Bhagirathpura Water Incident: नलों के पानी से मौत कैसे पहुंची घरों तक – पार्षद, अधिकारी और महापौर जवाबदेही से नहीं बच सकते?

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Bhagirathpura Water Incident: नलों के पानी से मौत कैसे पहुंची घरों तक – पार्षद, अधिकारी और महापौर जवाबदेही से नहीं बच सकते?

राजेश जयंत की विशेष रिपोर्ट 

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INDORE: इंदौर का भागीरथपुरा अब केवल एक मोहल्ले का नाम नहीं रहा, बल्कि यह नगर निगम की विफल व्यवस्था, सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता और जिम्मेदार अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। टॉयलेट के गंदे पानी से दूषित पेयजल पीने से 10 लोगों की मौत कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं, बल्कि चेतावनियों को अनदेखा करने, टेंडरों को दबाने और जवाबदेही से भागने वाली पूरी सत्ता संरचना का नतीजा है। यह मामला अब प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि आपराधिक लापरवाही और गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में जांच की मांग कर रहा है।

▪️ भागीरथपुरा में मौत कैसे पहुंची घरों तक
▫️भागीरथपुरा इलाके में महीनों से ड्रेनेज का गंदा पानी पेयजल लाइन में मिलने की शिकायतें की जा रही थीं। बदबूदार, मटमैला और अस्वस्थ पानी आने की जानकारी स्थानीय नागरिकों ने बार बार दी, लेकिन न तो जल आपूर्ति बंद की गई और न ही वैकल्पिक व्यवस्था की गई। नतीजतन दूषित पानी लोगों के घरों तक पहुंचता रहा और एक के बाद एक 10 लोगों की मौत हो गई, जबकि दर्जनों लोग बीमार पड़े। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि खतरे की जानकारी के बावजूद जानबूझकर आंखें मूंदी गईं।

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▪️पार्षद कमल वाघेला की जवाबदेही से बचने की कोशिश
▫️इस क्षेत्र के भाजपा पार्षद कमल वाघेला की भूमिका सीधे तौर पर सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वे लगातार शिकायतें लेकर पार्षद के पास पहुंचे, लेकिन समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया। सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि जिस वक्त भागीरथपुरा में लोग अपनी जान बचाने के लिए अस्पतालों और घरों के बीच भटक रहे थे, उसी समय पार्षद एक कार्यक्रम में झूले का आनंद लेते नजर आए। जुलाई में नई जल लाइन का टेंडर स्वीकृत होने के बावजूद काम शुरू न होने पर पार्षद की चुप्पी इस पूरे मामले में उनकी भूमिका को संदिग्ध बनाती है।

▪️जल और ड्रेनेज विभाग में बैठी अदृश्य सत्ता
▫️नगर निगम के जल और ड्रेनेज विभाग की भूमिका इस त्रासदी की रीढ़ मानी जा रही है। वरिष्ठ इंजीनियर संजीव श्रीवास्तव पर आरोप है कि वे वर्षों से इसी पद पर जमे हुए हैं और विभाग में उनकी सहमति के बिना कोई काम आगे नहीं बढ़ता। करीब 2000 करोड़ रुपये के सालाना बजट वाले विभाग में ऐसी स्थिति यह संकेत देती है कि प्रशासनिक नियंत्रण नाम मात्र का है। शिकायतों के बावजूद यदि कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि कर्तव्य से विमुख होना माना जाएगा।31 12 2025 indore bhagirathpura news 20251231 204845

 

▪️टेंडर दबाने के आरोप और आपराधिक निष्क्रियता
▫️इस मामले में निगम के अपर आयुक्त रोहित सीसोनिया पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। कहा जा रहा है कि नई जललाइन से संबंधित टेंडर पिछले छह महीनों से उनकी कुर्सी के नीचे दबा हुआ था। यदि टेंडर प्रक्रिया समय पर पूरी होती और काम शुरू हो जाता, तो संभवतः 10 लोगों की जान बच सकती थी। यह निष्क्रियता अब कानूनी रूप से लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक कृत्य की श्रेणी में देखी जा रही है।

▪️महापौर की भूमिका और प्रशासनिक जिम्मेदारी
▫️इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल महापौर की भूमिका को लेकर उठ रहा है। नगर निगम का सर्वोच्च निर्वाचित पद होने के बावजूद न तो जल संकट पर कोई सार्वजनिक हस्तक्षेप दिखा और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर समय रहते कार्रवाई। सवाल यह है कि जब पेयजल और ड्रेनेज जैसे महत्वपूर्ण विभागों में लगातार शिकायतें आ रही थीं, तो महापौर कार्यालय ने क्या संज्ञान लिया। क्या महापौर को हालात की जानकारी नहीं थी या जानकारी होते हुए भी मौन साधा गया। दोनों ही स्थितियां प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही को कटघरे में खड़ा करती हैं।

▪️एमआईसी से लेकर निगम प्रशासन तक खामोशी
▫️इस मामले में एमआईसी सदस्य, महापौर परिषद और निगम प्रशासन की चुप्पी भी कम गंभीर नहीं है। न कोई स्पष्ट बयान, न कोई जिम्मेदारी तय करने की पहल। यह खामोशी इस आशंका को मजबूत करती है कि कहीं न कहीं पूरे सिस्टम में एक दूसरे को बचाने का अलिखित समझौता काम कर रहा है।

▪️कानूनी जांच और आपराधिक धाराओं की मांग
▫️अब यह मामला केवल विभागीय जांच तक सीमित रखने का नहीं रह गया है। नागरिक संगठनों और पीड़ित परिवारों की मांग है कि इस पूरे प्रकरण की न्यायिक या विशेष जांच कराई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों पर भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक लापरवाही और गैर इरादतन हत्या जैसी धाराओं में कार्रवाई हो। साथ ही यह भी जांच हो कि टेंडर में देरी किसके निर्देश पर और किन कारणों से की गई।

▪️जनाक्रोश और भरोसे का संकट
▫️भागीरथपुरा की घटना के बाद इंदौर में जनता का आक्रोश साफ दिखाई दे रहा है। लोगों का कहना है कि यदि 10 मौतों के बाद भी जिम्मेदार चेहरे बेनकाब नहीं हुए, तो यह मान लिया जाएगा कि नगर निगम की व्यवस्था आम नागरिकों की जान से अधिक सत्ता और पैसों की रक्षा में लगी है। यह मामला अब सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि शासन पर जनता के भरोसे का बन चुका है।