
इंदौर में आवारा पशु प्रतिबंध- महू में हर तरफ ढोर ही ढोर, हाई कोर्ट ने जनहित याचिका में कैंट बोर्ड अध्यक्ष और CEO को दिए आदेश
दिनेश सोलंकी की रिपोर्ट
मात्र 21 किलोमीटर का अंतर देखिए, इंदौर शहर में स्वच्छता सर्वेक्षण में बार-बार नंबर 1 आने का एक मुख्य कारण समूचे शहर में है आवारा पशुओं के विचारण पर रोक है, वहीं, किसी जमाने में नीड एंड क्लीन कहे जाने वाली देश की बड़ी सैन्य छावनी महू में आवारा पशुओं पर कोई प्रतिबंध नहीं है और ना ही इनकी रोकथाम के प्रयास किए जाते हैं। हालात यह हैं कि शहर से लेकर सैन्य इलाके तक पशुओं का खुलेआम विचरण होता है, जिसे लेकर कई घटनाएं हो चुकी हैं और लोगों को ऐसा लगने लगा है कि वह पशुओं के बीच ही पलने लगे हैं। इसके बाद भी यहां के नेता नहीं जागे, ना पूर्व पार्षद जागे, न सामाजिक संगठन जागे, लेकिन एक व्यक्ति ने साहस बटोर कर जागरूकता का परिचय देते हुए स्वयं के द्वारा जनहित याचिका इंदौर उच्च न्यायालय में दायर की थी जिसकी मंगलवार को डबल बैंच ने सुनवाई की और छावनी परिषद अध्यक्ष और सीईओ को दो सप्ताह का समय उनके ही वकील आशुतोष नीमगांवकर के माध्यम से देने का आदेश जारी किया है।

*अशोक श्रीवास्तव कई महीने से प्रयासरत थे*
महू लुनियापुरा निवासी अशोक श्रीवास्तव पिछले लंबे समय से रेलवे की समस्याओं के निराकरण के लिए प्रयासरत रहे हैं। पिछले कई महीनों से उन्होंने महू शहर में लगातार बढ़ रहे आवारा पशुओं के खिलाफ छावनी परिषद महू से पत्राचार किया, परिषद को पत्र लिखे, पीड़ितों की कहानी बताई और अंततः उन्होंने जनहित याचिका तैयार कर अकेले ही उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा दिया।
*याचिका के बिंदु*
मंगलवार 06 जनवरी 2026 को उच्च न्यायालय इंदौर में विद्वान न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी के सामने प्रार्थी अशोक श्रीवास्तव ने महत्वपूर्ण मुद्दों से अवगत कराया कि छावनी परिषद महू द्वारा आवारा पशुओं की विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं किए जाने का सहयोग नहीं कर रहे हैं। इसलिए आदेश में याचिका के माध्यम से आदेश प्राप्त करना चाहा है कि आवारा पशुओं के सार्वजनिक स्थान, सड़कों, आदि पर विचरण करने एवं दुर्घटनाओं से हो रही हानि पर रोक लगे। साथ ही पशुपालकों द्वारा गोवंश के साथ किए जा रहे अनाचार को बंद किया जाए। क्योंकि पशुपालक गाय का दूध उपयोग कर गायों को भोजन हेतु लावारिस छोड़ देते हैं।

याचिका में महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल किया गया है जिसमें बताया गया है कि सीईओ विकास कुमार बिश्नोई से आवारा पशुओं के संबंध में लोग मिले, लोगों में आक्रोश था, कोई का निराशाजनक जवाब था कि आवारा पशुओं को आप जगह दिलवा दो, हम कहां ले जाएं। इसी तरह पीड़ितों का शपथ पत्र पेश किया गया। सूचना के अधिकार के अंतर्गत जानकारी मांगी गई, लेकिन उसका कोई उत्तर नहीं दिया गया, छावनी परिषद के अध्यक्ष एवं सीईओ को दिनांक 23 अगस्त 2024, 25 अगस्त 2024, 2 सितंबर 2024 को महू की समस्याओं के प्रति अवगत कराया गया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई, ना पत्र का जवाब दिया गया। महू के नागरिकों ने भी समस्या के निराकरण हेतु एक ज्ञापन 15 जुलाई 2025 को साधारण डाक से भेजा, उसका भी कोई जवाब नहीं दिया गय।
याचिका में आवारा पशुओं के फोटो भी लगाए गए। कांजी हाउस कई सालों से बंद पड़ा है, बताया गया। कांजी हाउस जीर्ण शीर्ण अवस्था में है, का वर्णन किया गया। साथ ही यह भी बताया गया कि परिषद के पास में ही कांजी हाउस के पास ही 16000 स्क्वायर फीट जगह खाली पड़ी है।

*याचिकाकर्ता ने मांगी सहायता*
याचिका के माध्यम से सहायता मांगी गई की छावनी परिषद द्वारा मवेशियों आवारा पशुओं को उपयुक्त शेल्टर होम, कांजी हाउस में रखा जाए। आवश्यक भोजन पानी दिया जाए और स्वयं परिषद द्वारा खर्च उठाया जाए। छावनी परिषद महू आवारा पशुओं को सार्वजनिक स्थान, बाजार, विद्यालयों के आसपास पशुओं को हटाना सुनिश्चित करें। सुप्रीम कोर्ट के एक केस नंबर 5/ 202, एससी 1072 के निर्णय का हवाला भी दिया गया है। यह भी बताया कि इस पीड़ा से व्यथित होकर यह याचिका प्रस्तुत की गई है, माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा पीड़ा का निराकरण किया जाए।
उच्च न्यायालय द्वारा छावनी परिषद अध्यक्ष और सीईओ को दो सप्ताह में कार्रवाई करने का आदेश परिषद के वकील (जो कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए थे) के माध्यम से दिया गया।
*प्रिय पाठक ने लगातार आवाज उठाई..*
यह उल्लेखनीय है कि महू में साप्ताहिक प्रिय पाठक ही एकमात्र ऐसा अखबार है जो पिछले कई सालों से आवारा पशुओं, ढोरों, सूअर, कुत्ते आदि शामिल है के बारे में फोकस करता रहा है।





