फिल्मों में हिंदू धर्म की विकृत व्याख्या नई बात नहीं!

फिल्मों में हिंदू धर्म की विकृत व्याख्या नई बात नहीं!

मीडियावाला.इन।

अहमदाबाद के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) के तत्कालीन प्रो धीरज शर्मा ने 2015 में एक अध्ययन किया था। इसमें उनका निष्कर्ष था कि बॉलीवुड की फिल्में हिंदू और सिख धर्म के खिलाफ लोगों के दिमाग में धीमा ज़हर भर रही हैं। भारत में प्रभावी हिंदू धर्म और बॉलीवुड पर उसकी छाप की पड़ताल खासी दिलचस्प है। इसके लिए कई ऐसी पुरानी फिल्मों को याद किया जा सकता है, जिनमें दर्शकों की आस्था को चुनौती देने के साथ ही भगवान की शरण में जाने वाले दृश्य भी थे। ऐसी फिल्मों का अंत अमूमन आस्था और अच्छे मूल्यों की पुनर्स्थापना के साथ होता।
    प्रो धीरज शर्मा की रिसर्च के मुताबिक बहरहाल इसकी व्यापक पड़ताल के लिए रिसर्च टीम ने 1960, 1970, 1980, 1990, 2000 और 2010 के दशक की पचास-पचास फिल्में चुनीं। इस रिसर्च में सामने आया कि 1960 के दशक की शीर्ष फिल्मों में से करीब 68% में भगवान से जुड़ा कोई न कोई संदर्भ अवश्य रहा। इनमें या तो भगवान से मनुहार की गई या फिर उनसे रोष व्यक्त किया गया। 1970 में 62% के साथ यह आंकड़ा लगभग स्थिर रहा। फिर 1980 के दशक में यह 60% पर पहुंचा, लेकिन 1990 के दशक में इसमें बहुत तेजी से गिरावट आई और यह 42% पर आ गया। फिर 2000 के दशक में यह और गिरकर 20% हो गया और 2010 के दशक में तो महज 12% पर आकर टिक गया। इस दौरान बॉलीवुड की फिल्मों में हिंदू धर्म की कड़ी आलोचना की गई और उसका मखौल बनाया गया।
  आईआईएम की रिसर्च के मुताबिक बॉलीवुड की फिल्मों में 58% भ्रष्ट नेताओं को ब्राह्मण दिखाया गया है। 62% फिल्मों में बेइमान कारोबारी को वैश्य सरनेम वाला पात्र दिखाया गया! फिल्मों में 74% फीसदी सिख किरदारों को मज़ाक का पात्र बनाया। जब किसी महिला को बदचलन दिखाने की बात आती है, तो 78% बार उनके नाम ईसाई होते हैं। 84% फिल्मों में मुस्लिम किरदारों को मजहब में पक्का यकीन रखने वाला और बेहद ईमानदार दिखाया गया। यहां तक कि अगर कोई मुसलमान खलनायक हो, तब भी वह मजहबी उसूलों का पक्का होता है। जबकि, हिंदू नायक को नास्तिक और अपने धर्म के प्रति अनास्था रखने वाला दर्शाकर उसे ग्लैमराइज़ किया गया। जैसे ‘दीवार’ फिल्म में ईश्वर के साथ अमिताभ बच्चन के संवाद का यादगार दृश्य, जिसमें वो 'आज तू खुश तो बहुत होगा!' जैसे संवाद बोलता है। तमाम फिल्मों में अदालती कार्यवाही के दौरान गीता पर हाथ रखकर गवाही देने वाले दृश्य हिंदू धर्म के प्रति आस्था व्यक्त नहीं करते!
   सवाल उठता क्या बॉलीवुड भारतीय समाज में धर्म के महत्व की जानबूझकर अनदेखी करता है? तब, यह समाज को कैसे प्रभावित करता है? रिसर्च टीम ने समाज पर  इसके प्रभाव की पड़ताल के लिए एक प्रयोग किया। यह प्रयोग सौ एकाएक चुने गए विषयों को लेकर 21 से 25 वर्ष आयु वर्ग को आधार बनाकर किया गया। टीम ने किसी खास बॉलीवुड फिल्म को देखने से पहले और देखने के बाद लोगों की धार्मिक सोच का जायजा लिया। टीम ने पाया कि इसमें लोगों की धार्मिक सोच के स्तर में वृद्धि या कमी देखने को मिली। इस परिप्रेक्ष्य में रणनीतिक स्तर पर हमें 1960 और 1970 के दशक में तमिल फिल्मों के प्रभाव की पड़ताल भी अवश्य करनी चाहिए, जिन्होंने भाषा, राष्ट्र और समाज के बारे में तमिलों के नज़रिये को आकार देने में अहम भूमिका निभाई। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो इस बात पर हैरानी होती है, कि क्या बॉलीवुड भारतीय समाज में धर्म के महत्व की जानबूझकर अनदेखी करता है।
  भारतीय समाज की सामर्थ्य एवं सफलता आस्था के इर्दगिर्द घूमती है। मिसाल के तौर पर क्या हमें लगता है कि हमारे पास कानून एवं व्यवस्था का अचूक तंत्र या त्वरित न्याय करने वाली प्रणाली है? अगर इसका जवाब ‘नहीं’ है। तब हमारी इतनी बड़ी आबादी व्यापक रूप से शांतिप्रिय और नैतिकता से ओत-प्रोत कैसे है? यह संभवत: उन मूल्यों के कारण ही है, जो भारतीयों में मजबूत आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े हैं। ये वो लोग हैं जो शायद कानून की किताब और आइपीसी जैसी जटिल चीजों को नहीं समझते, परंतु अपने दृढ़ मूल्यों के कारण उपद्रव या कुटिलता से बचते हैं।
   बॉलीवुड अतीत की तुलना में आस्था को अब उतना महत्व नहीं देता, बल्कि उसका उपहास ही अधिक उड़ाता है। इससे भारत में आस्था की विकृत व्याख्या का जोखिम बढ़ा है और कई स्वयंभू इसका फायदा उठाते हैं। इस तरह हम शायद उस स्थिति से परे जा चुके हैं, जिसमें धर्म का ऐसा महिमा मंडन होता है, जो हमारे मूल्यों को संरक्षित करता था। उसके उलट अब ऐसी स्थितियों से दो-चार हो रहे हैं जहां धर्म को नुकसान पहुंचाकर हमारी उन पोषित परंपराओं को कमजोर किया जा रहा है, जिनके महत्व की भारतीय समाज में व्यापक स्वीकृति रही। इस दौर में हमें धर्मांधता से बचते हुए धर्म के शाश्वत मूल्यों और उसकी भली परंपराओं का लाभ उठाना चाहिए।

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