Big Action of EOW: राज्य आजीविका मिशन में नियम विरुद्ध नियुक्तियां, पूर्व IFS ललित मोहन बेलवाल सहित 3 पर धारा 420 के तहत FIR दर्ज

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Big Action of EOW

Big Action of EOW: राज्य आजीविका मिशन में नियम विरुद्ध नियुक्तियां,  पूर्व IFS ललित मोहन बेलवाल सहित 3 पर धारा 420 के तहत FIR दर्ज

दस्तावेजों में हेराफेरी, अवैधानिक नियुक्तियां एवं मानदेय में अवैध रूप से वृद्धि की गई

भोपाल: Big Action of EOW: राज्य आजीविका मिशन में नियम विरुद्ध नियुक्तियां, ललित मोहन बेलवाल सहित 3 पर धारा 420 के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया है। दस्तावेजों में हेराफेरी,अवैधानिक नियुक्तियां एवं मानदेय में अवैध रूप से वृद्धि की गई है।

EOW से प्राप्त जानकारी के अनुसार ललित मोहन बेलवाल, विकास अवस्थी और श्रीमती सुषमा रानी शुक्ला ने मिलकर भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित किया, फर्जी दस्तावेजों का प्रयोग किया और शासन को गुमराह कर व्यक्तिगत लाभ प्राप्त किया। इन तीनों के के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 471, 120-बी एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(सी) के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया गया है।

बिना अनुमोदित मानव संसाधन मार्गदर्शिका के आधार पर नियमों को दरकिनार कर नियुक्तियाँ की गईं।

दस्तावेजों में हेराफेरी, अवैधानिक नियुक्तियां एवं मानदेय में अवैध रूप से वृद्धि की गई। श्रीमती सुषमा शुक्ला की नियुक्ति कूटरचित एवं मिथ्या प्रमाणपत्रों के आधार पर की गई। इस संबंध में EOW की जांच जारी है और भी कई गड़बड़ियों के खुलासे की संभावना है।

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ, म.प्र. द्वारा पंजीबद्ध प्रारंभिक जांच क्र. 02/2025 दिनांक 17.02.2025, जिसमें शिकायतकर्ता श्री राजेश कुमार मिश्रा द्वारा राज्य आजीविका मिशन, म.प्र. में वर्ष 2015 से 2018 के बीच की गयी नियुक्तियों तथा व्यय में व्यापक अनियमितताओं और भ्रष्ट आचरण के आरोप लगाए गए थे। अभी तक की विस्तृत जांच के उपरान्त श्री ललित मोहन बेलवाल, श्री विकास अवस्थी, श्रीमती सुषमा रानी शुक्ला के विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराध प्रमाणित पाया जाने पर FIR दर्ज की गई है।

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मानव संसाधन मार्गदर्शिका को अनुमोदित दर्शाने के बाद, उसी आधार पर राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर के पदों पर संविदा नियुक्तियाँ की गईं। इन नियुक्तियों के लिए जो मापदंड निर्धारित किए गए – जैसे योग्यता, अनुभव, चयन पद्धति आदि – वे मिशन कार्यालय स्तर पर ही बनाये गये, जबकि ऐसे मापदंडों को शासन से अनुमोदित कराना आवश्यक होता है। कई नियुक्तियाँ ऐसे अभ्यर्थियों को दी गईं जिनकी योग्यता या अनुभव न तो निर्धारित मानकों के अनुरूप थी, न ही वे पद के लिए उपयुक्त थे। विशेष रूप से श्रीमती सुषमा रानी शुक्ला को उस पद पर नियुक्त किया गया जिसके लिए न्यूनतम 15 वर्ष का प्रबंधकीय अनुभव अपेक्षित था, जबकि उन्हें यह अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उन्हें नियुक्त करने के मात्र चार माह के भीतर अवैध तरीके से ₹70,000 प्रतिमाह का मानदेय स्वीकृत किया गया। यह भी पाया गया कि अन्य कर्मचारियों को, जिनके पास अपेक्षित अनुभव था, उन्हें यह लाभ नहीं दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि चयन और मानदेय निर्धारण की प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण और चहेतों को लाभ देंने के उद्देश्य से की गई।

जांच में यह तथ्य उभरकर सामने आया कि तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री ललित मोहन बेलवाल द्वारा म.प्र. राज्य आजीविका मिशन की मानव संसाधन नीति (HR Policy) को बेईमानीपूर्वक HR Manual के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि ऐसे किसी ‘HR Manual को राज्य आजीविका फोरम द्वारा अनुमोदन प्राप्त नहीं था। दिनांक 27.03.2015 को राज्य आजीविका फोरम की कार्यकारिणी समिति की बैठक में केवल मानव संसाधन नीति (Human Resource Policy) को मंजूरी दी गई थी, HR Manual का कोई उल्लेख नहीं था।इसके विपरीत, श्री बेलवाल द्वारा तैयार की गई नस्ती संख्या 40-01/MP-SRLM/HR/43 में नोटशीट पृष्ठ क्र. 5 में कूटरचित रूप से “HR Manual” शब्द जोड़ा गया
कई नियुक्तियाँ न्यूनतम योग्यता और अनुभव के बिना की गईं — जैसे कि श्रीमती सुषमा रानी शुक्ला को आवश्यक अनुभव व योग्यता के बिना राज्य परियोजना प्रबंधक (सामुदायिक संस्थागत विकास) पद पर नियुक्त किया गया। संविदा नियुक्त कर्मचारियों को 40% तक मानदेय की अवैध वृद्धि दी गई, जबकि अन्य संवर्गों में जीवन यापन लागत सूचकांक (CPI) के अनुसार ही वृद्धि हुई. स्पष्ट रूप से यह कृत्य सुषमा रानी शुक्ला व अन्य चहेतों को अवैध लाभ देने के लिए किया गया। नियुक्ति एवं वेतन निर्धारण में शासन की स्पष्ट नीतियों की अवहेलना कर निजी हितों की पूर्ति हेतु नियुक्तियाँ की गईं।

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श्रीमती सुषमा रानी शुक्ला की नियुक्ति की पृष्ठभूमि

श्रीमती सुषमा शुक्ला की राज्य परियोजना प्रबंधक (सामुदायिक संस्थागत विकास) के पद पर संविदा नियुक्ति वर्ष 2016 में की गई थी। यह पद राज्य आजीविका मिशन के उच्च स्तर के प्रबंधकीय पदों में आता है, जिसमें नियुक्ति के लिए निर्धारित योग्यता और अनुभव की स्पष्ट शर्तें शासन द्वारा निर्धारित थीं।

निर्धारित पात्रता:

प्रतिष्ठित संस्थान से MBA या समकक्ष स्नातकोत्तर डिग्री, कम से कम 15 वर्ष का प्रासंगिक प्रबंधकीय अनुभव, विशेषकर आजीविका संवर्धन, स्व-सहायता समूहों, गरीबी उन्मूलन आदि के क्षेत्र में

वास्तविक स्थिति:

श्रीमती शुक्ला के पास वांछित अनुभव पूर्ण नहीं था। उनके द्वारा प्रस्तुत MBA डिग्री और अनुभव प्रमाण पत्रों में गंभीर विसंगतियाँ पाई गईं। चयन प्रक्रिया में जानबूझकर पक्षपात कर उन्हें सर्वोच्च अंक दिए गए।

श्रीमती शुक्ला ने अपने आवेदन पत्र दिनांक 15.05.2016 में राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRD), हैदराबाद का अनुभव प्रमाण पत्र संलग्न किया था। इसमें उनके “उत्तम प्रशिक्षण कार्य”, “गहन ज्ञान” और “योग्य प्रशिक्षक” होने की प्रशंसा की गई थी। यह प्रमाण पत्र फर्जी था इसे NIRD द्वारा जारी नहीं किया गया था।

संस्था के अधिकृत पत्राचार (दिनांक 06.04.2022) से पुष्टि हुई कि वास्तव में जारी प्रमाण पत्र में प्रदर्शन को ‘संतोषजनक’ बताया गया था।

प्रस्तुत पत्र में प्रयुक्त भाषा (“She will be an asset wherever she works”) संस्थान के किसी रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं थी।

जांच में यह प्रमाण पत्र कूटरचित (फर्जी) सिद्ध हुआ।

श्रीमती शुक्ला ने सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से MBA की डिग्री प्रस्तुत की, जिसमें चतुर्थ सेमेस्टर में 78.9% अंक दिखाए गए।

हालांकि, विश्वविद्यालय से प्राप्त दस्तावेजों के परीक्षण में निम्न विसंगतियाँ पाई गईं:

तृतीय और चतुर्थ सेमेस्टर दोनों की मार्कशीट पर एक ही तारीख (25.10.2010) अंकित थी।
जबकि, विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि तृतीय सेमेस्टर की परीक्षा जनवरी/फरवरी में और चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा जुलाई 2010 में आयोजित हुई थी।

श्रीमती शुक्ला के चयन के लिए जिस सायकोमेट्रिक परीक्षा का आयोजन किया गया, उसमें कई तकनीकी व प्रक्रियागत खामियाँ मिलीं:

मूल्यांकन पत्र पर मूल्यांकनकर्ता (सुजय कंसल्टेंट) के हस्ताक्षर नहीं थे। अभ्यर्थियों को जो अंक दिए गए, उसमें श्रीमती शुक्ला को सर्वोच्च (40/50) अंक प्रदान किए गए। साक्षात्कार पैनल का गठन भी श्री बेलवाल द्वारा स्वयं किया गया, जिसमें बाहरी विशेषज्ञों का चयन भी पूर्व नियोजित प्रतीत हुआ।

अंतिम चयन सूची पर शासन से आवश्यक अनुमोदन नहीं लिया गया, फिर भी उन्हें नियुक्त कर दिया गया।

इसके अतिरिक्त जांच में यह भी सामने आया कि श्रीमती शुक्ला पूर्व में आजीविका मिशन में जिला प्रबंधक (सामुदायिक संस्थागत विकास) के पद पर कार्यरत थीं। उन्होंने इस पद से विधिवत त्यागपत्र दिए बिना ही स्वयं को राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRD) हैदराबाद में प्रतिनियुक्त करवा लिया। इसके लिए उन्होंने मिशन कार्यालय से कार्यमुक्ति का आदेश प्राप्त किया, किंतु संविदा नियमों के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कार्यमुक्ति आदेश को बाद में निरस्त भी किया गया, परन्तु उनका पुनः मिशन में योगदान लेने संबंधी कोई अधिकृत दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस प्रक्रिया से यह भी स्पष्ट होता है कि उन्हें निरंतर प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त रहा।

अभी तक की प्रारंभिक जांच के दौरान एकत्र साक्ष्यों और दस्तावेजों के विश्लेषण से यह सिद्ध हुआ है कि श्री ललित मोहन बेलवाल, श्री विकास अवस्थी और श्रीमती सुषमा रानी शुक्ला ने मिलकर भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित किया, फर्जी दस्तावेजों का प्रयोग किया और शासन को गुमराह कर व्यक्तिगत लाभ प्राप्त किया। उक्त के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 471, 120-बी एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(सी) के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया गया है।
EOW में राज्य आजीविका मिशन में की गईं अन्य अवैध गतिविधियों की जांच अभी जारी है। भविष्य में और भी कई गड़बड़ियों के खुलासे की संभावना है।