Saturday, December 14, 2019

साहित्य

कविता : एब्स्ट्रैक्ट

कविता : एब्स्ट्रैक्ट

तुम्हें लगता है मेरा अक्स - एब्स्ट्रैक्ट लगना भी चाहिए - तुम्हें ! एब्स्ट्रैक्ट हूँ मैं - झूठ और  नाइंसाफ़ी के बीच इंसाफ़ में ... इंसानियत और नफ़रत की दीवारों पर ठुंकी कीलों से झूलती रस्सी की...

कहानी : पुतली घर

कहानी : पुतली घर

सुबह नाश्ता करते हुए टीवी देखना लगभग आदत में शुमार हो चुका था |वीडियो क्लिपिंग सहित खबर आ रही थी कि वर्षों पुरानी कठपुतली कालोनी पर आवास विकास के कारिदों ने कल धावा बोल दिया | अब वहां एक...

कहानी : अभी ही जाना था पापा को

कहानी : अभी ही जाना था पापा को

      'यू हैव ए न्यू मेल!' कम्प्यूटर के स्क्रीन ने लाल सितारे के साथ संदेश दिया.       'ओके'। माउस क्लिक हुआ.       ई-मेल का जाल फैला. मेल खुला. स्क्रीन पर संदेश टिड्डी की तरह...

व्यंग : उलटे लटकते हम और सीधा होता उल्लू

व्यंग : उलटे लटकते हम और सीधा होता उल्लू

ख़बर क्या थी, साक्षात वाइरल होता वीडियो ही था। सीन कुछ यों था कि एक पेड़ था। पेड़ की डाल पर एक बन्दा एकदम उलटा लटक रहा था। ठीक वेताल की तरह। यों वह वेताल नहीं था, क्योंकि उसके...

कहानी : लौट आना ली...

कहानी : लौट आना ली...

वह एक उदास सी शाम थी। धुआँई सी पीली। दूर क्षितिज में गुम होता एक नन्हा नारंगी शावक आसमान की गर्भ से सरक रहा था चुपचाप। आसमान की देह निचुड़ कर साँवली हो गई थी, उदास, कमजोर, और बेजार।...

कहानी : ऊँची बोली

कहानी : ऊँची बोली

मीडियावाला.इन। समाचारों में माँ को उनकी हत्या लाई थी। कारण दो थे। पहला, पप्पा ने माँ के लापता होने पर दर्ज करवाई गई अपनी एफआईआर में जिस बृजलाल का नाम संभावित अपहर्ता के रूप में...

कहानी : रंग ढंग

कहानी : रंग ढंग

मीडियावाला.इन। दफ्तर में तेजी से काम करती शाश्व ती अपनी कर्मठता और दक्षता के बल पर पूरे ऑफिस को अपनी मुट्ठी में कैद करने का जादू जानती थी । जब बॉस केबिन में बुलाकर उससे...

कविताएं - रीता दास राम

कविताएं - रीता दास राम

1  गीला मन  भीगी भीगी औरतें  भरी-भरी आँखें  पसीने से तर-बतर  संस्कृति की जुगाली पर  खींच रही जिंदगी  खोलते हुए बंधन  एक एक इंच गांठ  गर्भाशय को मशीन  शब्द...

व्यंग - बिगड़ा हुआ कूलर और एक अदद ठेले वाले की तलाश!

व्यंग - बिगड़ा हुआ कूलर और एक अदद ठेले वाले की तलाश!

मुझे एक ठेले वाले की तलाश थी, जो घर से कूलर उठाकर मेकेनिक की दूकान तक पहुंचा दे| मेरा कूलर खराब हो गया था| मुझे पता नही था कि इस बीच दुनिया काफी बदल चुकी है| आजकल कूलर सुधारने...

कविता : आनंद कुमार शर्मा

कविता : आनंद कुमार शर्मा

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में दखल रखने वाले श्री आनंद शर्माजी का आज जन्म दिन है और आज इस खास अवसर पर हम यहाँ उनकी एक खुबसूरत सी कविता प्रकाशित कर रहे है|  ...

कविताएँ : पंखुरी सिन्हा

कविताएँ : पंखुरी सिन्हा

खील बताशा कविता खील बताशे, कविता मेरी दोस्त, कविता कुल्हिया, चुकिया, कविता तीज त्यौहार, कविता गीत मल्हार, कविता गली नुक्कड़, कविता चौक चोराहा, कविता धरी बातें, कविता बातों में लौटना, कविता बातों का विसर्जन, कविता दराजों में...

कहानी : कार्यशाला बनाम बातशाला

कहानी : कार्यशाला बनाम बातशाला

शालिनी का आज दफ्तर में पहला दिन था। सुबह से काम कुछ न किया था बस परिचय का दौर ही चल रहा था। बड़े साहब छुट्टी पर थे सो पूरा दफ्तर समूह बनाकर खिड़कियों से छन-छन कर आती धूप...

कहानी : एक ढोलो दूजी मरवण...तीजो कसूमल रंग

कहानी : एक ढोलो दूजी मरवण...तीजो कसूमल रंग

महानगर की चहल - पहल में मेरे आगे कई तरह के मौन - मुखर प्रेम गुज़रते रहे हैं.  कई महान प्रेम मेरे सामने - सामने ही अपनी चमक खो बैठे. दो बरस पहले आंख के आगे गुज़रा वह प्रेम...

कहानी : फ्रेम - प्रज्ञा

कहानी : फ्रेम - प्रज्ञा

फ्रेम “आज शाम पांच बजे आई. एन. ए…. दिल्ली हाट” “ओ.के.” “ठीक पांच” “ओ.के.” रावी और जतिन के बीच दिन भर में न जाने कितने मैसेजेस का आदान-प्रदान होता रहता है। कहने को...

व्यंग : चिंकारा होने की आज़ादी - प्रेम जन्मेजय

व्यंग : चिंकारा होने की आज़ादी - प्रेम जन्मेजय

मीडियावाला.इन। मेरे दांत में भयंकर दर्द था। जब दर्द भयंकर हो तो आप दर्द के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोच पाते हैं। वह दर्द रोटी का हो, बेरोजगारी का हो, फसल बरबाद होने का हो...

कविता : सुन रही हो श्यामली - आरती तिवारी

कविता : सुन रही हो श्यामली - आरती तिवारी

|| सुन रही हो श्यामली  ||   तुम तो वही बेबाक बिंदास पारदर्शी लड़की हो न जिसे खरी बात मुंह पर कह देने से कोई रोक नहीं पाता था और सलीके से कही...

कहानी : मलाई - गीता श्री

कहानी : मलाई - गीता श्री

सब लोग हैरान, अचानक सुरीलिया को क्या हो गया है। सुरीलिया की ठसक देखते बन रही है। वह घर के बाहर चौकी पर धम्म से बैठ गई। घर के अंदर से उसका सारा संसार बाहर आ चुका था। मां...

कहानी - जो जी ना सके... - जयश्री रॉय

कहानी - जो जी ना सके... - जयश्री रॉय

मीडियावाला.इन। बहुत दिनों बाद घर लौटी हूँ, अच्छा लग रहा है। इस बार अस्पताल का चक्कर बहुत लंबा रहा। देवेश बिस्तर के बगल में बैठ कर फल छुड़ाते हुये मज़ाक में कहता था, गुस्सा हो कर मायके...

कहानी - कंट्रोल+अल्ट+शिफ्ट = डिलीट

कहानी - कंट्रोल+अल्ट+शिफ्ट = डिलीट

मीडियावाला.इन। मैंने कुछ नहीं किया। मैं बस गेम जीतने ही वाला था। काउंटर स्ट्राइ के तीन ग्रेड पूरे होने आए थे। मेरा कंसोल मेरे बस में नहीं था। लेफ्ट-राइट कीज मूव करते हुए मैं खुद भी उसी...

कविता - चालीस साला औरतें

कविता - चालीस साला औरतें

इन अलसाई आँखों ने रात भर जाग कर खरीदे हैं कुछ बंजारा सपने सालों से पोस्टपोन की गई उम्मीदें उफान पर हैं कि पूरे होने का यही वक्त तय हुआ होगा शायद अभी नन्हीं उँगलियों से...