Monday, January 27, 2020

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...

कुछ अभागे जिनका भाग्य भूगोल लिखता है

मीडियावाला.इन। अपने संविधान की प्रस्तावना ही हमें आश्वस्त करती है कि सभी देशवासियों को समान जीवन स्तर,समान दर्ज़ा और जीवन में समान अवसर,अधिकार के रूप में मिलेंगे.किन्तु, क्या यह सच नहीं है कि 'भूगोल'भी अपने यहाँ ज्यादातर...

अंतर्विरोधों में फंसी खेती और हमारी लाचारी

मीडियावाला.इन। खेती-बाड़ी के भारतीय उत्पादक और उपभोक्ता की क़िस्मत में शायद हमेशा लुटना ही लिखा है।भारत सहित सभी एशियाई देशों को छोड़कर, शेष विश्व के बारे में जो लोग भी थोड़ा जानते...

बाजार और काले बाजार में फंसी यूरिया के साथ खेती

मीडियावाला.इन। भारत में चुनावी नारे हों या राजनीतिक चर्चाएं,यदि आप उन पर  भरोसा कर लें,तो लगेगा कि इस देश की पहली चिंता शायद गाँव,गांव -वाले या गाँव की समस्याएं ही हैं.लेकिन,असल जिंदगी में चीज़ें बहुत-बहुत अलग हैं. दिल्ली की...

मरे पर मार हैं मिलावटी खाद बीज और दवाईयां

मीडियावाला.इन। आज किसान और किसानी की हालत किसी से भी छुपी हुई नहीं है.मौसम हो या बाज़ार,खाद-बीज हों,या कीड़ा-मार दवाईयों का खर्च या फिर सरकारी लापरवाही,भ्रष्टाचार या अफसरशाही ही क्यों न हो, हर तरफ से मार ही मार पड़...

'मूल अधिकार'नहीं स्वास्थ्य तो अब लूट का साधन है

मीडियावाला.इन। अपना संविधान जब बना था तब वाक़ई उसके निर्माताओं की दृष्टि दूर तक देखने में सक्षम थी.तभी तो इसके अनुच्छेद 21 में "जीवन के मूल अधिकार" के तहत चिकित्सा सेवाओं को नागरिकों के मूल अधिकार के...

मुक़दमों में फंसा किसान और मौज़ करते कारकून

मीडियावाला.इन। कहते हैं कि जब रोम जल रहा था,तब वहां का राजा 'नीरो'बांसुरी बजा रहा था. ऐसी ही एक किंवदंती अपने देश में भी है कि किसी दुश्मन के हमले के समय कोई नवाब साहब इसलिए नहीं...

'अमृत जल' और 'अमृत मिट्टी'का अमृत-पुरुष चला गया

'अमृत जल' और 'अमृत मिट्टी'का अमृत-पुरुष चला गया

मीडियावाला.इन। भारतीय खेती और किसानों के मानसिक त्रास पर,अब इतनी बातें हो चुकी हैं कि लगभग हर व्यक्ति जानने लगा है कि यह बहुत-बहुत कष्ट की आजीविका है.इसमें सिवाय घाटे और कर्जे के,कुछ भी नहीं है. उत्पादन की असुरक्षा,दामों...

हमारे शहर यूं ही परेशान नहीं हैं

हमारे शहर यूं ही परेशान नहीं हैं

मीडियावाला.इन। इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि नगर और महानगर किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था की 'धुरी'होते हैं.उन्हें विकास का 'इंजन' कहा जाता है. अपने देश में जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा नगरों और महानगरों...

किसानी के इस संकट से हम सब अछूते थोड़े ही रहेंगे

किसानी के इस संकट से हम सब अछूते थोड़े ही रहेंगे

मीडियावाला.इन। आने वाले संकट से निपटने की तैयारी पहले से करना,और सब लोगों को बराबरी से इससे वाक़िफ़ रखना किसी भी सभ्य समाज का जरूरी काम है.यह तो ठीक है,आने वाले संकट को पहले से पहचान ही लेना उससे ज्यादा ...

'सांप-सीढ़ी'की 'गोटी'बन गया है गरीब किसान

'सांप-सीढ़ी'की 'गोटी'बन गया है गरीब किसान

मीडियावाला.इन। अभी तक हम सबने पढ़ रखा था कि महाभारत में अभिमन्यु के लिए एक 'चक्रव्यूह' बनाया गया था,जिसमें फंसकर वह मारा गया था.वास्तव में चक्रव्यूह सिर्फ दुश्मन ही नहीं बनाते.परिस्थितियां भी बनाती हैं.जिनमें फंसकर कोई भी वैसे ही...

क़र्ज़दार किसान देश की सेहत के लिए ख़राब है

क़र्ज़दार किसान देश की सेहत के लिए ख़राब है

मीडियावाला.इन। आप सबसे माफ़ी मांगते हुए,यदि मैं कहूँ कि - भारत एक 'कृषि-प्रधान'नहीं,'राजनीति प्रधान' देश है,व इसके लोगों का आम शगल मनोरंजन और सनसनी ही है.वे इसके लिए क़र्ज़ में भी जीना पसंद कर लेते हैं.इस पर बेशक आप...

आसमानी आफत के पीड़ित तो हम हैं,पर अपराधी भी हैं

आसमानी आफत के पीड़ित तो हम हैं,पर अपराधी भी हैं

मीडियावाला.इन। इस साल का सितम्बर भी गया और अपने देश में बारिश और बाढ़ का सितम अभी भी जारी है.इसके पहले की वर्षा याद करें,तो एक दो बार को छोड़कर,शायद ही कभी देखा हो कि आसमान से आफत और...

'कुमाता' न होने की विनती के पहले मां को जीने तो दें

'कुमाता' न होने की विनती के पहले मां को जीने तो दें

मीडियावाला.इन। श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ करने के बाद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'क्षमा याचना'में हम देवी से निवेदन करते हैं कि "संसार में पुत्र का कुपुत्र होना संभव है,पर माता का कुमाता होना कदापि संभव नहीं है". यह इसलिए याद...

इंसानियत के संकट की आपराधिक अनदेखी

मीडियावाला.इन। हमारे समाज की एक अजीब आदत है,कि हम जिंदगी के लिए जरूरी कई बातों को बड़े आराम से कालीन के नीचे सरका देते हैं,और गैर-जरूरी चीजों से खिलौनों की तरह झूम-झूम कर खेलने लगते हैं.इस खेल में,कई बार...

'खतरे की घंटी है'खेतों में जवानों की कमी

मीडियावाला.इन। अपने देश में कई समस्याएं जानते-बूझते और साफ़ साफ़ देखते हुए आती हैं.हम भी बड़ी मासूमियत और सहूलियत से उनकी तरफ से आँखें फेर लेते हैं. ऐसी ही एक समस्या है खेती से नौजवानों का...

कैसे होगी गफलत में भविष्य की तैयारी

कैसे होगी गफलत में भविष्य की तैयारी

मीडियावाला.इन। सितम्बर का महीना आते ही हम पूरी शिद्दत से अपने देश की शिक्षा व्यवस्था,शिक्षकों की जिम्मेदारियों और उनके प्रति हमारे व्यवहार और दायित्वों की चर्चा करने लगते हैं . जो बरसों से होता चला आ रहा है,वही इस...

माना जन्नत क़रीब है,पर गाँव  कष्ट में हैं

माना जन्नत क़रीब है,पर गाँव कष्ट में हैं

मीडियावाला.इन। यह बात निर्विवाद है कि भारत एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है,और दुनिया की सबसे तेज आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है.लेकिन,टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ चीजें ऐसी भी हैं,जो आईने की तरह हमें चेता रही हैं...

यह 'प्रलय'तो पानी का हमसे 'बदला'है

यह 'प्रलय'तो पानी का हमसे 'बदला'है

मीडियावाला.इन। भारत में इन दिनों आये जल-प्रलय ने अभी तक 200 जानें ले ली हैं.बेघर होने वाले लोगों की संख्या 10 लाख से थोड़ी ज्यादा ही है.प्रभावित 9 राज्यों में जिंदगी तहस-नहस हो चुकी है. केंद्र और राज्यों के...

गरीबी कलंक ही नहीं 'कोढ़ में खाज'भी है

मीडियावाला.इन। दुनिया का सभ्य समाज गरीबी को अपने ऊपर लगा सबसे बड़ा कलंक मानता है.आपको,यह आंकड़ा ढूंढने से कहीं भी मिल जाएगा कि 1960 के विश्व आर्थिक सर्वेक्षण में आय का अधिकतम अंतर 30 गुना था.उसके अगले...

अब होगी 'भूख' की लड़ाई 'प्यास'से...

अब होगी 'भूख' की लड़ाई 'प्यास'से...

मीडियावाला.इन। यह शीर्षक,या इस तरह का विचार मात्र आपको अटपटा और झूठा लगेगा.लेकिन,यदि कोई ऐसा कहे,तो थोड़ा रूककर,इस पर विचार जरूर कीजियेगा.देश भर को तर-बतर कर देने वाले इस मौसम में यह बात करना आपको मूर्खता भी...