न्याय संहिता के बल पर अर्बन नक्सल जैसी समस्याओं से निपटने की चुनौतियाँ 

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न्याय संहिता के बल पर अर्बन नक्सल जैसी समस्याओं से निपटने की चुनौतियाँ 

आलोक मेहता

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में निरंतर बने रहने के 12 वर्ष और 4399 दिन के ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर अनेक उपलब्धियों की चर्चा हुई | लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के लिए बनी न्याय संहिता का उल्लेख नहीं दिखाई दिया | जबकि इसके दो वर्ष के प्रारंभिक चरण में ही ब्रिटिश राज वाले कानूनों में हुए बड़े परिवर्तन का असर दिखने लगा है | नक्सल समस्या के आतंक से मुक्ति का लक्ष्य मार्च 2026 में बहुत हद तक पूरा हो गया | लेकिन अर्बन नक्सल का नासूर और विदेशी फंडिंग से भारत विरोधी गतिविधियों और प्रचार पर नियंत्रण के लिए अभी कानूनों में और भी संशोधनों , परिवर्तनों की चुनौतियाँ है | हाल ही में कुछ ऐसे ही गंभीर आपराधिक मामलों में उच्च न्यायालयों के फैसलों से क़ानूनी कमियों की बातें सामने आई हैं | यह अवश्य है कि इंफोर्स्मेंट डायरेक्टरेट या सी बी आई सुप्रीम कोर्ट में अपील कर अधिकाधिक प्रमाण प्रस्तुत करके दोषियों को दण्डित करवाने के प्रयास कर रही है |

याद रहे 1 जुलाई 2024 से ब्रिटिश काल से चले आ रहे तीन प्रमुख कानून—भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act)—की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) ने ले ली। ब्रिटिश शासन के 1500 से अधिक पुराने कानूनों को समाप्त कर दिया गया है।1947 में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की थी; 2024 के बाद यह मुद्दा उठने लगा कि क्या भारत अपनी न्यायिक और विधिक संरचना को भी पूरी तरह औपनिवेशिक विरासत से मुक्त कर पाएगा ? भारतीय न्याय संहिता इस यात्रा का अंत नहीं, बल्कि प्रारंभ है | इसी सन्दर्भ में पिछले दिनों एक प्रकरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , ऑनलाइन मीडिया में विदेशी पूंजी के दुरूपयोग से भारत विरोधी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने के गंभीर आरोपों के बावजूद दिल्ली की हाई कोर्ट से राहत चिंता का विषय बना है | ई डी अब इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाला है , लेकिन यह प्रमाण है कि न्याय संहिता के लिए अभी जांच एजेंसियों , पुलिस आदि को अधिक क़ानूनी अधिकार और संसाधन जुटाने की आवश्यकता होगी |

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने न्याय संहिता को संसद में पारित करने पर इन कानूनों को स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े आपराधिक न्याय सुधारों में से एक बताते हुए कहा कि था कि आने वाले वर्षों में भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली दुनिया की सबसे आधुनिक प्रणाली बन सकती है। पुलिस, फोरेंसिक विज्ञान, अभियोजन और न्यायालयों को डिजिटल माध्यम से जोड़कर न्याय को तेज, पारदर्शी बांया जा रहा है | दशकों तक ऐसे कानून थे जिनकी मूल संरचना औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुई थी। उनका मुख्य उद्देश्य शासन व्यवस्था बनाए रखना था, जबकि आधुनिक लोकतंत्र में कानून का उद्देश्य नागरिक अधिकारों की रक्षा और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना है। साइबर अपराध, डिजिटल साक्ष्य, संगठित अपराध, आतंकवाद, वित्तीय अपराध और अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पुराने कानून पर्याप्त नहीं थे। इसलिए व्यापक संशोधन किए गए हैं |

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने औपनिवेशिक काल के पुराने कानूनों को समाप्त कर स्वदेशी भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू करने को ऐतिहासिक कदम बताया है | उनका कहना है कि इन कानूनों का मूल उद्देश्य केवल ‘दंड देना’ नहीं, बल्कि ‘न्याय सुनिश्चित करना’ है, जो नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हैं | भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के संपूर्ण स्वरूप का आधार है। भारतीय संविधान की भावना से प्रेरित भारतीय न्याय संहिता का लागू होना गौरवशाली है, क्योंकि राष्ट्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहां वह विकसित भारत के संकल्प की दिशा में आगे बढ़ रहा है |

प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि देश की नई न्याय संहिता बनाने की प्रक्रिया उतनी ही व्यापक रही है जितनी कि स्वयं संहिता। इसमें देश के कई प्रसिद्ध संविधान और कानूनी विशेषज्ञों का परिश्रम शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय के कई मुख्य न्यायाधीशों के सुझावों के साथ-साथ देश के कई उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और अन्य सामाजिक राजनैतिक संगठनों ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे ।

भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में हर पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता है। न्याय संहिता यह सुनिश्चित करती है कि कानून पीड़ित के साथ खड़ा रहे। “नागरिक सर्वोपरि, न्याय संहिता का मूल मंत्र है।” ये कानून नागरिक अधिकारों के रक्षक और न्याय की सुगमता का आधार बन रहे हैं। पहले एफआईआर दर्ज कराना बेहद मुश्किल था | अब जीरो एफआईआर वैध हो गई है और अब कहीं से भी मामला दर्ज किया जा सकता है। नई न्याय संहिता के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में मानवता और संवेदनशीलता पर प्रकाश डालते हुए श्री मोदी ने कहा कि अब आरोपी को बिना सजा के लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकेगा और अब 3 साल से कम सजा वाले अपराधों के मामले में भी गिरफ्तारी केवल उच्च अधिकारी की सहमति से ही की जा सकती है। छोटे अपराधों के लिए अनिवार्य जमानत का प्रावधान भी किया गया है। न्याय संहिता में प्रत्येक मामले के प्रत्येक चरण को पूरा करने के लिए समय सीमा निर्धारित करके आरोपपत्र दाखिल करने और फैसले जल्दी सुनाने को प्राथमिकता दी गई है। इसमें कोई शक नहीं कि प्रत्येक विभाग, प्रत्येक एजेंसी, प्रत्येक अधिकारी और प्रत्येक पुलिसकर्मी से न्याय संहिता के नए प्रावधानों को जानने और उनके सार को समझने की आवश्यकता हैं ।ने राज्य सरकारों द्वारा न्याय संहिता के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी हैं | न्याय संहिता को जितना अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा, देश का भविष्य उतना ही बेहतर और उज्ज्वल होगा |

सरकार का विश्वास रहा है कि नए आपराधिक कानून आतंकवाद, संगठित अपराध, साइबर अपराध तथा विदेशी समर्थन प्राप्त अवैध गतिविधियों के विरुद्ध अधिक प्रभावी कार्रवाई का आधार प्रदान करेंगे। वहीं विधि विशेषज्ञ इस बात पर बल देते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकता है। कुछ क़ानूनी विशेषज्ञों ने न्याय संहिता पर पुस्तकें लिखी अथवा सार्वजनिक मंचों पर विचार व्यक्त किए | सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और लेखक अश्विनी दुबे ने सबसे पहले इस विषय पर बहुत अच्छी पुस्तक ‘ एन्ड ऑफ़ कोलोनियल लॉज़ ‘ लिखी , जिसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों ने महत्वपूर्ण बताया | यह पुस्तक केवल नए आपराधिक कानूनों की चर्चा नहीं करती, बल्कि उस व्यापक सोच को रेखांकित करती है जिसके तहत स्वतंत्र भारत की विधिक व्यवस्था को औपनिवेशिक विरासत से मुक्त करने का प्रयास किया जा रहा है। अश्विनी दुबे तर्क देते हैं कि भारत अब केवल कानूनों के नाम बदलने की प्रक्रिया में नहीं है, बल्कि शासन, न्याय और नागरिक अधिकारों के पूरे ढाँचे को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और भाजपा नेता अमन सिन्हा ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) को भारत की न्याय प्रणाली को औपनिवेशिक काल से मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में विभिन्न मंचों पर रखा है। उनके प्रमुख कानूनी विश्लेषण और राजनीतिक रुख आपराधिक कानून के आधुनिकीकरण, औपनिवेशिक काल के पूर्वाग्रहों को समाप्त करने और त्वरित, नागरिक-केंद्रित न्याय सुनिश्चित करने पर केंद्रित हैं। सिन्हा बीएनएस (बीएनएसएस और बीएसए के साथ) को एक परिवर्तनकारी छलांग के रूप में देखते हैं जो ब्रिटिशों द्वारा उपनिवेशवादियों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई प्रणाली से बदल देती है। एक वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ के रूप में, सिन्हा अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि संहिता के अद्यतन संरचनात्मक ढांचे ने पुरातन जटिलताओं को कम कर दिया है, जिससे समय पर न्याय दिलाने के लिए कानूनी कार्यवाही में काफी तेजी आई है।पुराने औपनिवेशिक कानूनों पर सरकार के रुख का बचाव करते हुए, वे औपनिवेशिक दंडात्मक मानसिकता के बजाय भारतीय सामाजिक-कानूनी वास्तविकताओं पर लक्षित सुधारों की वकालत करते हैं |

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित ने इन नए कानूनों के प्रति अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया | उन्होंने कहा है कि ‘ यद्यपि औपनिवेशिक विरासत और मानसिकता से पूरी तरह मुक्त होना आसान नहीं है, फिर भी भारतीय न्याय संहिता ) कानून को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सफल रही है। उन्होंने विशेष रूप से सामुदायिक सेवा को दंड के एक वैकल्पिक स्वरूप के रूप में शामिल किए जाने की सराहना की। साथ ही उनका मानना है कि देशद्रोह से जुड़े प्रश्न का पुनर्गठन इस प्रकार किया गया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के पहले दिए गए निर्णय द्वारा निर्धारित संवैधानिक सिद्धांतों और कानूनी ढाँचे के अनुरूप हो सके।’ फिर भी अधिकांश क़ानूनी विशेषज्ञ और देश के व्यापक हितों , सुरक्षा तंत्र से जुड़े पूर्व अधिकारीयों का मानना हैं कि न्याय संहिता के लिए अभी पुलिस व्यवस्था में सुधार , न्याय पालिका के लिए आधुनिक सुविधाएं , अधिक जजों की नियुक्तियों और राष्ट्र विरोधी आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए क़ानूनी संशोधनों की आवश्यकता हैं |