासनिक कदमों के बीच एक बड़ा और असहज सवाल सामने आ रहा है—
क्या इतनी बड़ी जनहानि की जवाबदेही सिर्फ नगर निगम अधिकारियों तक सीमित रहेगी?
जब एक घनी आबादी वाले इलाके में दूषित पानी लोगों की जान ले सकता है, तो क्या स्थानीय पार्षद, महापौर,क्षेत्रीय विधायक, और संबंधित जनप्रतिनिधियों
की कोई जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए?
जनस्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी त्रासदियां अचानक नहीं होतीं। यह लापरवाही, अनदेखी और निगरानी तंत्र की विफलता का नतीजा होती हैं। ऐसे में केवल अधिकारियों को हटाकर क्या सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है?
नए आयुक्त क्षितिज सिंघल से शहर को सख्त कार्रवाई और सुधार की उम्मीद जरूर है। उल्लेखनीय है कि वे हाल ही में चर्चा में आए थे, जब उन्होंने 1 जनवरी को बिना किसी पारंपरिक रस्म के, कोर्ट मैरिज के जरिए IAS अधिकारी शीतला पटले से विवाह किया, जो वर्तमान में सिवनी की कलेक्टर हैं।
*लेकिन इंदौर की जनता के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है* —
क्या यह मामला सिर्फ फाइलों और तबादलों तक सीमित रहेगा, या जवाबदेही वहां तक पहुंचेगी जहां असली नियंत्रण और निर्णय की शक्ति होती है?
जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलता, तब तक प्रशासनिक बदलाव भी जनता का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं कर पाएंगे।





