सामाजिक क्रांति के उत्प्रेरक: भगवान महावीर

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सामाजिक क्रांति के उत्प्रेरक: भगवान महावीर

डा. सीमा शाहजी

हिंसा और शोषण से पीडित मावन समाज में भगवान महावीर सामाजिक क्रांति के उत्प्रेरक बन ……..क्रांतिकारी व्यक्त्वि लेकर इस धरा पर ऐ प्रकाश पुंज लेकर आए थे। वे जिस केन्द्र बिन्दु पर समाज की सर्वतोमुखी विकास की रचना करना चाहते थे। पारिस्थितिकी उसके सर्वथा प्रतिकुल थी। धार्मिक जडता ……..अन्धश्रद्धा …….जातिभेद …..उंच नीच…….कुलानुगत वैषम्य……..जैसे विषम काटे समाज व सामाजिक व्यवस्थाओं को नश्तर चुभा रहे थे। भगवान महावीर ने व्यक्ति व समाज को इनकी निरर्थकता से परिचय करने का शंखनाद फुंका। सहिष्ण्ुता और सदाशयता से वे सामाजिक प्रगतिगामी बने,सामाजिक क्रांति के प्रेरणा स्तम्भ भी …..।
महावीर ने भौतिक ऐश्वर्य की चरम सीमा को स्पर्श किया था , किंतु आध्यात्मिकता के अभाव में वे एक विचित्र रिक्तता का अनुभव कर रहे थे। अस रिक्तता की पुर्ति किसी बाह्य साधन से संभव नही थी। अपने इस अभाव की पुर्ति के लिए राजसी-वैभव का त्यागकर अकिंचन व्रत स्वीकारा और अटल बैरागी,अपरिग्रही,और निस्पृही बन गए। जीवन की यही पृष्ठभूमि उनहे क्रांति की और ले गई और मानव जीवन के विभिन्न परिपार्श्वो को उन्होने जड……गतिहीन…..निष्क्रिय……रूपाकारों में देखा। धार्मिक…..आर्थिक…..सामाजिक…..बोद्धिक क्षैत्र में उन्होने जो क्रांति की उसके मुल में काम-क्रोध-मद-लोभ-इ्रर्ष्या-द्वेष आदि कषायों का दमन था।
जिस समय भगवान महावीर ने धर्म के क्षैत्र में प्रवेश किया ,वह अंतस से जागरण की उपासना न होकर प्रदर्शन मात्र रह गया था। उपासना के क्षैत्र में विकारों और विभाओं का दमन न करके यज्ञ में भोैतिक सामग्री की आहुति देना और प्शुओं की बलि देना धर्म का स्वरूप बन गया था। जनसामान्य की भीरूता पंरपराओं की आड में निर्दोष पशु-पक्षियो का बलिदान कर रहे था।
धर्म का यह वीभत्स रूप् देखकर भगवान महावीर ने धार्मिक छलछंदों में -क्रांति की अनूभुति के रूप में नुतन जीवन-दृष्टि के विस्तार को नए धरातल दिए। नई दिशाए दी। उसके क्रियान्वयन के लिए समाज की रूढिगत मान्यताओं एंव पंरपरागत मूल्यो को भी बदलने के लिए जन मानस को झकझोरा। इसी संदर्भ में उनकी सामाजिक क्रांति का आगाज हुआ। महावीर ने देखा कि समाज में दो वर्ग है- पहला कुलीन वर्ग है जो कुलाभिमान के बल से शोषण करता है और दुसरा निम्न वर्ग है जिसका शोषण किया जा रहा है। इसके लिए उन्होने अपरिग्रह-दर्शन की विचारधारा प्रस्तुत की जिसकी भित्ति पर आर्थिक क्रांति का शिलान्यास हुआ।

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ब्राम्हण,क्ष्त्रिय,वैश्य,शुद्र वर्ग की अवधारणा जो कभी कर्म के आधार पर श्रम विभाजन को ध्यान में रखकर की गई थी , वह काल क्रमानुसार रूढिगत हो गई और उसका आधार केवल जमाकुल रह गया। जन्म से ही व्यक्ति ब्राम्हण,क्ष्त्रिय,वैश्य,व शुद कहा जाने लगा। समाज में शुदा्रे की स्थिति अत्यंत से अत्यंत दयनीय हो गई ।

नारी जाति की स्थिति भी यही रही थी। शुद्रो और नारी-जाति की इस दयनीय निंम्नतर अवस्था के रहते धार्मिक व सामाजिक क्षैत्र में प्रवर्तित क्रांति का कोई महत्व नही था। अतः भगवान महावीर ने दृडतापुर्वक शुद्रो और नारी-जाति को अपने धर्म मे दीखित किया। यह घोषणा कि की जन्म से कोई ब्राम्हण, क्षत्रिय वैश्य,शुद्र नही होता बल्कि कर्म से होता है। इन्द्रभूति ब्राम्हण से लेकर हरीकेशि चाण्डाल तक सभी के लिए आध्यात्म साधना का द्वार खोल दिया।
आदर्श समाज की स्थापना के लिए महावीर ने व्यक्ति के जीवन में व्रत साधना को प्रतिष्ठित किया। उस युग का धर्म अपनी प्रकृति को भुलकर क्रियाकांड में आबद्ध हो गया था। ईश्वर की उपासना सर्वसाधारण के लिए न होकर वर्ग विशेष का जन्त सिद्ध अधिकार हो गई थी। उसकी दृष्टि सूक्ष्म से स्थूल और अंतर से बाह्य हो गई थी। इस विरोधाभासी परिस्थिति का प्रतिकार किए बिना अध्यातम में आगे बढना दुष्कर था।

भगवान महावीर ने धर्म और उपासना की इस रूढ पद्धति का जोरदार खण्डन किया और बताया कि ईश्वर को प्राप्त करने के साधनो पर व्यक्ति या जाति विशेष का अधिकार नही वरन् मानव-मात्र को स्वतंत्र निर्लेप और निर्विकार ईश्वर को प्राप्त करने का अधिकार है। व्यक्ति चाहे किसी जाति धर्म वर्ग या लिंग का हो-मन की शुद्धता और आचरण की पवित्रता के बल पर ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
आवश्यकता इस बात कि है कि ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला मुमुक्षु अपने -कोंध,मान,माया,लोभ का त्याग दे।
भगवान महावीर ने ईश्वर को इतना व्यापक बना दिया कि कोई भी साधक ईश्वर को ही प्राप्त नही करे वरन् स्वंय ईश्वर बन जांए क्योकि हर मानव में ईश्वरीय शक्ति निहित है। उसे पहचान कर साधक बन साध्य को प्राप्त किया जा सकता है। इस उदात्र भावना ने असहाय,निष्क्रिय, और निराश जनता के मानस में शक्ति ,आत्म विश्वास और उत्साह का स्फुरण किया । वह अपने प्रमाद और मुर्छा से छुटकर आत्मसाधना में लीन हो गई।

महावीर ने सच्ची उपासना पद्धति का सुत्रपात किया । उन्होने बताया कि श्रावक के जिन बारह व्रतो का विधान किया ,उनमें समाज-रचना के तत्व किसी न किसी रूप् में समाविष्ट है। निरिह को दण्ड न देना-असत्य न बोलना-चोरी न करना- न चोर को सहायता देना-स्वंय संतोष व धैर्य रखना-आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना-न्याय प्रवृति के क्षैत्र में मर्यादा रखना-जीवन में समता,संयम, त्यागवृत्ति को विकसित करना, इस व्रत साधना का मूलभाव है। शक्ति और शील,प्रवृत्ति और निवृत्ति का यह अद्भूत सामंजस्य ही समाजवादी समाज की रचना का मूल आधार होना चाहिए। महावीर की सामाजिक क्रांति हिंसक न होकर अहिंसामूलक है।
भगवान का मत था- सच्चे जीवनानंद के लिए आवश्यकता से अधिक धन संग्रह उचित नही ,उससे व्यक्ति लोभवृत्ति की और अग्रसर होता है। समाज का शेष अंग उस वस्तु से वंचित रह जाता है। फलतः समाज मे संपन्न और विपन्न दो वर्ग उत्पन्न हो जाते है। और दोनो मे संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। मार्क्स ने इसे वर्ग संघर्ष की संज्ञा दी और इसका हल हिंसक क्रांति मे ढुंढा पर भगवान महावीर ने आर्थिक वैषम्य मिटाने के लिए अपरिग्रह की विचारधारा प्रस्तुत की। मार्क्स की क्रांति का मूल आधार भौतिक है उसमें चेतना को नकारा गया है जबकि महावीर की आर्थिक क्रांति चेतनामूलक है। इसका केन्द्र बिन्दु जडपदार्थ नही वरन् व्यक्ति स्वंय है।

भगवान महावीर का निश्चित मत था कि-समान्यतः समाज में हरयुग- हर काल में संघर्ष या विकार का कारण दुराग्रह,दृडवादिता आदि है। यदि उसके समस्त पहलुओं को भलीभांति देख लिया जाए तो कही ना कही सत्याशं निकल जाएगा। इस बौद्धिक दर्शन को ही महावीर ने स्याद्ववाद या अनेकांत दर्शन कहा । आईन्सटाईन का सापेक्षवाद इसी भूमिका पर खडा है । आचार में अहिंसा और विचार में अनेकांत की प्रतिष्ठा के द्वारा महावीर ने अपनी क्रांतिमूलक दृष्टि को व्यापकता प्रदान की।

इस प्रकार हम देखते है कि भगवान महावीर ने दया-प्रेम-ममता-करूणा आदि को प्रस्थापित करके मानव भाव ’जिओ और जीने दो’ का महान संदेश दिया। समाज के धरातल पर मानव का मानव से प्रेम करना हिंसा से नही अहिंसा से हर परिस्थिति में जीतना यह अनमोल हीरक कनिया देकर वे सही अर्थो में उपदेशक नही अपितु सामाजिक क्रांति के उत्प्रेरक बन आज भी प्रेरणाओं की मौक्तिक मणिया बिखेरे सामाजिक चेतना को आभासित करते हुए ’महावीर बनो , वीर बन कर चलो’जैसे संदेश हमारी उर्जस्विता,अतंस की मावन चेतना को बनाए रखने मे तब अब हमारा विश्वास-संबल बने रहते है। इसलिए इतने वर्ष बीत जाने पर भी भगवान महावीर से हमें प्रेम है। व्यक्ति एक संकल्पना करता है कि उसे भी कही न कही महावीर से महावीर बनने का संकल्प लेना है उनके संदेश शाश्वत है,हर युग मे सापेक्ष है समाज में व्याप्त रूढियो,अंधविश्वासो,गलत पंरपराओं,को हटाने मे क्रांति की सर्च लाईट फेंककर फर्चा उजाला जय महावीर का हम अपने आसपास अपनी आत्मा मे एक अनहद खुशबू का अहसास करते है। हर मन की क्रांति एक सामाजिक आकार लेकर स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करती साफ नजर आने लगती है। हम भी अपने आप मे महावीर को खोजते है और अपनी साधना मे जुट जाते है। उसी सामाजिक क्रांति के उत्प्रेरक भगवान महावीर को नमन करने हमारे दोनो हाथ मन-वचन-काया से जुड जाते है।

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