
कर्नल सोफिया कुरैशी टिप्पणी मामला: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से मंत्री विजय शाह पर बढ़ा कानूनी दबाव
New Delhi-Bhopal: ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी प्रेस ब्रीफिंग करने वाली भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण में सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से दो सप्ताह के भीतर अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय लेने को कहा है।
• सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि मामले की जांच कर चुकी विशेष जांच दल ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, लेकिन निचली अदालत में लंबित प्रकरण के बावजूद अब तक राज्य सरकार की ओर से अभियोजन की अनुमति नहीं दी गई। इस देरी पर शीर्ष अदालत ने असंतोष जताते हुए कहा कि गंभीर प्रकृति के मामलों में अनावश्यक विलंब स्वीकार्य नहीं है।
• माफी की दलील पर अदालत सख्त
मंत्री विजय शाह की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल पहले ही सार्वजनिक रूप से माफी मांग चुके हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अब माफी पर विचार करने का समय निकल चुका है। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल माफी के आधार पर संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारियों से बचा नहीं जा सकता।
• विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला उस वक्त सामने आया था जब मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। कर्नल सोफिया कुरैशी उस समय ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी आधिकारिक प्रेस ब्रीफिंग के चलते राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में थीं। टिप्पणी के बाद देशभर में विरोध हुआ और इसे सेना की गरिमा के खिलाफ बताया गया।
• एफआईआर और एसआईटी जांच
मामले के तूल पकड़ने के बाद उच्च न्यायालय के निर्देश पर प्राथमिकी दर्ज की गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर विशेष जांच दल का गठन किया गया। एसआईटी ने जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन अभियोजन स्वीकृति के अभाव में कानूनी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
• राज्य सरकार के सामने निर्णायक घड़ी
सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद मध्य प्रदेश सरकार के सामने अब दो सप्ताह के भीतर निर्णय लेने की स्थिति है। यदि अभियोजन की अनुमति दी जाती है तो मंत्री विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलने का रास्ता साफ होगा। अनुमति नहीं देने की स्थिति में सरकार को अदालत के समक्ष ठोस और कानूनी कारण प्रस्तुत करने होंगे।
यह मामला केवल एक टिप्पणी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे सेना के सम्मान, जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी और सार्वजनिक आचरण की मर्यादा से जोड़कर देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से साफ संकेत है कि इस तरह के मामलों में अब किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।





