
भगवद्गीता : मेरी धारणा
— एन. के. त्रिपाठी
कुछ दिन पूर्व मैंने भगवद्गीता, या संक्षेप में गीता, का पुनः अध्ययन पूर्ण किया। यद्यपि मैं स्वभावतः धार्मिक प्रवृत्ति का नहीं हूँ, तथापि विभिन्न धर्मों के ग्रंथों को पढ़ने में मेरी विशेष रुचि रही है। कुछ दशक पूर्व भी मैंने गीता को दो-एक बार पढ़ा था तथा उसके गहन चिंतन से अत्यंत प्रभावित हुआ था।
गीता को मैंने बहुत धीमी गति से पढ़ा है। संस्कृत के अपने अल्प ज्ञान से मैं गीता के कुछेक अंशों को ही समझ पाता था, किंतु उपलब्ध श्रेष्ठ हिंदी अनुवाद से मुझे पूर्ण सहायता मिलती रही। मैं किसी भी प्रकार की टीका या व्याख्या नहीं पढ़ता हूँ। गीता के अनेक विचारों में से छठे अध्याय में वर्णित ‘समभाव’ ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है।
गीता वस्तुतः प्राचीन भारतीय दर्शन का सार है। यह महाभारत का एक भाग है तथा एक पवित्र संवाद है, जिसमें गहन आध्यात्मिक, दार्शनिक और व्यावहारिक महत्व निहित है। इसे भगवान श्रीकृष्ण ने महान धनुर्धर अर्जुन को कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में उपदेश के रूप में कहा था। उस समय अर्जुन गहरे भावनात्मक विषाद और नैतिक द्वंद्व से ग्रस्त थे। भगवान कृष्ण ने आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का प्रतिपादन किया तथा कर्तव्य, संदेह, भय और नैतिक उत्तरदायित्व के बीच चलने वाले सार्वभौमिक मानव के स्वयं के संघर्ष का समाधान प्रस्तुत किया।
यह महान भारतीय दर्शन अठारह अध्यायों में विभाजित तथा सात सौ श्लोकों में व्यक्त हुआ है। इसके अधिकांश अध्याय किसी न किसी विशेष योग के विवेचन पर आधारित हैं। गीता में ‘योग’ शब्द का अर्थ है—ईश्वर प्राप्ति की आध्यात्मिक साधना अथवा मार्ग। इनमें प्रमुख हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और ध्यान योग। अंततः गीता इन सभी मार्गों का समन्वय करती है और बताती है कि ये सभी मार्ग मिलकर मनुष्य को परम मुक्ति की ओर ले जाते हैं।
मुझे विशेष रूप से गीता के छठे अध्याय के ध्यानयोग ने अत्यधिक प्रभावित किया। इसमें भगवान कृष्ण बताते हैं कि ध्यान के माध्यम से मन को किस प्रकार संयमित और नियंत्रित किया जा सकता है। अनुशासित मन अंततः आध्यात्मिक अनुभूति की ओर ले जाता है। आधुनिक प्रबंधन-विशेषज्ञ भी अपने अनेक सिद्धांत इसी धारणा से ग्रहण करते हैं कि संयमित और अनुशासित मन ही सफलता और संतुलन का आधार है। ऐसा मन सामान्य सांसारिक अर्थों में न तो अत्यधिक शोक करता है और न ही अति-आनंदित होता है; उसमें न आसक्ति रहती है और न ही द्वेष।मैं स्वयं इस स्थिति को प्राप्त करने की कल्पना करता रहता हूँ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
अर्थात जिसने अपने मन को वश में कर लिया है और आंतरिक शांति प्राप्त कर ली है, उसको परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है। ऐसा व्यक्ति शीत और ताप, सुख और दुःख, तथा मान और अपमान में समान भाव से स्थिर रहता है।
गीता का वास्तविक महत्व इसी में निहित है कि वह मनुष्य के भ्रम को स्पष्टता में, दुर्बलता को शक्ति में और कर्म को आध्यात्मिक उत्कर्ष में रूपांतरित करने की क्षमता रखती है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक मार्गदर्शक है, जो मनुष्य को अर्थपूर्ण और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह शाश्वत ज्ञान ज्योति है।
गीता ज्ञानप्रकाशः





