नेतृत्व गरीब किसान का या राजनीतिक दलों का

नेतृत्व गरीब किसान का या राजनीतिक दलों का

मीडियावाला.इन।

चौधरी चरण सिंह  या चौधरी देवीलाल के किसान नेता होने पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगा पाया | हम, जैसे पत्रकार तो उनके उप प्रधान मंत्री रहते हुए सरकारी बंगले में गाय भैंस रखे जाने की खबर बना देते थे | जार्ज फर्नांडीज या मधु लिमये या दत्तोपंत ठेंगड़ी  किसी भी राज्य में मजदूरों के लिए उनके साथ आंदोलन करने , जेल जाने , लाठियां खाने में आगे रहते थे |  नम्बूदरीपाद ,ज्योति बसु या भूपेश गुप्त और हरकिशनसिंह सुरजीत सही अर्थों में कम्युनिस्ट विचारों और कार्यकर्ताओं के बल पर प्रभावशाली रहते थे | ऐसे सभी नेताओं को किराये पर भीड़ जुटाने की जरुरत नहीं होती थी | इस पृष्ठभूमि में सवाल उठता है कि गरीब किसान और मजदूरों का नेतृत्व क्या कोई एक या दो नेता इस समय बताया जा सकता है | देश भर में पार्टियों , जातियों , देशी विदेशी चंदे से चलने वाले संगठनों के अनेकानेक नेता हैं | तभी तो भारत सरकार दो महीने से किसानों के दावेदार नेताओं  कई बैठक कर चुकी , आंदोलन के शक्ति प्रदर्शन में हजारों ट्रैक्टरों को दिल्ली कूच के लिए घुसा दिया , लेकिन चालीस में से चार नेता भी भीड़ के आगे चलते , उन्हें लाल किले पर हिंसा करने , तिरंगे का अपमान करने से रोकते नहीं दिखाई दिए |
असल में उदार अर्थ व्यवस्था और प्रगति के साथ नेतृत्व के लिए धन बल का उपयोग अधिक होने लगा | आदर्शों और सिद्धांतों की अपेक्षा किसी भी क्षेत्र में चतुराई , जोड़ तोड़ , सत्ता के समीकरणों का महत्व बढ़ता गया है | किसान ही नहीं मजदूरों के बीच राष्ट्र व्यापी प्रभाव वाला नेता नहीं मिलते | आधी लड़ाई तो प्रचार के बल पर लड़ी जाती है | समझौते कम , सौदे अधिक होते हैं | भारत से अधिक संपन्न फ्रांस , ब्रिटैन , जर्मनी जैसे देशों में आज भी श्रमिक संगठन कई दिनों की रेल हड़ताल तक करवा देते हैं | अपने डिश में अच्छा वेतन , भत्ते और कम ब्याज पर ऋण लेने वाले बैंक अधिकारी हर साल एक खास महीने में हड़ताल की धमकी देते हैं या दो चार दिन काम बंद कर कुछ सौदा कर लेते हैं | रतज्यों के शिक्षक , डॉक्टर या अन्य हड़तालें करते हैं , लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी आवाज नहीं बन पाती | यह प्रवृत्ति खतरनाक है | 
इन दिनों प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और निर्णयों का समर्थन करने पर उनके विरोधियों या आलोचकों को गुस्सा आता है | एकछत्र राज किये जाने पर आपत्ति होती है | लेकिन हाल के वर्षों में  सर्वेक्षणों  और चुनावों में नरेन्द्र , मोदी को जितनी अधिक लोकप्रियता सिद्ध हुई है , उसका कारण वर्षों से अपने कार्यकर्ताओं और जनता से जुड़ा होना रहा है | जब वह प्रधान मंत्री नहीं थे , तब भी लोग उनको सुनने , मिलने को उत्सुक रहते थे | आज भी पार्टी का आयोजन नहीं होने पर भी लोग गाँवों - कस्बों में  उनकी बात सुनने के इच्छुक रहते हैं | उनकी भारतीय जनता पार्टी में भी उनके जैसा करिश्माई क्या कोई नेता है ? उनके किसी निर्णय पर हमको आपको असहमति हो सकती है | लेकिन कई निर्णयों से जो करोड़ों गरीब , किसान , मजदुर , अधिकारी , व्यापारी , उद्योगपति , विदेशी नेता या कंपनियां लाभान्वित होकर प्रसन्न भी तो हो रही हैं | इन दिनों विरोधी नेता लगातार यह आरोप[ लगा रहे हैं कि मोदी सरकार ने सारे निर्णय तीन या पांच उद्योगपतियों को लाभ दिलाने के लिए हुए | यानी सब कुछ पूंजीपतियों को दिया जा रहा है |गनीमत है कि केवल एक या दो नहीं कहे | सत्तर अस्सी के दशक के आन्दोलनों और छपा रिकार्ड देख लीजिये , टाटा - बिड़ला और कहीं डालमियां के अलावा कोई नाम नहीं दिखता था | उनके विरुद्ध ही मजदूरों के नारे सुनाई देते थे |  हिंदुजा ,अम्बानी , अडानी , महेन्द्रा , मित्तल , गोदरेज , जिंदल आदि तो कांग्रेस और उसके साथी दलों ( एक समय कम्युनिस्ट भी ) के सत्ता काल में बढ़ते चले गए | अब तो आपको हर राज्य में अरबपति मिल सकते हैं |
 बहरहाल असली मुद्दा नेतृत्व का है | मनमोहन सिंह तो पांच साल वित्त मंत्री और दस साल प्रधान मंत्री रहे , क्या वे किसी राज्य में सामन्य जनता को आकर्षित प्रभावित कर सकते हैं ? पिछले हफ़्तों में किसानों पर उनका कोई वक्तव्य आपको दिखा ? राहुल गाँधी कितने चुनाव जितवा सके और पार्टी के नेतृत्व को पाने ठुकराने का खेल जारी रखे हैं | कांग्रेस कुछ प्रादेशिक नेताओं और सत्ता या विपक्ष का अकेला विकल्प रहने से जीवित है | कम्युनिस्टों को बंगाल में अस्तित्व के लिए कांग्रेस की जरुरत हो गई | करात और येचुरी स्वयं चुनाव नहीं जीत सकते | शरद  पवार को सत्ता के सुख के लिए शिव सेना की पालकी उठाना पड़ रही है , उसमें भी कांग्रेस की बैसाखी चाहिए | मायावती किसी तरह एक वर्ग क्षेत्र तक सीमित हैं | अखिलेश और तेजस्वी यादव उत्तर प्रदेश और बिहार में पुरानी नई राजनीतिक पूंजी संबंधों पर भविष्य देख रहे , लेकिन अभी दिल्ली दूर है |दक्षिण , पूर्वोत्तर  में प्रादेशिक पार्टियां और नेता हैं , जो एक एक बार सत्ता सुख पाते रहते हैं | कड़वा सच तो यह भी है कि भाजपा को भी भविष्य के लिए प्रादेशिक नेताओं और संगठन को मजबूत करते रहना होगा | चमत्कार के भरोसे न जनता को जीता जा सकता है और न ही सत्ता पाई जा सकती है | नेतृत्व का अभाव होने पर भीड़ तंत्र का प्रभाव दिखने लगता है | जयप्रकाशजी ने दलविहीन व्यवस्था की कल्पना भी की थी , तब भी कोई नेता सर्वमान्य होकर देश चला सकता है | अभी तो हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा तय लोकतंत्र और उसके नेतृत्व से  सफलताओं , सुख शांति की कोशिश सम्पूर्ण समाज को करनी होगी |

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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