फ़रिश्तों का नहीं किया सम्मान तो रक्तबीज बन जाएंगे हम सब..!!

फ़रिश्तों का नहीं किया सम्मान तो रक्तबीज बन जाएंगे हम सब..!!

मीडियावाला.इन।

कोरोना काल में लाक डाउन/पूर्ण बंदी/तालाबंदी के इस दौर में मुझे भोपाल के एक सुपर मार्केट में जाना पड़ा. आमतौर पर भीड़ भरे इस सुपर मार्केट से मानो ‘सुपर’ गायब हो गया था और बस वह भी एक सामान्य दुकान की तरह रह गया था..रौनक विहीन और बेतरतीब से सामान से भरा हुआ...खैर यहाँ मुद्दा बाज़ार का सूरत-ए-हाल बताना नहीं,बल्कि यहाँ हुए एक अनुभव से आगे की कथा बुनना है. सुपर बाज़ार में प्रवेश से पहले थर्मल स्केनिंग जैसी औपचारिकताओं के बाद हाथ में पहनने के लिए पतले पन्नी से बने ग्लब्स(दास्ताने) दिए गए. बाज़ार में खरीददारी में मुझे बमुश्किल 10 से 15 मिनट लगे होंगे लेकिन इसके बाद जब मैंने ग्लब्स से हाथ बाहर निकाले तो हाथ पसीने से लथपथ थे और खुजली सी भी महसूस होने लगी थी....जब महज 15 मिनट पन्नी के पतले ग्लब्स पहनने से मेरी ये हालत हो गयी तो लगभग दिनभर पीपीई-पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट/व्यक्तिगत सुरक्षा कवच पहने रहने वाले डॉक्टर/नर्स और अन्य स्टाफ की क्या दुर्गति होती होगी.

40 डिग्री से ऊपर के तापमान में बिना किसी हवादार व्यवस्था में दिनभर पीपीई किट धारण किये रहना किसी सज़ा से कम नहीं है. सिर से पैर तक प्लास्टिक में दिनभर लिपटे रहने के बाद भी पूरी सौम्यता,शांति और हरसंभव सहयोगी भाव के साथ दिनभर किस्म किस्म के मरीजों के बीच बने रहना तो करेला और नीम चढ़ा जैसा ही कुछ मामला है...और मरीज भी कैसे कैसे!! कोई पत्थर मारता है तो कोई बिरयानी-चिकन/मटन की मांग करता है,कोई थूकने को तैयार बैठा है तो कोई मनमानी भड़ास निकलने को...पीपीई किट का हाल यह है कि आप इसे पहनकर भागना तो दूर ढंग से चल भी नहीं सकते...बिल्कुल वैसे ही जैसे नौसिखिये क्रिकेटर को पैड बांधकर खेलना पड़ जाए.

पीपीई के तिलस्म और हम मरीजों की बदसलूकी को ‘हमारी कोविड आर्मी’ किसी तरह बर्दाश्त भी कर ले लेकिन परिवार से,अपनी पत्नी/बेटी/मां/पिताजी से दूरी का क्या करें...आपने भी देखे होंगे-घर के दरवाजे पर बैठकर चाय पीते डॉक्टर,एक कोने में खाना खाता पिता और दूर से निहारती मासूम सी नन्ही परी,हमारी देखभाल करते करते और हमें यमराज से बचाकर खुद ख़ुदा के पास जाते योद्धा,उनकी तस्वीर से लिपटकर बिलखते बच्चे क्योंकि अब तक अबूझ कोरोना के कारण अंतिम बार जी-भरकर गले भी नहीं लग सकते,इंटरनेट के सहारे पिता-पति-भाई या बहन का अंतिम संस्कार देखते परिजन...वे भी जी सकते थे,रह सकते हैं अपने परिवार के साथ और हमारी तरह शाम को चाय की चुस्कियों के बीच पूरी व्यवस्था को गाली दे सकते हैं,भ्रष्टाचार की गाथाएं गिना सकते हैं,लेकिन उन्होंने पथरीली पर मानवता की डगर चुनी ताकि मानव सभ्यता के लिए चुनौती बने कोरोना के ख़तरनाक पंजों से देश को बचा सकें.....और बदले में उन्हें क्या चाहिए-बस हमारी आपकी आँखों में सम्मान/प्यार के दो बोल और थोड़ी सी प्रशंसा जिससे ज्यादा के वे हक़दार हैं.

तो क्या हम,इतने अहसान फ़रामोश हैं कि हमारी और हमारे अपनों को सेहतमंद रखने के लिए अपनों से दूर रहने वाले इन फरिश्तों का सहयोग भी नहीं कर सकते?..अब तक तो कोरोना ने यह समझा ही दिया है कि धन-दौलत/प्रतिष्ठा/रिश्ते/लग्जरी गाड़ियाँ/ आलीशान भवन...कुछ नहीं है इस अदृश्य शत्रु के सामने...जो हमें अंत समय में भी हमारे अपनों को छूने की इज़ाज़त तक नहीं देता इसलिए एक ही रास्ता है हमारे पास कि हम इन योद्धाओं/फरिश्तों का सम्मान करें,उनकी कर्तव्य परायणता का आदर करें,उनकी व्यक्तिगत तकलीफों को समझे,उनकी और उनके परिवार की भावनाओं को महसूस करें और निःसंकोच अपनी जांच/उपचार करने दें क्योंकि हम जीवित रहेंगे तभी सुख-सुविधाओं का भोग और धरती का उपभोग कर पाएंगे वरना यह महामारी अमेरिका-इटली-फ़्रांस की तरह एक एक कर हमें लीलती जाएगी. ये देश तो अपने संसाधनों के दम पर और नियंत्रित आबादी के कारण किसी तरह स्वयं को संभाल लेंगे लेकिन हमारे यहाँ यदि यह महामारी ने सुरसा के मुख की तरह फैलना शुरू कर दिया तो हम में से हर एक रक्तबीज बन जायेगा और फिर कोई दैवीय शक्ति ही हमें बचा सकती है.

RB

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संजीव शर्मा

मीडिया की दुनिया में बीते 28 सालों से सक्रिय...देशबंधु, नवभारत और एक्सप्रेस मीडिया सर्विस और रक्षा मंत्रालय की पत्रिका 'सैनिक समाचार' का संपादन। अब आकाशवाणी भोपाल में समाचार संपादक के तौर पर सम्मानजनक गुजर-बसर की ज़द्दोजहद।