ये भारत से क्यों भागते हैं ?

ये भारत से क्यों भागते हैं ?

मीडियावाला.इन।

अब से 50-60 साल पहले तक लंदन की सड़कों पर कुछ भारतीय जरुर दिख जाते थे। न्यूयार्क, वाशिंगटन, पेरिस, बर्लिन, रोम, तोक्यो और पेइचिंग जैसे शहरों में उन दिनों कोई भारतीय दिख जाता था तो लगता था जैसे कि लाॅटरी खुल गई है। लेकिन अब सारी दुनिया के देशों में लगभग दो करोड़ भारतीय फैल गए हैं। अपने लोगों को विदेशों में खो देनेवाला दुनिया का सबसे बड़ा अभागा कोई देश है तो वह भारत ही है। भारत के जो लोग विदेशों में जाकर बस जाते हैं, वे कौन लोग हैं ? उनमें से ज्यादातर वे हैं, जो भारत के खर्चीले स्कूलों-कालेजों में पढ़े होते हैं और बचपन से ही वे इस फिराक में रहते हैं कि उन्हें अमेरिका या ब्रिटेन के किसी काॅलेज में प्रवेश मिले और वे छू-मंतर हो जाएं। वहां उनकी पढ़ाई की फीस लाख-डेढ़ लाख रु. महीना होती है। या तो मालदारों के बच्चे प्रायः वहां जाते हैं या नेताओं और नौकरशाहों के। इनमें से कई बच्चे काफी प्रतिभाशाली भी होते हैं। वे प्रतिभाशाली छात्र भी विदेशों में रहना ज्यादा पसंद करते हैं, जो गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों से आते हैं। पश्चिमी समाज में उनसे कोई भेद-भाव नहीं करता है। इसीलिए इनके जाने को ‘प्रतिभा पलायन’ (ब्रेन ड्रेन) भी कहा जाता है। अभी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि इन खर्चीले स्कूलों के 70 प्रतिशत बच्चे विदेश भाग खड़े होते हैं। सर्वोच्च अंक पानेवाले छात्रों में से ज्यादातर विदेश पलायन कर जाते हैं। पिछले चार पांच वर्षों में उन पर होनेवाला खर्च डेढ़ बिलियन डाॅलर से कूदकर 5 बिलियन डाॅलर से भी ज्यादा हो गया है। इन छात्रों पर भारत अपना पैसा, समय और परिश्रम खर्च करता है लेकिन इनका फायदा कौन उठाता है ? अमेरिका और ब्रिटेन ! कितनी विडंबना है कि भारत बीज बोता है, सिंचाई करता है, पौध को पालता-पोसता है और जब उस पर फल आते हैं तो वे विदेशियों की झोली में झड़ जाते हैं। यदि ये प्रतिभाशाली छात्र भारत में ही रहते और पढ़कर वापस लौट आते तो यह असंभव नहीं कि कुछ ही वर्षों में भारत पश्चिमी देशों से अधिक समृद्ध और सुखी हो जाता। छात्रों के पलायन से भी ज्यादा चिंता की खबर यह है कि देश के अनेक बड़े उद्योगपति अब भारत छोड़कर विदेशों की नागरिकता के लिए दौड़े चले जा रहे हैं। मैं विदेशों में पढ़ने, काम करने और रहने का विरोधी बिल्कुल नहीं हूं। मैं स्वयं न्यूयार्क, लंदन, मास्को और काबुल के विश्वविद्यालयों में रहकर अनुसंधान करता रहा हूं। मेरी बेटी अपर्णा भी लंदन में पढ़ी है और वाशिंगटन में पढ़ाती रही है लेकिन हमने सारे प्रलोभनों को ठुकराकर भारत में ही रहने और काम करने का प्रण ले रखा था। भारत सरकार को चाहिए कि वह उन सब कारणों को खोजे, जिनके चलते हमारी प्रतिभाएं और उद्योगपति भारत से भाग रहे हैं। उनको वापस लाने और उन्हें भारत में ही टिकाए रखने के उपायों पर तुरंत कार्रवाई की जरुरत है।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

  • डॉ॰ वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944, इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है।
  • वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।
  • अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।