लेखा जोखा- दो ,सात या इक्कीस वर्षों का

लेखा जोखा- दो ,सात या इक्कीस वर्षों का

मीडियावाला.इन।

एक बार फिर लेखा - जोखा | सहमत  और असहमत रहने वाले कुछ मित्रों ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल की संक्षिप्त समीक्षा मांगी | मेरा हमेशा एक उत्तर अवश्य होता है कि आप मुझे कमियों के साथ स्वीकारने को तैयार हैं या नहीं ? साथ ही आप मेरे किसी प्रकाशन , पुस्तक या टी वी प्रस्तुति से  पूरा निष्कर्ष निकाल सकते हैं ? शायद नहीं | मेरी सबसे बड़ी कमजोरी गणित और हिसाब की है | इसलिए अभी से मुझ पर कृपा करें या नाराज होकर राय पढ़ - सुन लें | मोदीजी या उनकी सरकार अथवा उनसे पहले की कोई सरकारें क्या यह दवा कर सकती हैं कि उन्हें हर कदम , कार्यक्रम , घोषणा और क्रियान्वयन में केवल सफलता मिली है ? चर्चिल , नेहरू , इंदिरा , वाजपेयी जैसे नेताओं ने भी अपनी बड़ी गलतियों - विफलताओं को स्वीकारा है | इसलिए मोदी सरकार के दो वर्षों के कार्यकाल की कमियों अथवा कुछ विफलताओं की चर्चा कर भविष्य में सुधार पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए | वहीँ कश्मीर से लेकर सुदूर पूर्वोत्तर और सीमाओं  अथवा विश्व मंचों पर अंतर राष्ट्रीय सफलताओं को भी तो देखा जाना चाहिए |

 मेरे परिवार के युवा सदस्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों में डेढ़ दशक से  प्रबंधन और मार्केटिंग में महत्वपूर्ण  पदों पर देश दुनिया में काम कर रहे हैं | वे ही नहीं कुछ विदेशी राजनयिक मित्र मुझे समझते हैं कि किसी व्यक्ति , कंपनी , सरकार , प्रधान मंत्री का आडिट - आकलन केवल एक बैलेंस शीट देखकर नहीं होता | यदि दो तीन वर्ष का घाटा दिख भी रहा हो , तो उसकी जमा पूंजी , फिक्स डिपाजिट , चल अचल संपत्ति भी देखना जरुरी होता है | इसलिए यह मानना होगा  कि मोदी सरकार के दो वर्षों के कार्यकाल की समीक्षा करने वाले उनके सात वर्षों के कार्य और सही मायने में निरंतर इक्कीस वर्षों तक सत्ता में रहने के लाभ , खतरों , सफलताओं और विवादों - प्रशासनिक राजनीतिक विरासत को भी ध्यान में रखेंगे |

 इन दिनों मोदी सरकार के कामकाज को लेकर असंतोष - नाराजगी के स्वर अधिक सुनाई दे रहे हैं | इसलिए पहले घाटे का पन्ना देख लिया जाए | कोरोना महामारी से निपटने में लाक आउट पहले या बाद में तय होना ,  दूसरे दौर में अस्पताल और ऑक्सीजन के संकट , वेक्सीन के इंतजाम में देरी को लेकर देश दुनिया में अच्छा बुरा प्रचार अब भी जारी है | निश्चित रूप से कुप्रचार का नुक्सान प्रधान मंत्री की लोकप्रियता  पर हो रहा होगा |महामारी से करीब  तीन लाख से अधिक लोगों की मृत्यु का आंकड़ा भयावह है | लगभग तीन करोड़ प्रभावित हो गए , लेकिन बाईस करोड़ जीवित बच भी गए | हिसाब के दूसरे खाने में यदि करीब चौबीस करोड़ वाले सम्पन्नतम अमेरिका में अब तक हुई मौतों का आंकड़ा सादे चार लाख से अधिक का है | पहले दौर में तो वहां बहुत बुरी हालत थी |"  महा ज्ञानी ' अमेरिका में तो अब तक लाखों लोग वेक्सीन लगाने को भी तैयार नहीं हैं | इसलिए क्या सरकार और  हम लोगों को ठंडे  दिमाग से गलतियों में सुधार और आगे जागरूकता अभियान पर जोर नहीं देना चाहिए ?

  लेखा जोखा करते समय मेरी राय में भावी चुनौतियों , योजनाओं और कार्यक्रमों पर विशेष बल दिया जाना चाहिये | इस दृष्टि से स्वास्थय और शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता तथा सर्वाधिक बजट पर संसद , विधान सभा से पंचायत स्टार तक सर्वानुमति क्यों नहीं बन सकती है ? स्वस्थ्य शिक्षित भारत होने पर ही तो किसी बड़ी महामारी और महा युद्ध से बचा जा सकता है | कोरोना महामारी ने  देश के अस्पतालों की दुर्दशा को जग उजागर कर दिया | भारतीय डॉक्टरों ने इस कठिन दौर में सारी असुविधाओं और कष्टों के बावजूद करोड़ों लोगों की जान बचाई , एक हजार से अधिक डॉक्टरों ने तो चिकित्सा सव्वा करते जान दे दी | लेकिन क्या  हमारे मित्र समीक्षक इस बही कहते में यह नहीं देखेंगे कि बहत्तर वर्षों में एक से एक प्रतिष्ठित नेता स्वास्थ्य मंत्री रहे , लेकिन चिकित्सा व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं कर सके |  जिलों की बात दूर है , दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान  ( एम्स )के कई काबिल डॉक्टरों नेपिछले बीस वर्षों के दौरान  समय से पहले त्याग पत्र क्यों दिए , इसकी खोजबीन बहुत काम नेता या पत्रकार मित्रों ने की | बानगी के लिए एक नामी डॉक्टर के दर्द का उल्लेख जरुरी है | करीब  दस वर्ष से पहले कांग्रेस के राज में इसी एम्स में निदेशक के पद की नई पदोन्नति के अवसर पर  इनको किसी सरकार के किसी ख़ास आदमी / एजेंट ने तीस करोड़ का इंतजाम करने पर नियुक्ति पक्की होने का प्रस्ताव दिया | डॉक्टर बहुत  ईमानदार प्रतिष्ठित परिवार के थे | भले आदमी खुद इस्तीफा देकर चले गए | इसका यह निष्कर्ष भी नहीं हो सकता कि ऐसे एजेंटों अथवा रिश्वत से एम्स अथवा अन्य संस्तःनों में नियुक्तियां होती हैं | लेकिन एम्स सहित

 सरकारी अस्पतालों , मेडिकल कालेजों , मेडिकल कौंसिल , प्रदेशों के स्वास्थय विभागों में गड़बड़ियों पर अधिकारी मंत्री तक जेल गए हैं |इसलिए केवल आज के दर्द घाव का दुःख करने से अधिक जरुरी है भविष्य में व्यापक सुधार  और इंतजाम का |

 सफलताओं के लिए आर्थिक प्रगति अनिवार्य है | इक्कीस वर्षों में मोदी की कार्य शैली से ही नाराज रहने वालों  की राय को शायद वे या उनके साथी नहीं बदल सकते | लेकिन उनकी नीतियों से लाभान्वित पूंजीपतियों से लेकर विभिन्न प्रदेशों के करोड़ों ग्रामीणों का समर्थन मिलता रहा है |यह जमा पूंजी कई इलाकों में काम आ रही है | उन कार्यक्रमों की सफलताओं का जिक्र उनकी पार्टी करती ही है | हाँ , नई  शिक्षा नीति की घोषणा कको लागू करने के लिए  कोरोना संकट से देरी हुई लेकिन इस क्रांतिकारी काम को तेजी से बढ़ाना होगा .| यहाँ एक बार फिर मेरी मान्यता का उल्लेख करना चाहता हूँ कि देर सबेर स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए संविधान में संशोधन कर राष्ट्रीय स्तर पर समरूपता के लिए प्रयास होने चाहिये | दुनिया के किसी मुल्क में इस तरह राज्यों की मनमानी और भावी पीढ़ी के लिए समस्याएं नहीं हैं | यह स्वीकारना होगा कि महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक राजनीतिक सहमतियां बनाने के लिए स्वयं प्रधान मंत्री और उनके सहयोगियों को गंभीरता से प्रयास करने होंगे |  तात्कालिक मीडिया कुप्रचार से भले ही चिंता होती है , लेकिन इस समय दुनिया में भारत के प्रति सम्मान और आकर्षण बहुत है | चीन के लगभग अकेले  पड़   जाने का लाभ भारत को  बड़े पैमाने पर पूंजी नियोजन तथा आर्थिक प्रगति  के लिए हो सकेगा | कमियों , कठिनाइयों , युद्धों के बाद भी भारत आगे बढ़ता रहा है और बढ़ता रहेगा |

 (  लेखक विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के पूर्व संपादक हैं )

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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