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मार्च 2025 तक बदल जाएगी
रेलवे के अनुसार मार्च 2025 तक 2000 के करीब एलएचबी कोचों का निर्माण किया जा रहा है। ये स्लीपर और जनरल श्रेणी के होंगे। इनमें से प्रत्येक मेल/एक्सप्रेस में चार -चार कोच लगाए जाएंगे, इस तरह 1300 कोच इन ट्रेनों में लग जाएंगे। इसके लिए डेड लाइन दिसंबर तय की गई है। बचे हुए 700 एलएचबी कोचों को मेल एक्सप्रेस के आईसीएफ से रिप्लेस किया जाएगा, इसके लिए भी डेडलाइन तय की गई है। मौजूदा समय कुल 740 रेक ( ट्रेन) आईसीएफ के दौड़ रहे हैं. रेलवे ने इस सभी कोचों को बदलने के लिए डेडलाइन तय कर दी है। वित्तीय वर्ष 2026-27 तक इनके बदलने का लक्ष्य रखा गया है।
नीले और लाल रंग के कोच में यह अंतर
आईसीएफ कोच स्टील के बने होते हैं, इस वजह से भारी होते हैं। वहीं इसमें एयर ब्रेक का प्रयोग होता है। इसके अलावा इसके रखरखाव में भी ज़्यादा खर्चा होता है। इसमें इसमें यात्रियों की क्षमता कम होती है। स्लीपर में कुल सीट 72 और थर्ड एसी में 64 होती है। ये कोच एलएचबी कोच से 1.7 मीटर छोटे होते होते हैं। दुर्घटना के समय डिब्बे एक के ऊपर एक चढ़ जाते हैं। आईसीएफ कोचों को 18 महीनों में ओवरहाल की भी जरूरत होती है।
एलएचबी कोच की तकनीक 24 साल पुरानी
लिंक हॉफमेन बुश (एलएचबी) कोच को बनाने की फैक्ट्री कपूरथला, पंजाब में स्थित है। ये तकनीक 2000 में जर्मनी से भारत लाई गई है। ये स्टेनलेस स्टील से बनाए जाते हैं, इस वजह से हल्के होते हैं। इसमें डिस्क ब्रेक का इस्तेमाल होता है। इनकी अधिकतम स्पीड 200 किमी प्रति घंटे होती है। इसके रखरखाव में कम खर्चा होता है। इसमें बैठने की क्षमता ज़्यादा होती है स्लीपर में 80, थर्ड एसी में 72, क्योंकि ये कोच आईसीएफ कोच से 1.7 मीटर ज़्यादा लंबे होते हैं। दुर्घटना के बाद इसके डिब्बे एक के ऊपर एक नहीं चढ़ते हैं। एलएचबी कोच को 24 महीनों में एक बार ओवरहाल की आवश्यकता होती है।