लक्ष्मीजी के लिए गणेश और श्रीकृष्ण का ज्ञान भी जरुरी

लक्ष्मीजी के लिए गणेश और श्रीकृष्ण का ज्ञान भी जरुरी

मीडियावाला.इन।

दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के साथ बुद्धि के देवता श्री गणेश की पूजा आवश्यक होती है| श्री राम के साथ श्रीकृष्ण के गीता ज्ञान से कर्म की अनिवार्यता से समाज सुखी संपन्न होता है| इसे संयोग कहा जाए अथवा सुनियोजित मुद्दा कि बिहार चुनाव,कोरोना काल, विश्व की अर्थ व्यवस्था-राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में कर्म यानी रोजगार प्राथमिकता का विषय हो गया है| बिहार ही नहीं उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश राजस्थान सहित भारत सरकार-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाखों लोगों को रोजगार के लिए विशेष बजट, संभावनाओं की घोषणाएँ कर दी हैं|

इसमें कोई शक नहीं कि 130 करोड़ की आबादी वाले लोकतान्त्रिक देश में रोजगार रोटी से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है| गरीबी, बेरोजगारी आजादी के बाद से रोजगार उपलब्ध करना हर सरकार की चुनौती रही है| 1974 के जय प्रकाश आंदोलन में भी युवाओं के लिए असली समस्या थी| बिहार में तेजस्वी यादव ने दस लाख सरकारी नौकरी का वायदा किया, तो भाजपा ने उन्नीस लाख नौकरियों यानी सरकारी-गैर सरकारी क्षेत्र में नौकरियों का आश्वासन दे दिया| इस सप्ताह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने अगले छह महीने में पचास लाख नौकरियों के इंतजाम की घोषणा कर दी| अब हर राज्य जोर शोर से उम्मीद जगा रहे हैं| आशा अपेक्षा विश्वास के साथ व्यावहारिक बातों की ओर भी सामान्य जनता का ध्यान दिलाना चाहिए|

सबसे पहले बेरोजगारों की सही पहचान, अनुमानित प्रामाणिक संख्या और रोजगार के अवसर के लिए सरकार के साथ निजी, बहुराष्ट्रीय, लघु मध्यम श्रेणी के उद्यमों, असंगठित और अपने कौशल से कमाई कर सकने वालों को ध्यान में रखकर विस्तृत अध्ययन के साथ दस्तावेज देश दुनिया के सामने रखा जाना चाहिए| मेकाले की शिक्षा का उद्द्येश्य ही सरकारी बाबु और अफसर तैयार करना था|

ब्रिटिश राज में पुलिस और सेना की भर्ती भी अंग्रेजों के गुलाम की तरह होती थी| आज़ादी के 73 साल बाद भी सरकारी नौकरी को ही कुछ राज्यों में सर्वाधिक उपयोगी क्यों समझा जाए? हाल के वर्षों में इसे राजनीतिक प्रतिबद्धता से जोड़ा जा रहा है| यही नहीं कुछ पार्टियों के नेता सरकारी नौकरियों में पक्षपात और भ्र्ष्टाचार करने के दोषी करार किए जाने पर जेल भुगत रहे हैं|

बहरहाल नए सन्दर्भ में बेरोजगार की सही पहचान की बात पर ध्यान दें| इस वर्ष के प्रारम्भ में मैंने देश के एक वरिष्ठ नेता से अनौपचारिक चर्चा में जानना चाहा कि क्या उन्होंने यानी उनकी या पहले सरकार ने कभी दैनंदिन फुटकर काम करने वाले इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बर, लकड़ी के फर्नीचर बनाने वाले कारीगर जैसे अनेक तरह के काम धंधे से जुड़े लोगों का कोई विवरण आंकड़ा तैयार करवाया है? उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा कोई अधिकृत रिकार्ड नहीं है| मैंने उन्हें बताया कि दिल्ली,मुंबई ही नहीं देश के अधिकांश शहरी क्षेत्रों में ऐसे हजारों लाखों लोग हैं| यदि वे महानगरों में एक दिन पांच घरों में छोटी मोटी लेकिन आवश्यक सेवा देकर औसतन दो हजार यानी महीने में पचास-साठ हजार रूपये कमा लेते हैं, तो छोटे शहरों में बीस हजार तक कमा लेते हैं| लेकिन जब सरकार या कोई एजेंसी का प्रतिनिधि कोई फॉर्म लेकर सर्वेक्षण में  'नौकरी/ व्यवसाय/ रोजगार' कॉलम में हां या ना में जानकारी भरता है, तो सामान्य जवाब यही होता है कि हाँ 'बेरोजगार' हूँ| नौकरी मिलेगी तो करूँगा| वैसे काम तो चल रहा है| यही नहीं कई लोग नौकरी के बजाय अपनी कारीगरी के काम काज से ही प्रसन्न हैं| पिछले हफ्ते हमारे घर थोड़ा बिजली का काम करने आए इलेक्ट्रीशियन संतोष से यही बात जानने की कोशिश की| बात करने पर पता चला वह मूलतः समस्तीपुर बिहार के गांव का है| जब भी वह हमारे या किसी घर में एकाध घंटे के लिए पहुँचता है, काम के आधार पर तीन सौ से पांच सौ रूपये लेता है| उसने बताया कि उसका एक भाई गांव में यही काम कर रहा है| उन्हें किसी कंपनी या सरकार में आठ दस घंटे की नौकरी पसंद भी नहीं है| अपना काम अपनी मर्जी सुविधा से करने का सुख ही अलग है|

संतोष अकेला ही नहीं है, कृपया नेता, अफसर, स्वयंसेवी संगठन इन लोगों की बातें सही ढंग से प्रचारित प्रसारित क्यों नहीं करते हैं? कौशल विकास की योजना भी दिवंगत प्रणव मुखर्जी के वित्त मंत्री रहते शुरू हुई थी| उनके बाद चिदंबरम के वित्त मंत्री बनने पर कुछ वर्षों में संसाधन में गंभीर वित्तीय अनियमितता, भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए| लेकिन गुजरात, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की सफलता को देखाटगे हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने पर अलग से कौशल विकास मंत्रालय ही बना दिया और पिछले वर्षों में इसकी योजनाओं से कुछ राज्यों के कौशल विकास केंद्र बहुत अच्छे ढंग से सफल हो रहे हैं| दिल्ली से लगे औद्योगिक नगर फरीदाबाद, गुरुग्राम या सुदूर जगदलपुर में पिछले वर्ष ऐसे कौशल विकास केंद्र तथा औद्योगिक बस्ती के उद्यमियों से मिलने-देखने पर पता चला कि वहां इन केंद्रों से निकलने वाले युवक युवतियों को तत्काल काम मिल रहा और उद्यमी तो अधिक लोगों को तीस चालीस हजार रुपए मासिक वेतन पर रखने को तैयार रहते हैं| मैंने दशकों पहले जर्मनी में भी इसी किस्म के शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र देखे हैं| आज भी चल रहे हैं| यूरोप और अमेरिका में ऐसे कारीगर स्वतंत्र काम करके सफल प्रसन्न और सम्मान से रहते हैं| इस दृष्टि से पहले समाज को ऐसे कारीगरों, कलाकारों, ड्राइवर, ट्यूशन पढ़ाने जैसे कामकाज करने वालों को किसी सरकारी अधिकारी की तरह सम्मान देने के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना होगा|

सरकार या निजी कंपनियों में काम केवल रोजगार देने के नाम पर नहीं सेवाओं की आवश्यकता के अनुसार ही दिया जा सकता है| कम्प्यूटर और आधुनिक युग में तो सरकारी सेवाओं में कम लोगों की जरुरत रहेगी| हाँ कृषि से जुड़े नए उद्यमों, रक्षा सामग्री के उत्पादन, टेलीकॉम, स्वास्थ्य, पर्यटन जैसे क्षेत्रों में रोजगार की अपार संभावनाएं बन सकती हैं| फिर संघीय ढांचे में शिक्षा ,प्रशिक्षण ,उद्योग के लिए जमीन ,सड़क ,बिजली राज्य सरकारें ही तो दे सकती हैं| इसलिए रोजगार एक पार्टी का मुद्दा क्यों होना चाहिए| भारत के सुनहरे भविष्य के लिए अच्छे सकारात्मक प्रयासों में प्रतियोगिता संभव है , द्वन्द क्यों होना चाहिए?

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आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।