फ़िल्मी कथानक और कलाकारों की जिंदगी पर छाया कैंसर

698

कुछ बीमारियां साध्य होती है, कुछ असाध्य। जीवन की अनिश्चितता के बीच बीमारियों का होना भी अनिश्चित ही होता है। कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि वह कभी बीमार नहीं पड़ेगा! कुछ बीमारियां ऐसी होती है, जिसका अमीरी गरीबी या जात-पात से कोई संबंध नहीं होता। साठ के दशक में टीबी को जानलेवा माना जाता था। अब हृदय रोग पहले की तरह जानलेवा नहीं रहा। लेकिन, कैंसर ऐसा रोग है जिसके बारे में सुनते ही पैरों के तले जमीन खिसक जाती है। कुछ मामलों में साध्य होने के बावजूद आज भी कैंसर सबसे ज्यादा घातक माना जाता है। ये रोग फिल्मीं कथानकों में भी लम्बे अरसे से छाया है। यही एक रोग है जिसने राजकुमार, राजेश खन्ना, इरफ़ान खान और ऋषि कपूर समेत कई कलाकारों की जान ली!

कैंसर पर अब तक की सबसे दमदार फिल्म थी हृषिकेश मुखर्जी की आनंद, जिसके नायक को कैंसर होता है! लेकिन, वह जिंदगी को हंसते-हंसते आनंद से जीना चाहता है। लेकिन, जिस पल उसकी मौत आती है उसमें जीने की भावना पैदा होने लगती है। लेकिन, कैंसर के आगे उसकी एक नहीं चलती। राजेश खन्ना की यह फिल्म इतनी सफल और लोकप्रिय हुई थी, कि उनके घर निर्माताओं की लाइन लग गई थी और हर दूसरा निर्माता उन्हें कैंसर रोगी बनाना चाहता था। लेकिन, उन्होंने केवल ‘सफर’ में ही काम करना स्वीकार किया। इस फिल्म में भी उन्होंने कैंसर रोगी की भूमिका में प्राण फूंक दिए थे। यह किस्मत का ही खेल है कि जिस रोग की भूमिका ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, उसी रोग ने आखिर उनकी जान ली। अपने जीवन के आखिरी समय जब अमिताभ उनसे मिलने गए तो राजेश खन्ना के अंतिम शब्द थे ‘टाइम हो गया, पैकअप!’

समाज की तरह सिनेमा में भी कैंसर के कीटाणु घुस आए हैं। कुछ फिल्में कैंसर को लेकर बनी तो कुछ फिल्मों में कैंसर को फिलर की तरह घुसेड़ दिया गया है। इसके अलावा लगभग डेढ़ दर्जन फिल्मी सितारे या तकनीशियन ऐसे हैं, जिन्हें कैंसर ने डसा। इनमें चंद भाग्यशाली कलाकार इसके चंगुल से बच निकले हैं, तो अधिकांश फिल्मकारों ने कैंसर से ग्रसित होकर अपने जीवन से हाथ धोते हुए राजेश खन्ना की तरह कहा कि टाइम हो गया है, पैकअप।

हिन्दी सिनेमा में कैंसर का सबसे पहले उपयोग संभवतया ‘दिल एक मंदिर’ से हुआ। इस फिल्म में राजकुमार को कैंसर हो जाता है और डॉक्टर राजेन्द्र कुमार उसका इलाज करता है। यह फिल्म दक्षिण भारत के निर्देशक श्रीधर ने निर्देशित की थी। इसलिए दक्षिण भारत की फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी एक चमत्कार होता है कि कैंसर का मरीज तो ठीक हो जाता है, लेकिन उसका इलाज कर रहा डॉक्टर मर जाता है। राजेन्द्र कुमार की ही एक और फिल्म ‘अमन’ में भी नायक राजेन्द्र कुमार कैंसर से मर जाता है।

कैंसर ने कई दिग्गज कलाकारों को हमसे छीना उनमें राजकुमार का नाम सबसे ऊपर आता है। कभी राजकुमार ने अपने अंदाज में कहा था हम राजकुमार हैं, सर्दी खांसी जैसे मामूली रोग से नहीं मरेंगे। हुआ भी ऐसा ही। वह कैंसर से अपना राजपाट छोड़कर दूसरी दुनिया में राज करने चले गए। ऋषि कपूर और इरफान खान दो ऐसे कलाकार थे, जिनके बारे में यह धारणा व्याप्त हो गई थी कि उन्होंने कैंसर को हरा दिया। लेकिन, यह रोग बड़ा धोखेबाज निकला और ठीक होने के बाद उसने फिर से हमला करके इन दो बेहतरीन कलाकारों को हमसे छीन लिया।

कैंसर ने जिन लोकप्रिय सितारों को अपनी गिरफ्त में लेकर खुदा के पास बुलाया उनमें राजेन्द्र कुमार, फिरोज खान, विनोद खन्ना, सिम्पल कपाडिया, रसिका जोशी, टॉम अल्टर और संगीतकार आदेश श्रीवास्तव शामिल हैं। जिन फिल्म कलाकारों ने इस जानलेवा बीमारी से लड़कर जिंदगी की जंग जीती उनमें संजय दत्त, राकेश रोशन, सोनाली बेंद्रे, मनीषा कोईराला, अनुराग बासु, लीज़ा रे, कमाल राशिद खान और गुजरे जमाने की लोकप्रिय नायिका मुमताज ने कैंसर के साथ लम्बी लड़ाई लड़कर जीत हासिल की है।

‘आनंद’ और ‘सफर’ के बाद जो दो फिल्में जिनकी नायिकाओं को कैंसर रोगी बताया गया, वह थी रंजीता अभिनीत ‘अंखियों के झरोखों से’ और जया भादुड़ी की फिल्म ‘मिली।’ इसके निर्देशक ने अंतिम दृश्य में नायिका को उपचार के लिए विदेश जाते हुए दिखाकर एक अनिश्चितता के मोड़ पर फिल्म को समाप्त कर दिया था। लेकिन, ‘अंखियों के झरोखों से’ की नायिका इस रोग से हार जाती है और दर्शक नम आंखों से सिनेमाघर से बाहर निकलता है।

फिल्मी कलाकारों में कैंसर का पहला ज्ञात प्रकरण पृथ्वीराज कपूर का था, जिन्हें गले का कैंसर हो गया था। इसी से उनकी आवाज बदल गई थी। यह उनका दमखम ही था जो वह इस रोग से बरसों लड़े और एक लम्बी जिंदगी जीकर रूखसत हुए। उनके ही पृथ्वी थिएटर से सिनेमा में संगीत का माधुर्य रचने वाले जयकिशन भी सिरोसिस ऑफ लीवर का शिकार हुए। मीना कुमारी ने भी अपने आपको शराब में डुबोकर यह रोग पाल लिया था। कपूर खानदान से जुड़ी अभिनेत्री नरगिस दत्त भी कैंसर के साथ एक लम्बी लड़ाई लड़कर चल बसी। उनकी बीमारी ने सुनील दत्त को पूरी तरह से तोड़ दिया था। लेकिन, उन्होंने न केवल कैंसर के रोगियों के लिए ट्रस्ट बनाया, बल्कि इस विषय पर ‘दर्द का रिश्ता’ जैसी फिल्म का निर्माण भी किया।