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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

  • डॉ॰ वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944, इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है।
  • वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।
  • अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।
नेता कोरोना से ऐसे निपटें

नेता कोरोना से ऐसे निपटें

मीडियावाला.इन। दिल्ली के पास फरीदाबाद के विधायक नीरज शर्मा का एक वीडियो देखकर मैं दंग रह गया। नीरज ने बड़ी हिम्मत की और वे एक ऐसे गोदाम में घुस गए, जहां ऑक्सीजन  के दर्जनों सिलेंडर खड़े हुए थे। उन्हें...

कोरोना पर काबू कठिन नहीं

कोरोना पर काबू कठिन नहीं

मीडियावाला.इन। पिछले दो-तीन दिनों में कोरोना ने ऐसा जुल्म ढाया है कि पूरा देश कांप उठा है। जो लोग मोदी-सरकार के अंधभक्त थे, वे भी डर और कटुता से भरने लगे थे। सवा तीन लाख लोगों का कोरोना ग्रस्त...

राजनीतिः सेवा नहीं, मेवा है

राजनीतिः सेवा नहीं, मेवा है

मीडियावाला.इन। देश के सिर्फ पांच राज्यों में आजकल चुनाव हो रहे हैं। ये पांच राज्य न तो सबसे बड़े हैं और न ही सबसे अधिक संपन्न लेकिन इनमें इतना भयंकर भ्रष्टाचार चल रहा है, जितना कि हमारे अखिल भारतीय चुनावों...

भारत क्यों बने किसी का मोहरा ?*

भारत क्यों बने किसी का मोहरा ?*

मीडियावाला.इन। भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया—— इन चार राष्ट्रों के चौगुटे का जो पहला शिखर-सम्मेलन हुआ, उसमें सबसे ध्यान देनेवाली बात यह हुई कि किसी भी नेता ने चीन के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला जबकि माना जा रहा...

क्या फारुक अब्दुल्ला देशद्रोही हैं ?

क्या फारुक अब्दुल्ला देशद्रोही हैं ?

मीडियावाला.इन। सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. फारुक अब्दुल्ला के मामले में जो फैसला दिया है, वह देश में बोलने की आजादी को बुलंद करेगा। यदि किसी व्यक्ति को किसी नेता या साधारण आदमी की किसी बात पर आपत्ति हो तो...

कांग्रेसः मरता, क्या नहीं करता ?

कांग्रेसः मरता, क्या नहीं करता ?

मीडियावाला.इन। कांग्रेस पार्टी आजकल वैचारिक अधःपतन की मिसाल बनती जा रही है। नेहरू की जिस कांग्रेस ने पंथ-निरपेक्षता का झंडा देश में पहराया था, उसी कांग्रेस के हाथ में आज डंडा तो पंथ-निरपेक्षता का है लेकिन उस पर झंडा...

पुरुषप्रधान विश्व रचि राखा

पुरुषप्रधान विश्व रचि राखा

मीडियावाला.इन। हम लोग कितने बड़े ढोंगी हैं? हम डींग मारते हैं कि हमारे भारत में नारी की पूजा होती है। नारी की पूजा में ही देवता रमते हैं। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।’ अभी-अभी विश्व बैंक की एक रपट...

भारत-पाकः शुभ-संकेत

भारत-पाकः शुभ-संकेत

मीडियावाला.इन। भारत और पाकिस्तान को लेकर इधर कुछ ऐसी खबरें आई हैं कि यदि उन पर काम हो गया तो दोनों देशों के रिश्ते काफी सुधर सकते हैं। पहली खबर तो यही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया...

अमेरिका से वीज़ा को लेकर भारत के लिए अच्छी खबर

अमेरिका से वीज़ा को लेकर भारत के लिए अच्छी खबर

मीडियावाला.इन। अमेरिका और यूरोप से भारत की दृष्टि से दो अच्छी खबरें आई हैं। एक तो अमेरिका की बेहतर वीज़ा नीति और दूसरी जी-7 राष्ट्रों की बैठक में से उभरी विश्वनीति। डोनाल्ड ट्रंप ने गोरे अमेरिकियों के...

भारत-चीनः अभी बहुत कुछ बाकी है

भारत-चीनः अभी बहुत कुछ बाकी है

मीडियावाला.इन। चीन के साथ लद्दाख में चल रहे सीमा-विवाद का अब हल होता नजर आ रहा है। बस, वह नजर आ रहा है। अभी हम यह नहीं कह सकते कि वह हल हो गया है। ऐसा मैं इसलिए कह...

खबरपालिका लोकतंत्र का दिल हैं- डा वैदिक

मीडियावाला.इन। इंदौर। लोकतंत्र को शरीर माने तो न्यायपालिका उसके दिमाग, कार्यपालिका उसके हाथ, और विधायिका उसके पैर है तब खबरपालिका उसका दिल हैं और दिल का काम लोकतंत्र को जोड़ना...

किसान और सरकारः अब आगे क्या ?

मीडियावाला.इन। 26 जनवरी की घटनाओं ने सिद्ध किया कि सरकार और किसान दोनों अपनी-अपनी कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए लेकिन अब असली सवाल यह है कि आगे क्या किया जाए ? किसान लोग 1 फरवरी को संसद पर...

कोरोना का टीका पहले नेता लें

कोरोना का टीका पहले नेता लें

मीडियावाला.इन। कोरोना का टीका देश के लोगों को कैसे सुलभ करवाया जाएगा, इसके लिए केंद्र का स्वास्थ्य मंत्रालय पूरा इंतजाम कर रहा है लेकिन टीके के बारे में तरह-तरह के विचार भी सामने आ रहे हैं। कई...

ट्रंप हैं, अमेरिकी कलंक

ट्रंप हैं, अमेरिकी कलंक

मीडियावाला.इन। डोनाल्ड ट्रंप ने सिद्ध कर दिया है कि वह अमेरिका के कलंक हैं। अमेरिका के इतिहास में राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कुछ विवाद कभी-कभी जरुर हुए हैं लेकिन इस बार ट्रंप ने अमेरिकी लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाकर...

ये भारत से क्यों भागते हैं ?

ये भारत से क्यों भागते हैं ?

मीडियावाला.इन। अब से 50-60 साल पहले तक लंदन की सड़कों पर कुछ भारतीय जरुर दिख जाते थे। न्यूयार्क, वाशिंगटन, पेरिस, बर्लिन, रोम, तोक्यो और पेइचिंग जैसे शहरों में उन दिनों कोई भारतीय दिख जाता था तो लगता था जैसे कि...

यह लव के लिए जिहाद तो नहीं ?

यह लव के लिए जिहाद तो नहीं ?

मीडियावाला.इन। अब मध्यप्रदेश ने भी उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड की तरह ‘लव जिहाद’ के खिलाफ जिहाद बोल दिया है। मप्र सरकार का यह कानून पिछले कानूनों के मुकाबले अधिक कठोर जरुर है लेकिन यह कानून उनसे बेहतर है। मप्र के...

जम्मू-कश्मीर चुनाव का अर्थ

जम्मू-कश्मीर चुनाव का अर्थ

मीडियावाला.इन। जम्मू-कश्मीर के जिला विकास परिषद के चुनाव-परिणामों का क्या अर्थ निकाला जाए ? उसकी 280 सीटों में से गुपकार गठबंधन को 144 सीटें, भाजपा को 72, कांग्रेस को 26 और निर्दलीयों को बाकी सीटें मिली हैं। असली टक्कर...

संसद के सत्र से क्यों डरें ?

संसद के सत्र से क्यों डरें ?

मीडियावाला.इन। संसद का शीतकालीन सत्र स्थगित हो गया। अब बजट सत्र ही होगा। वैसे सरकार ने यह फैसला लगभग सभी विरोधी दलों के नेताओं की सहमति के बाद किया है। संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद पटेल का यह तर्क कुछ वजनदार जरुर...

मदरसों पर टेढ़ी नजर ?

मदरसों पर टेढ़ी नजर ?

मीडियावाला.इन। असम सरकार ने मदरसों के बारे में जो नीति बनाई है, उसे लेकर अभी तक हमारे सेक्यूलरिस्ट क्यों नहीं बौखलाए, इस पर मुझे आश्चर्य हो रहा है। असम के शिक्षा मंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने जो कदम उठाया...

किसान बचें नेताओं से

किसान बचें नेताओं से

मीडियावाला.इन। किसान नेताओं को सरकार ने जो सुझाव भेजे हैं, वे काफी तर्कसंगत और व्यावहारिक हैं। किसानों के इस डर को बिल्कुल दूर कर दिया गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म होनेवाला है। वह खत्म नहीं होगा। सरकार...