
सामाजिक और संसदीय दोनों ही वैमनस्यता राष्ट्रहित में नहीं हैं…
कौशल किशोर चतुर्वेदी
आजकल संसद से सड़क तक वैमनस्यता का माहौल बिखरा पड़ा है। पता नहीं देश में किस तरह का माहौल बन रहा है या बनाया जा रहा है। जातीय राजनीति ने एक अलग ही रूप ले लिया है। हाल ही के दिनों में ब्राह्मणों के खिलाफ समाज में वर्ग विशेष द्वारा लगातार हो रही विवादित टिप्पणियों ने पूरे समाज में जहर खोलने का काम किया है। और ऐसे बयानों पर ठोस कार्रवाई न हो पाने के चलते स्थितियाँ अराजक जैसी बन पड़ी हैं। तो हाल ही में घूसखोर पंडित जैसे टाइटल की फिल्म ने यह साबित कर दिया है कि वास्तव में सामाजिक वैमनस्यता चरम पर पहुँचाने के लिए, मानो सुनियोजित तरीके से काम हो रहा है। तो राजनैतिक वैमनस्यता के चलते संसद में भी अराजकता की स्थिति नजर आने लगी है। और जिस तरह सामाजिक वैमनस्यता बेकाबू होती दिख रही है, उसी तरह से राजनैतिक वैमनस्यता भी नियंत्रण से बाहर ही नजर आ रही है। विडम्बना यह है कि राजनीति में वोट बैंक को बचाने के लिए जो निर्णय लिए जा रहे हैं, उन पर यह विचार भी नहीं किया जा रहा है कि वास्तव में वह राष्ट्रहित को साध रहे हैं या नहीं। इनमें जातीय वैमनस्यता का वातावरण वास्तव में बहुत ही विनाशकारी साबित हो सकता है। अब संसद से सड़क तक सड़न गलन भरे इस माहौल से वास्तव में सामाजिक घुटन जैसी स्थिति बनने लगी है। और कहीं न कहीं यह स्थितियाँ सामाजिक विस्फोट की तरफ जाती दिख रही हैं।
संसद की बात करें तो एक ही दिन की दो घटनाएं शर्मसार कर रही हैं। संसद भवन परिसर में प्रदर्शन के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू में नोक झोंक की स्थिति बन गई। मामले का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। वीडियो में सुनाई दे रहा है कि एक ओर जहां राहुल ने बिट्टू को गद्दार कहा। वहीं, बिट्टू ने उन्हें देश का दुश्मन करार दिया। खास बात है कि बिट्टू कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे।
वहीं भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने नेहरू-गांधी परिवार पर निशाना साधते हुए कहा कि यहां किताब पर चर्चा चल रही थी जो आज तक छपी ही नहीं है। मैं उस किताबों के बारे में बताना चाहता हूं जो नेहरू, कांग्रेस परिवार के गद्दारी, मक्कारी, भ्रष्टाचार और अय्याशी से भरी पड़ी है। भाजपा सांसद के इस बयान पर विपक्ष ने जमकर पलटवार किया। विपक्षी सांसदों ने दुबे के खिलाफ लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से शिकायत की है। प्रियंका गांधी ने भी दुबे पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने किताबें दिखाईं, लेकिन उनका माइक बंद नहीं किया गया, जबकि राहुल गांधी को किताब से कोट नहीं करने दिया गया था।
तो संसद के बजट सत्र में 4 फरवरी 2026 को भी लोकसभा में हंगामा देखने को मिला। लोकसभा में शाम 5 बजे पीएम मोदी को राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलना था। इस बीच महिला सांसदों के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए सदन की कार्यवाही को अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया गया। कहा जा रहा है कि महिला सांसदों ने पीएम की कुर्सी को घेर लिया था। यह सब कितना हास्यास्पद और राजनैतिक अराजकता जैसा नजर आ रहा है।
वहीं 3 फरवरी को नेटफ्लिक्स के एक इवेंट के दौरान फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ का टीजर रिलीज किया गया। जिसे देखने के बाद हर शख्स इस फिल्म को लेकर भड़कता दिखाई दिया। दरअसल, फिल्म की कहानी को छोड़ ज्यादा बातें फिल्म के टाइटल पर हो रही हैं, जिसको लेकर लोग फिल्म निर्माता के साथ नेटफ्लिक्स को भी आड़े हाथ ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में यूजर्स इस नाम को आपत्तिजनक और जातिवादी बताते हुए कड़ा विरोध जता रहे हैं। वहीं साधू-संतों का कहना है कि फिल्म के नाम के जरिए एक खास समुदाय को निशाना बनाया गया है।
और वर्तमान स्थिति पर मध्य प्रदेश के वरिष्ठतम विधायक, पूर्व नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव
की पीड़ा को भी समझा जा सकता है। उन्होंने मंच से कहा कि ‘आज तमाम संगठनों का का एक ही लक्ष्य रह गया है ब्राह्मणों को मारो, उन्हें दबाओ और उन्हें हाशिए पर ले जाओ, इन्हें नीचा दिखाओ।’ दरअसल यूजीसी को लेकर मध्य प्रदेश सहित देश में सवर्ण समाज विरोध-प्रदर्शन कर रहा है। भार्गव ने अपने दर्द को खुलकर व्यक्त करते हुए कहा कि ‘ब्राह्मण समाज आज सभी की आंखों में खटक रहा है। उन्होंने आगे कहा कि अब समय आ गया है, जब ब्राह्मण समाज को एकजुट होने की जरूरत है।’
गोपाल भार्गव ने अपना दर्द व्यक्त किया कि देश में जिस तरह का माहौल बना है, जिस तरह के फैसले हो रहे हैं। उससे मैं काफी चिंतित रहता हूं। रात—रात भर नींद नहीं आती, रूह कांप जाती है कि आगे क्या होने वाला है। उन्होंने कहा कि हम संगठित हो जाएं, अन्यथा पीढ़िया माफ नहीं करेंगी।
बात बस इतनी सी है कि आखिर वैमनस्यता का अंत क्या है? जातीय राजनीति की बात करें तो अपने ही समाज के हासिए पर बैठे लोगों के लिए समाज की मुख्यधारा में आ चुके हैं उसी जाति के लोग आरक्षण का लाभ लेना तक नहीं छोड़ पा रहे हैं। दूसरी जाति को गाली देकर अपनी जाति में नेता बनना ही राजनीति का मुख्य उद्देश्य रह गया है। तो वोट बैंक साधने के लिए
राष्ट्रहितों के साथ समझौता कर हो रहे फैसले सामाजिक वैमनस्यता की प्रचंड आग से सब कुछ खाक करने की स्थितियाँ बना रहे हैं। तय सब कुछ लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त राष्ट्र के जिम्मेदारों को ही करना है। आम नजरिए से बस यही कहा जा सकता है कि सामाजिक और संसदीय दोनों ही वैमनस्यता राष्ट्रहित में नहीं हैं…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।





