
Bhilwa/ Bhilma : जंगल डिक्शनरी में “ख़तरों का खिलाड़ी”स्वादिष्ट फल-लेकिन पहले सावधान करने वाली चेतावनी !
याद कीजिये क्या कभी आपकी नजर भी उतारी गई है?
डॉ विकास शर्मा
यह खिलाता भी है और जलाता भी…। जंगल डिक्शनरी में ख़तरों का खिलाड़ी शब्द वास्तव में इसी स्वादिष्ट फल को चखने वालों के लिए बना है। कैसे…? बताता हूँ,
लेकिन पहले सावधान करने वाली चेतावनी तो दे दूँ। । चाहें आप स्वाद के शौकीन हों, खतरों के खिलाड़ी हों, तलुओं की गांठों के मरीज हों या फिर कोई तंत्र- मंत्र, प्रेत – बाधा, बुरी नजर आपका दिमाग खराब कर रही है तो फिर यह पोस्ट आपके लिए बहुत काम की है। दुनिया भर की नकारात्मक शक्तियों से बचाने की शक्ति इस अकेले छोटे से बीज में है, बिल्कुल सही सुना अपने…। कैसे…? आइए बताता हूँ…
जंगलों और गाँव के करीब रहने वालों के लिए यह एक जंगली फल है। जो स्वादिष्ट भी है और इसके पास पोषक तत्वों का भी खजाना है। इसमें प्राकृतिक शर्करा, कैल्शियम, पोटेशियम, विटामिन बी, विटामिन सी सहित फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। स्वाद और पोषक गुणों के कारण इसे देहात का अंजीर कहा जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ये कैसा अंजीर हुआ, अंजीर से तो इसका दूर दूर तक कोई संबंध नही है, तो फिर जरा इसकी उन मालाओं पर गौर फरमाइयेगा, जो बिल्कुल सूखे हुए अंजीर की तरह आज भी गाँव मे सुखाकर रखी जाती हैं और फिर इसे आवश्यकतानुसार सूखे मेवे की तरह उपयोग कर लिया जाता है।

वैसे इसके बारे में बताऊँ तो यह एक सूखा मेवा भी है, औषधि भी है, तंत्र मंत्र का स्वामी भी और सबसे खास बात, यह भयंकर खतरनाक भी है, मतलब जादू टोने वाले सीरियल्स का देखते ही भस्म कर देने वाला सीन याद है न आपको, उससे कोई कम नही है यह। पल भर में जला देने की शक्ति तो है ही इसके साथ, इस बात को पूरे वैज्ञानिक आधार पर कह सकता हूँ। इसके बीजों से निकलने वाले तेल की एक बूंद भी आपकी त्वचा को पल भर में जलाकर रख देती है। यह डराने के लिए नही कह रहा हूँ बल्कि चेतावनी दे रहा हूँ।
अगर आपने भी बचपन में कच्चे आम तोड़कर उनका खट्टा स्वाद चखा है तो यह भी सुना या महसूस किया होगा कि कच्चे आम तोड़ते समय उसकी डंठलों से एक प्रकार का एसिड निकलता है, जो अगर चेहरे या सामान्य त्वचा पर लग जाये, तो वहाँ छाले आ जाते हैं। लेकिन ये तो भिलमा के सामने कुछ नहीं, शायद आप न जानते हों कि छिंदवाड़ा जिले में एक ऐसा पेड़ पाया जाता है, जिसके बीजो से निकलने वाला तेल त्वचा में छूने मात्र से ही, त्वचा को बुरी तरह से जला देता है, और उस स्थान पर भयंकर घाव बन जाता है। और कमाल की बात तो यह है कि इसका बीज फल के अंदर नही होता है, बल्कि यह फल के ऊपर याने बाहर की ओर लगा दिखाई देता है। यह तो हुई सामान्य बात लेकिन वनस्पति शास्त्र की बात करूँ तो यह एक प्रकार का अवास्तविक फल है।
ज्यादातर सदस्य इस पौधे और फल को फोटो देखकर ही पहचान गये ही होंगे, तो चलिये आज चर्चा करते हैं, भल्लातक की…। यह नाम जितना ही खतरनाक है। भल्लातक/ भिलवा/ भिलमा या बीबा अपने आपमे एक स्वादिष्ट फल, ड्राई फ्रूट है जो औषधि, तांत्रिक शक्तियों वाला, भयंकर घाव और दर्द से आराम देने वाला प्रभाव रखता है। भिलवा का छोटे आकार वाला पेड़ छिंदवाड़ा जिले के जगलो में बहुतायत से पाया जाता है, इसके बीजो से भयंकर एसिड वाला तेल निकलता है, जो स्पर्श मात्र से त्वचा को जला देता है। इससे काले रंग का एक डाई/ रंग भी निकाला जाता है, जिसका प्रयोग पूर्व में मतदान स्याही के पक्के रंग की तरह किया जाता था। इसका पेड़ और फल काजू से मिलता जुलता होता है, क्योंकि ये दोनों एकदम करीबी सदस्य हैं। ऐसा लगता है, जैसे इसके फल के ऊपर बाहर ही फल लगा हुआ है, इस कारण सभी इसे अचम्भे से देखते है।
कुछ लोग जो इसके प्रति एलर्जिक होते हैं, उनके लिये तो यह बेहद खतरनाक है। उनके शरीर या त्वचा मे इस पेड़ के नीचे जाते ही छाले आने लगते हैं। ऐसा इसके तीक्ष्ण अम्लीय स्वभाव के कारण होता है। अम्ल की महीन बूंदे गर्मियों के मौसम में पेड़ के आसपास उड़ती रहती हैं, यही एलर्जी के लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा चिकाडा नामक एक रस चूसक कीट भी इसके तने के रस को चूसकर अपने शरीर अतिरिक्त रस की फुहार उड़ाता रहता है, जिससे पेड़ के आसपास का क्षेत्र एलर्जिक व्यक्तियों के लिये खतरनाक सीमा बना देता है।
इसके बीजो से पहले काले रंग की स्याही भी बनाई जाती थी, जिसका रंग बहुत पक्का होता था, और जूट आदि के बोरो पर लिखाई के लिए भी इसका प्रयोग होता था, लेकिन रासायनिक रंगों के आ जाने से अब ये महत्वहीन से हो गए है। इसके फल पकने पर चटक नारंगी और लाल रंग के दिखाई देते है, जो बहुत ही आकर्षित होते हैं। इनका स्वाद बहुत शानदार होता है, पहले दादी इन्हें एक तार में माले की तरह गूथ कर रख देती थी, और जब हम गाँव पहुँचते थे तो फिर हमें खाने को देती थी। इसीलिए कह रहा था कि यह गाँव का अंजीर है, इसका फल।
वास्तव में इसके बीजो का काला छिलका अपने आप में भयंकर एसिड लिए होता है, किन्तु ग्रामीण इसे भी बंद मटके में भूनकर इसकी गिरी/ बिजी निकाल लेते हैं, जो छोटे बच्चों के लिये सर्दी जुकाम, निमोनिया आदि बीमारियो के लिए रामबाण औषधि है। इसे छोटे बच्चों को घिस कर और बड़े बच्चों को पान में डालकर खिलाया जाता है।
इन सबके अलावा इसका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग कंदई/ चाईं (athletes foot) रोग में है, इसके बीज को एक सुई में छेदकर चिमनी से इसे जलाया जाता है, जिससे पिघलकर अम्लीय तेल बाहर आता है, इसे इस संक्रमित स्थान पर टपका दिया जाता है, चाईं रोग हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। इसके अलावा कही अगर भयंकर जोर का दर्द हो तो उस दर्द वाले स्थान के केंद्र में।इसके तेल की एक बूँद गिरा देने से दर्द समाप्त हो जाता है। अन्यत्र अगर इसका तेल गिर जाये तो वह स्थान फतक/ जल जाता है। यह जानकारी केवल ज्ञान वर्धन के लिए है, अनुभवहीन शहरी मित्र कतई इसका जोखिम न लें वरना लेने के देने पड़ सकते हैं। जिन्हें इस पारंपरिक चिकित्सा का अनुभव है, केवल वही यह कारनामा कर सकते हैं, आप बेफिजूल में खतरों के खिलाड़ी बनने की कोशिश न करें। हाँ कहीं फल मिल जायें तो जरूर दो चार धमक दें, उससे कोई नुकसान नही है।
ग्रामीण क्षेत्रो में पहले पिंडलियों में गोदने जैसे निशान बनाने के लिये भी भिलवा के तेल का प्रयोग किया जाता था। लेकिन हमारे सम्पूर्ण भारत मे जो इसका जो उपयोग होता है वह अद्वितीय है, इसे नकारात्मक शक्तियों का घोर शत्रु माना जाता है। नजर लगने की समस्या के लिए किसी तांत्रिक की।शरण मे जाने से अच्छा है इस वनस्पति की शरण मे आयें। हालांकि इस गुण की पुष्टि किसी वैज्ञानिक आधार से फिलहाल संभव नही है लेकिन फिर भी…। आधी हकीकत आधा फसाना…
अगर आपको लगता है कि आपको आसपास से बुरी शक्तियों ने घेर रखा है, तो आप बेझिझक भल्लातक की शरण मे जा सकते हैं, ऐसा मानना है हमारे बुजुर्ग ग्रामीणों और आदिवासियों का। ग्रामीण क्षेत्रो में आज भी भिलवा की माला दुधारू जानवरो खासकर गायों के गले मे बांध दी जाती है, जिससे कोई उन पर जादू टोना नही कर पाता है। उनके बंधने वाले स्थान पर भी भिलवा की माला, मयूर पंख, ममरी (एक प्रकार की तुलसी), बाल, राई, नींबू मिर्च जैसी चीजें लटकी हुयी नजर आ जाती हैं। नजर उतारने के लिये आज भी इसके बीजो का प्रयोग किया जाता है। इसे माला के साथ, ताबीज में बांधना, आग में जलाना या फिर दरवाजे पर लटका देना तो जग जाहिर है, बड़े बड़े रहीस, डॉक्टर और वैज्ञानिक भी इसके सम्मोहन से बच नहीं पाते है, मतलब साफ़ है कि यह अलौकिक शक्तियो का स्वामी है। क्या कभी आपकी नजर भी उतारी गई है? अपना अनुभव बताइये, देखते हैं क्या कहता है अपना देश और देश का ज्ञान। इस मामले में मैंने तो अपनी कह दी, बाकि आपका अपना विश्वास मानो या न मानो…
डॉ. विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
#Semecarpus_anacardium
#Anacardiaceae
सूचना -अनुभवहीन कतई इसका जोखिम न लें वरना लेने के देने पड़ सकते हैं। यह लेख केवल सामान्य ज्ञान के लिए जानकारी देने के लिए है .प्रयोग न करें चिकत्सकीय परामर्श लें .




