अंतर्विरोधों में फंसी खेती और हमारी लाचारी

अंतर्विरोधों में फंसी खेती और हमारी लाचारी

मीडियावाला.इन।

खेती-बाड़ी के भारतीय उत्पादक और उपभोक्ता की क़िस्मत में शायद हमेशा लुटना ही लिखा है।भारत सहित सभी एशियाई देशों को छोड़कर, शेष विश्व के बारे में जो लोग भी थोड़ा जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि उपभोक्ता और उत्पादक की 'लूटपट्टी' पूरे एशिया में ही सबसे ज्यादा.केले अमेरिका में ही 'पहले अमेरिका-बाद में सारी दुनिया'की बात चलती रही। कहीं किसी कृषि उत्पाद का निर्यात तो खुलेते हैं, जब वो की अपनी जरूरत पूरी हो जाती है।जबकि भारत के अपने 'नेट एक्सपोर्टिंग कंट्री'के' तमगे 'से इतना प्रेम करता है कि उसकी कीमत पर वह अपने ही देश की जनता के दुःख भी देख सकती है।

इसी के अनुसार, अपने यहाँ किसान की हालत लगातार ख़राब रहती है। केक्योंकि, वह उत्पादन कर, जब सब कुछ बेच देता है, और खुद की ज़रूरत के समय बाज़ार में उपभोक्ता बनकर जाता है, तो उसे अपनी ही उगाई वस्तुओं के दाम कई बार मिलते हैं। दस से बीस गुना ज्यादा देने पड़ते हैं।

शायद एक साल भी नहीं हुआ होगा, जब आपने खुद को चारों ओर देखा, किसानों की प्याज से लड़ी सैकड़ों-हजारों ट्रॉलियां बिक्री के लिए खड़ी देखी जाएंगी।

उस समय उन्हें दिए जाने वाला मूल्य भी आपको जरूर याद ही होगा ।तीन या पांच रुपये किलो के उस मूल्य से ट्रेक्टर का भाड़ा और किसान की खुद की मेहनत या मजदूरी भी नहीं निकली थी।लेकिन अब क्या हालत है? अंतरिक्ष पर विजय पा ने अपने देश में भण्डारण की निर्धनता की बात करने में भी शर्म आती है।

अपने यहाँ कहावत है कि 'उतना ही उत्पादन, उतनी ही उस वस्तु की ज्यादा बर्बादी।यही नहीं, उतनी ही ज्यादा किसानों से लूट भी तय रहती है।हम साल-दर-साल देखते हैं कि हमारे यहां समस्या' अति-उत्पादन 'है के 'आपराधिक कुप्रबंध'की ही है।

हालांकि नई प्याज जनवरी तक आना शुरू हो जायेगी.किन्तु,पिछले साल भी उसका उत्पादन कम कहाँ हुआ था.पिछले ही साल लगभग 13 लाख हेक्टेयर में प्याज लगी थी व इसका उत्पादन 230 लाख टन हुआ था.बात अकेले पिछले साल की ही नहीं है.पिछला वही साल तो प्याज की 'बम्पर-फसल'का लगातार तीसरा साल था.

अब यह आपको ही सोचना है कि प्याज के दामों ने रॉकेट की रफ़्तार से आसमान कैसे और क्यों छुए होंगे.ऊपर से यह भी जान लीजिये कि प्याज 'आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 'के अंतर्गत एक आवश्यक वस्तु है,और उस नाते सरकार नाम की सर्वशक्तिमान ताक़त इस पर निरंतर निगाह भी रखती है.

बावजूद इसके,यह सब कुछ  हो रहा है.मतलब साफ़ है कि हम देशवासियों का ही दुर्भाग्य है कि सारी 'जाप्ता-फौजदारी'के बाद भी हम डेढ़ सौ और दो सौ रुपये किलो प्याज खरीदने को अभिशप्त हैं.इसलिए इसमें सरकार को शामिल क्यों न माना जाए ?

सरकार से कौन पूछे कि प्याज के निर्यात को रोकने का निर्णय कब लिया गया ? जब आग लगकर आधा घर जला चुकी थी,तभी या उसके आसपास ही तो यह निर्णय हुआ था.

खाद्यान्न प्रबंधन में हालात अलग थोड़ी हैं.हमारा कुल खाद्यान्न उत्पादन 2834 लाख टन है.यह हमारे अपने खाने के लिए लगभग पर्याप्त है.हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश हैं,जिसके पास खेती की इतनी जमीन है.हमारे यहाँ 58 प्रतिशत लोगों की आजीविका खेती ही है.

बावजूद इसके,हमारी जनसँख्या के 20 प्रतिशत लोग भुखमरी की हद तक कुपोषित हैं.बच्चों की बात करें तो 60 प्रतिशत बच्चे रक्ताल्पता (एनीमिया) के शिकार हैं,महिलायें उन बीमारियों से ग्रस्त हैं जो अति कुपोषण से ही होती है.

खूब खाद्यान्न निर्यात करने के कारण हमारे देश पर 'नेट एक्सपोर्टिंग कंट्री'का तमगा जरूर लगा है,पर ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हम 103 वें स्थान पर हैं.अपने यहाँ 'खाद्य-सुरक्षा का संवैधानिक अधिकार'हम सबको मिला है,पर 'ऑक्सफेम' के एक अध्ययन में खाद्य-उपलब्धता के मामले में हमें 97 वें स्थान पर रखा गया है.

रक्ताल्पता,कुपोषण या भुखमरी अपनी जगह हैं.लेकिन सच तो यह भी है कि पिछले कुछ वर्षों में हमारे यहाँ प्रति व्यक्ति आमदनी में 1400 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.बढ़ी हुई आमदनी और भुखमरी का सम्बन्ध किसी को भी समझ नहीं आता.यहाँ सीधा आरोप अन्न के कुप्रबंध पर ही जाता है.

अपनी उलटबासियों या अंतर्विरोधों की यह एक बहुत बड़ी श्रृंखला है.इसमें कोई एक व्यक्ति,एक समूह,एक सरकार या इतिहास जिम्मेदार नहीं है.हम सब बराबरी के जिम्मेदार हैं.

ऊपर लिखी हर बात ऊपर से नीचे तक सबको मालूम है.इनके अधिकृत आंकड़े और इन पर हुए अध्ययनों के परिणाम,निर्णय की प्रक्रिया में शामिल हर व्यक्ति के पास हैं,लेकिन वक़्त आने पर ये सब बातें पता नहीं क्यों 'दरी के नीचे सरका' दी जाती हैं.सिर्फ इसलिए कि इनकी दवा कड़वी है.दवा के कड़वे होने के कारण ही इन समस्याओं का कोई इलाज़ भी नहीं होता.

ईश्वर ने मनुष्य के खाने के लिए हजारों नहीं लाखों वस्तुएं बनाई हैं.प्रत्येक वस्तु का अपना उपयोग,गुण और अपना लाभ है.लेकिन,सारा जग घूम आइये,आजकल मात्र 12 फसलों से सारी दुनिया का खाना आ रहा है.सारी दुनिया की खाने की थाली,मात्र 12 चीजों से बने पदार्थों से ही सजती है.

इसी कारण बाकी चीजें समाप्त भी होती जा रही हैं.मतलब प्रकृति ने हजारों हजार साल से बनाई 'जैव-विविधता'या 'खाद्य-विविधता' हमने खुद अपने से ही समाप्त कर ली है.आपको मालूम है कि दुनिया भर की आधी जमीन पर सिर्फ गेहूं,चांवल,मक्का और सोयाबीन ही पैदा हो रहे हैं.

इन खाद्यान्नों से मानव जाति को 'कैलोरी'तो मिल जाती है,पर जीवन के लिए आवश्यक पोषण नहीं मिलता.तभी तो कुपोषण की समस्या विश्वव्यापी है.

साठ के दशक में आई 'हरित क्रांति'ने अधिक उत्पादन देने वाली 'हाईब्रिड'जातियों को हमारे खेतों में घुसाया था.इन्होंने सिर्फ भारत में ही अकेली धान की सात हजार प्रजातियों की बलि ले ली.

यही हाल सब फसलों में हुआ.प्रकृति ने सदियों या बरसों-बरस में भारत की भूमि और जलवायु में जीवित रहकर फलने-फूलने वाली फसलों की जातियां विकसित की थीं जो एक झटके में गुम गईं.यही नहीं कुछ फसलें तो सदा के लिए,पूरी तरह गायब ही हो गईं.

हाईब्रिड-जातियों के ही कारण रासायनिक खाद,दवाइयों और अन्य कई रसायनों का प्रवेश हमारे जीवन में हुआ,जो अब स्थाई रूप से हमारे बीच रच-बस गए हैं.

इन सबसे खेती महँगी तो हुई ही है,पर उस अनुपात में उपज के दाम बिलकुल नहीं बढे.यानी एक अच्छा खासा कुचक्र बन गया है.

निर्णय की जगह पर बैठे लोगों की 'इच्छाशक्ति रहित अज्ञानता'और किसान की लाभ की हवस ने इस कुचक्र से निपटने में स्थितियों को लगभग विकल्पहीन बना दिया है.

विकल्पहीनता का आलम यह है कि जगह की कमी और मानव बसाहट के लिए हो रहे अतिक्रमण के रहते पशुपालन हो नहीं सकता.बीज,खाद और रसायन व्यापार कार्पोरेट्स के हाथों में है,वे अपना माल बेचने के लिए अचूक जाल फैलाते हैं.

इसलिए लगता है कि खेती की प्रक्रिया पूरी की पूरी ही कहीं 'गिरवी'जैसी रख दी गई है.सबसे बड़ी बात तो यह है कि लाभ के नाम पर किसान रोज ठगा जा रहा है और लाभ है,जो रोज आगे सरकता ही जा रहा है.

ऐसी स्थिति में भी विकल्प हैं,ऐसे लोग भी अपने ही देश में हैं,जो विकल्पों पर काम कर रहे हैं,लेकिन जनसँख्या और उसकी 'भारी' भूख का डर दिखाकर  विकल्पों का मज़ाक़ बना दिया जाता है.

यहाँ सवाल बिल्ली के गले में घंटी बाँधने का.जो किसी न किसी को तो बांधना ही होगा।सरकार नहीं सही, हम खुद तो कर सकते हैं ।साथ के दशक में सवाल 'निम्नतमता से असुरक्षा का था, आज अधिकता में असुरक्षा'का। है।

0 comments      

Add Comment


कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...