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दीपक शर्मा

30 नवम्बर, 1946 को लाहौर में जन्मी वरिष्ठ कथाकार दीपक शर्मा एक अति सम्मानित नाम है। लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज, लखनऊ के अँग्रेजी स्नातकोत्तर विभाग में अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के बाद आज भी अपने समकालीन कथाकारों से  बहुत आगे  पूरी शिद्दत से लिख रहीं हैं। 


बहुत सारे सामाजिक पक्ष जो हिंदी लेखन में अछूते हैं उन्हें दीपक शर्मा लगातार अपनी कहानियों का विषय बनाती रही हैं।दीपक शर्मा की कहानियों का अनुभव-संसार सघन और व्यापक है, जिसकी परिधि में निम्न-मध्यवर्गीय विषम जीवन है तो उत्तरआधुनिक ऐष्णाएँ भी हैं। इसके सिवा जीवन की अनेक समकालीन समस्याएँ, शोषण के नित नवीन होते षड्यन्त्रों और कठिन परिस्थितियों के प्रति संघर्ष लेखिका की कहानियों में उत्तरजीवन की चुनौतियों की तरह प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं; और कथा रस की शर्तों पर तो इनका महत्त्व कहीं और अधिक हो जाता है। 


बीमार बूढ़ों की असहाय जीवन दशा, लौहभट्ठी में काम करनेवाले श्रमिकों की जिजीविषा, कामगार माँ और उसका दमा, जातिवाद और पहचान का संकट जैसे कई अनिवार्य और समकालीन प्रश्नों से उपजी ये कहानियाँ आम जनजीवन और उत्तरआधुनिक समय के संक्रमण को बख़ूबी व्यक्त करती हैं सोलह  कथा-संग्रहों से अपनी पहचान बना चुकीं दीपक शर्मा हिन्दी कथा साहित्य की सशक्त  हस्ताक्षर हैं। 


जब अनेक महिला रचनाकारों ने ‘स्त्री-विमर्श’ को ‘देह-विमर्श’ के दायरे में समेटने की अनावश्यक कोशिशों में कसर नहीं छोड़ी है, ऐसे में स्त्री-प्रश्नों को ‘स्त्री-मुक्ति’ और ‘सापेक्ष स्वतन्त्रता’ का ज़रूरी कलेवर प्रदान करने में दीपक शर्मा की कहानियाँ अपना उत्तरदायित्व निर्धारित करती हैं।  वे अपनी कहानी में कस्बापुर को पात्र की तरह पेश करती है और भाषा के प्रयोग में उनका कोई मुकाबला नहीं ,अद्भुत भाषा शैली और प्रवाह उनकी विशेषता है


सम्पर्क : बी-35, सेक्टर सी, अलीगंज, लखनऊ-226024 (उ.प्र.)

खेमा

खेमा

मीडियावाला.इन। बाबा के संग पहली बार किस्सा खड़ा तो किया था मैंने उन्नीस सौ पैंसठ में मगर उसकी तीक्ष्णता आज भी मेरे अन्दर हाथ-पैर मारती है और लंबे डग भर कर मैं समय लांघ जाता हूँ... लांघ...

जुगाली

जुगाली

मीडियावाला.इन। “वनमाला के दाह-कर्म पर हमारा बहुत पैसा लग गया, मैडम|” अगले दिन जगपाल फिर मेरे दफ़्तर आया, “उसकी तनख्वाह का बकाया आज दिलवा दीजिए|” वनमाला मेरे पति वाले सरकारी कॉलेज में लैब असिस्टेंट रही थी तथा कॉलेज में...

पुराना पता

पुराना पता

मीडियावाला.इन। ‘इन दीज न्यू टाउन्ज वन कैन फाइन्ड द ओल्ड हाउजिस ओनली इन पीपल’ (‘इन नये शहरों में पुराने घर हमें केवल लोगों के भीतर ही मिल सकते हैं।’) इलियास कानेसी वह मेरा पुराना मकान है... उस सोते का उद्गम...

बापवाली !

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मीडियावाला.इन।बापवाली ! “बाहर दो पुलिस कांस्टेबल आए हैं,” घण्टी बजने पर बेबी ही दरवाज़े पर गयी थी, “एक के पास पिस्तौल है और दूसरे के पास पुलिस रूल. रूल वाला आदमी अपना नाम मीठेलाल बताता है. कहता है,...

पुराने पन्ने

पुराने पन्ने

मीडियावाला.इन। इस सन् २०१६ के नवम्बर माह का विमुद्रीकरण मुझे उन टकों की ओर ले गया है साठ साल पहले हमारे पुराने कटरे के सर्राफ़, पन्ना लाल, के परिवार के पाँच सदस्यों की जानें धर ली थीं| अट्ठाइस वर्षीया...

गीदड़-गश्त

गीदड़-गश्त

मीडियावाला.इन।किस ने बताया था मुझे गीदड़, सियार, लोमड़ी और भेड़िये एक ही जाति के जीव जरूर हैं मगर उनमें गीदड़ की विशेषता यह है कि वह पुराने शहरों के जर्जर, परित्यक्त खंडहरों में विचरते रहते हैं? तो क्या मैं भी...

जमा-मनफ़ी

जमा-मनफ़ी

मीडियावाला.इन।जमा-मनफ़ी पपा के दफ़्तर पहुँचते-पहुँचते मुझे चार बज जाते हैं| वे अपने ड्राइंगरूम एरिया के कम्प्यूटर पर बैठे हैं| अपनी निजी सेक्रेटरी, रम्भा के साथ| दोनों खिलखिला रहे हैं| “रम्भा से आज कुछ भी ठग लो,” मुझे देखते ही पपा...

ताई की बुनाई

ताई की बुनाई

मीडियावाला.इन। गेंद का पहला टप्पा मेरी कक्षा अध्यापिका ने खिलाया था| उस दिन मेरा जन्मदिन रहा| तेरहवां| कक्षा के बच्चों को मिठाई बांटने की आज्ञा लेने मैं अपनी अध्यापिका के पास गया तो वे पूछ बैठीं, “तुम्हारा स्वेटर...

निगोड़ी

निगोड़ी

मीडियावाला.इन। रूपकान्ति से मेरी भेंट सन् १९७० में हुई थी. उसके पचासवें साल में. उन दिनों मैं मानवीय मनोविकृतियों पर अपने शोध-ग्रन्थ की सामग्री तैयार कर रही थी और रूपकान्ति का मुझसे परिचय ‘एक्यूट स्ट्रेस डिसऑर्डर’, अतिपाती तनाव से...

कहानी : ऊँची बोली

कहानी : ऊँची बोली

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