
कलाकार श्री जयकृष्ण अग्रवाल और उनके एडेनियम परिवार से यादगार मुलाकात
महेश बंसल की खास रिपोर्ट
कैलाश मानसरोवर के हवाई दर्शन के साथ ही जैसे एक और मनोकामना भी पूर्ण हो गई। अनेक वर्षों से मेरे मन में लखनऊ निवासी प्रेरणापुंज श्रद्धेय श्री जयकृष्ण जी अग्रवाल से प्रत्यक्ष भेंट की गहरी लालसा संजोई हुई थी, सिर्फ उनसे मिलना ही नहीं, बल्कि उनकी उस पावन दहलीज़ को भी प्रणाम करना चाहता था, जहाँ से अनगिनत हरित सपनों ने आकार लिया है।

लखनऊ के इस अत्यंत क्षणिक प्रवास में यह सौभाग्य साकार हो गया। आदरणीय अग्रवाल जी के सान्निध्य में बिताए वे कुछ क्षण केवल भेंट भर नहीं थे, बल्कि एक साधना के स्पर्श जैसे थे। उनके ‘अडेनियम परिवार’ से मिलना सचमुच भावविभोर कर गया। कतारों में सजे वर्षों पुराने, भव्य अडेनियम की दीर्घा मानो मौन खड़े होकर अपनी-अपनी कथा कह रहे हों। उस क्षण यह अनुभूति हुई कि बागवानी केवल शौक नहीं, बल्कि जीवन को सुंदर बनाने की एक सतत साधना है।

*एडेनियम गणेशम : आस्था का सजीव प्रतिरूप*
अग्रवाल जी के लिए एडेनियम मात्र एक पौधा नहीं, बल्कि “एडेनियम गणेशम” है, एक ऐसा स्वरूप जिसमें उन्हें भगवान गणेश का आभास होता है। उनके शब्दों में, यह केवल आकृति का साम्य नहीं, बल्कि उस भाव का उदय है जो साधक और सृजन के बीच सेतु बनाता है। उनके टेरेस गार्डन में सजे अडेनियम के पौधे सचमुच किसी मूर्तिशिल्प दीर्घा का अनुभव कराते हैं … जहाँ हर आकृति, हर मोड़, हर उभार एक भाव लिए हुए है।

*कला से बागवानी तक : एक संवेदनशील यात्रा*
लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य, 86 वर्षीय श्री जयकृष्ण जी अग्रवाल, एक ऐसा नाम, जिसमें कला, संवेदना और साधना का अद्भुत समन्वय है। चित्रकला, फोटोग्राफी, म्यूरल्स .. हर विधा में सिद्धहस्त यह कलाकार जब बागवानी करता है, तो वह भी एक सृजन बन जाती है। उनके पौधे केवल उगाए नहीं जाते, उन्हें गढ़ा जाता है, संवारा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई कलाकार अपनी कृति को आकार देता है। वे कहते हैं — “पौधों के आकार और रंग मुझे हमेशा आकर्षित करते रहे। एडेनियम में मुझे सजीव मूर्तिशिल्प दिखाई देता है।”

*मौन संवाद : जहाँ शब्दों की आवश्यकता नहीं*
उनकी दिनचर्या का सबसे प्रिय समय है – सुबह की चाय, अपने टेरेस गार्डन में, पौधों के बीच। कहते है कि “मैं उनके साथ अकेले बैठता हूँ… और बिना शब्दों के संवाद होता है। यह आत्मीयता कहीं और नहीं मिलती।” यह संवाद ही उनके बागवानी प्रेम का आधार है, जहाँ देखभाल केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि स्नेह का स्वाभाविक विस्तार है।
*जीवन का अनुभव : धैर्य, समर्पण और संतुलन*
अग्रवाल जी का मानना है कि बागवानी में सबसे महत्वपूर्ण है, मातृत्व भाव।
“पौधा अपनी आवश्यकता स्वयं बता देता है… बस हमें उसे समझने की संवेदना विकसित करनी होती है।” वे अत्यधिक संग्रह के पक्षधर नहीं हैं, कहते है कि “जितने पौधों के साथ न्याय कर सकें, उतने ही रखें… तभी उनका सौंदर्य और आनंद दोनों बना रहता है।”
*संस्मरण : मेरी पहली और आखिरी कैक्टस की चोरी*
(जयकृष्ण अग्रवाल जी के शब्दों में)
इलाहाबाद, सन् 1956…
वह समय जब कैक्टस का शौक मेरे भीतर जुनून बन चुका था। विदेशी पौधों की उपलब्धता सीमित थी और लोग अपने संग्रह को साझा करने में संकोच करते थे। मेरे संस्कार मुझे चोरी की अनुमति नहीं देते थे, लेकिन पौधों के प्रति आकर्षण मेरे नियंत्रण से बाहर हो चला था।
एक दिन मैंने निश्चय कर लिया—चोरी करूंगा, पर बिना नुकसान पहुँचाए।
मेरी नज़र एक “बनी इयर्स” कैक्टस पर पड़ी—खरगोश के कान जैसे उसके पैड्स, जिन पर मुलायम रोएं के गुच्छे पोलका डॉट्स की तरह सजे थे। मैंने मौका देखकर एक पैड तोड़ा और जेब में रख लिया।
दिल जोर-जोर से धड़क रहा था… साइकिल तेजी से घर की ओर भागी।
घर पहुँचते ही राहत तो मिली, लेकिन कुछ ही देर में उन मुलायम दिखने वाले रोयों ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। वे मेरी टांग में बुरी तरह चुभ चुके थे। पीड़ा इतनी बढ़ गई कि अपनी चोरी छिपाना संभव नहीं रहा।
अभिभावकों को सच बताना पड़ा… और तुरंत डॉक्टर के पास ले जाया गया।
इलाज के बाद एक और कठिन क्षण मेरा इंतजार कर रहा था—उसी कोठी में वापस जाना, जहाँ से मैंने पौधा चुराया था।
लेकिन वहाँ जो हुआ, उसने मुझे जीवन भर के लिए बदल दिया।
मेरी रुचि जानकर उन्होंने न केवल मुझे क्षमा किया, बल्कि अपने अतिरिक्त कैक्टस मुझे उपहार में दे दिए—उसी “बनी इयर्स” सहित।
उस दिन मैंने सीखा— चोरी से नहीं, धैर्य और स्नेह से प्राप्त पौधे ही सच्चा सुख देते हैं। आज, 71 वर्षों के अनुभव के बाद भी मैं यही कह सकता हूँ— जिस पौधे की सच्चे मन से चाह होती है, वह कभी न कभी बिना चोरी किए स्वयं हमारे पास आ ही जाता है।
अग्रवाल जी का जीवन, उनका चिंतन और उनका बागवानी के प्रति समर्पण, हर प्रकृति प्रेमी के लिए प्रेरणा है। उनके लिए पौधे केवल संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के सहयात्री हैं। उन पर लिखना केवल एक लेख नहीं, बल्कि एक अनुभूति है, एक ऐसे कलाकार की, जिसने मिट्टी, पौधों और प्रकृति के माध्यम से जीवन को एक नई दृष्टि दी है।
* महेश बंसल





