Thursday, December 05, 2019
रेप ही तो हुआ है

रेप ही तो हुआ है

मीडियावाला.इन।

अरे ऐसा क्या हुआ है, जो पहले नहीं हुआ था। किसलिए ये घड़ियाली आंसू रहे हैं। कौन सी ऐसी नई बात हुई है, जिसके लिए इतना शब्दपा कर रहे हैं। रेप ही तो हुआ है। एनसीआरबी की रिपोर्ट खंगाल करेगी तो पता चल जाएगा कि देश में कितने सेकंड में कितनी महिलाओं के साथ होता है। दुनिया में कितने होते हैं और पिछले सालों का तुलनात्मक आंकड़ा भी मिल ही जाएगा। ये सब पढ़ेंगे तो समझ आ जाएगा कि डार्विन तो क्या संसार का कोई सिद्धांत रेप पर लागू नहीं होता है। बस रेप होते हैं और वे हो रहे हैं। उन्हीं में से एक तेलंगाना में हुआ है। और बारीक शांति करेंगे तो यह भी सामने आ जाएगा कि पशु चिकित्सक के साथ पूरे दिन-रात में और कितनी महिलाओं के साथ यह सब हुआ है। 

 

हजारों साल पीछे जाएंगे तो पता चलेगा कि रेप तब भी होते थे। उस समय वेश बदलने की सुविधा थी तो पति का वेश बदलकर लोग स्त्रियों की मर्यादा हर लेते थे। बस आप बिटविन द लाइन मत पकड़ेंगा कि मर्यादा तब भी स्त्री की ही जाती थी। हजार-लाख साल बाद भी इस बात में कोई बदलाव नहीं आया है। इस मामले में स्त्रियों को प्राप्तियाँ में पुरुषों ने कतई हस्तक्षेप नहीं दिया है। यह बात के लिए चाहते हैं तो पुरुषों का सम्मान किया जा सकता है। और फिर इस काम में भगवान के राजा इंद्र तक शामिल थे। जिसे करने में देवराज भी शर्मिंदा नहीं हुए, उस पर आप क्यों नाराज हो रहे हैं। 

 

यह भी सुनने को मिल सकता है कि वह अभिजात्य वर्ग की स्त्री थी, बड़े शहर में रहती थी। इसलिए मामला उछाला जा रहा है। वरना तो बहुत गुमनाम स्त्रियाँ रिपोर्ट लिखाने तक नहीं आती हैं। जलाए जाने के बाद अपनी राख तक हवाओं में मिला देती हैं। अपने होने का सुराग राशन कार्ड तक में छोड़ती नहीं। स्ट्रियों ने अगर रेप को स्वीकार कर लिया है तो आप क्यों ख्वामख्वाह परेशान हो रहे हैं। मन कचोटता है, छाती में शूल चूभते हैं, रात की नींद उड़ी हुई हुई है, बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं तो ये आपकी व्यक्तिगत समस्या है। इसके लिए आपको किसी चिकित्सक को दिखाना चाहिए। देश-समाज की फिक्र करते हैं तो यह अर्बन नर्सस्लाइटिज्म जिसे भव्याह रोग के लक्षण कहते हैं। समय रहते इसका उपचार कराएँ। 

 

फिर भी अगर मन नहीं मानेगा तो आप भी क्या करेंगे, मोमबत्तियाँ जलाएंगे। धरना-प्रदर्शन करेंगे। वीथटिसिस के नारे बुलंद करेंगे। थोड़े दिन चौराहों पर बहस करेंगे। कहेगा कि साला ये देश इंसानों के रहने लायक तो रहा ही नहीं है। आई हैट ऑल दिस नॉन एंड। कोई बड़ा आदमी यह कह देगा तो उसके सिर की बोली लगा देंगे। उसे पाकिस्तान का टिकट भेज देंगे। कहेंगे कि यहाँ तो फिर भी स्त्रियाँ सुरक्षित हैं, जरा जाकर देखिए फलाँ देश में वहाँ क्या हाल है। फिर हरम क्यों भूल जाते हैं, वहाँ क्या होता था, जो छिपा हुआ है। आज भी वे स्त्रियों को जिस तरह रखते हैं, उसके पास कौन अनजान है। शुक्र मनाइये कि आप उनका हिस्सा नहीं हैं। 

 

सवाल पूछने का मन करेगा तो किससे पूछेगा। सरकार कह रही है कि निर्भया के बाद कानून पूरी तरह बदल चुके हैं। कमेटियां गठित कर दी गई हैं। संसद से लेकर गली-मोहल्लों तक में जिम्मेदारी तय कर दी गई है। हर जगह लोग कुंडलियों मारकर बैठा दिए गए हैं। उन्होंने अपने गाड़ियों पर बड़े-बड़े बोर्ड लगा दिए हैं। वे टोल टैक्स पर दनादनाते हुए गाड़ियां निकाल ले जा रहे हैं। स्त्रियों की सुरक्षा के लिए इतना कुछ किया गया है। यहाँ तक कि समय-समय पर अलग-अलग प्लेटफॉर्म से एडवायजरी भी जारी करते रहते हैं। स्ट्रियां क्या पहने, कब मोबाइल इस्तेमाल करें, कब घर आ जाएं, किस-कहां बात करे कहां न करें, गलियों में कैसे चलें, पक्ष में कैसे जाएं, दफ्तर में कैसे रहें। बहुत ज्यादा क्या। 

 

यह कह सकते हैं कि रेप के प्रति पुरुषों का डेडिनेशन इतना है कि इतना सब होने के बाद भी वे यह छोड़ते नहीं हैं कि क्या करते हैं। आपकी बेचैनी इस बात को लेकर हो सकती है कि इस बार आरोपियों में एक मुसलमान भी है, लेकिन एक पल के लिए सोचिएगा, उस महिला पर क्या गुजरी होगी। जिसे वह मददगार समझ रहा था, वे ही उस पर टूटे हुए थे। जब वह जिंदा जल रही होगी तब क्या इस संसार की एक-एक महिला के जिस्म से शोले नहीं निकल रहे होंगे। उसके साथ पीढ़ियों के संस्कार और ज्ञान, मर्यादा, चरित्र की सारी कहानियाँ खाक नहीं बन पाईं। पुरुषों लानत है हम पर, डूब ही मरो यार। एक पल के लिए मैथुसेज उत्पत्ति की क्षमता को परे रखने दें ना तो सच में ये दुनिया हमारे बगैर ही बेहतर हो सकती है। 

 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.