गुरूअों के सम्मान में घर-घर ताली बजवाने का यह कैसा ‘स्वस्ति वाचन’ ?

गुरूअों के सम्मान में घर-घर ताली बजवाने का यह कैसा ‘स्वस्ति वाचन’ ?

यह कटाक्ष है, कटु सत्य है या फिर मध्‍यप्रदेश की शिक्षा और उसके कर्ता-धर्ताअों का मानसिक स्तर कि राज्य में शिक्षा की उत्कृष्टता का पैमाना अब ताली बजाना है। प्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री विजय शाह के दिल की बात शिक्षक दिवस अनायास ही जबां पर आ गई। मौका भोपाल में आयोजित राज्य स्तरीय ‍िशक्षक सम्मान समारोह का था। राज्यपाल इसकी मुख्‍य अतिथि थीं। इस औपचारिक और गरिमामय समारोह राज्य के राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों का सम्मान होता है। शिक्षकों को गुरू मानकर समाज उनके ऋण का स्मरण करता है। यह घड़ी शिक्षकों के प्रति समाज के कृतज्ञता ज्ञापन की होती है। लेकिन इस बार यह पल शिक्षकों को नसीहत देने का भी था। जिस भाषा, तेवर और कटाक्ष के साथ जो कुछ कहा गया, उससे समझा जा सकता है कि बेसिक माने जाने वाली स्कूली शिक्षा के सूत्र किन हाथों में हैं, किस सोच और संकल्प के हाथो में हैं। यह भी खुलासा हुआ कि शिक्षकों के सम्मान में ताली बजाना अनिवार्य है। क्योंकि बकौल ‍िशक्षा मंत्री विजय शाह ऐसा न किया तो अगले जन्म में शिक्षकों को घर-घर जाकर ताली बजानी पड़ेगी। मंत्री के कहने पर समारोह में मौजूद शिक्षकों ने मजबूरी में तालियां बजाईं जरूर, लेकिन उनके चेहरों में खुशी से ज्यादा हैरानी और क्षोभ का भाव था।

मध्यप्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री विजय शाह को अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाना जाता है। एक बार तो मंच से महिला को लेकर की गई अभद्र टिप्पणी के बाद उन्हें कुर्सी गंवानी  पड़ी थी। हालांकि बाद में पार्टी को उनकी जरूरत महसूस हुई तो टिकट दिया गया, शाह जीते और नई सरकार में फिर मंत्री बने। यानी विवादित बयानों  का सिलसिला अक्षुण्ण रहा। अभी कुछ ही दिन पहले राज्य के अतिथि शिक्षकों द्वारा अपनी मांगों के समर्थन में चलाए जा रहे आंदोलन पर शाह ने इन शिक्षकों को ‘टाइमपास व्यवस्था’ बताया था। शाह नेताअों को भी नहीं छोड़ते। वरिष्ठ कांग्रेस नेता बाला बच्चन को उन्होंने चुनावी सभा में एक बार ‘कोची मुर्गी’ कहा था। कोची मतलब बांझ, ऐसी मुर्गी जो अंडे देती नहीं बल्कि खाने के काम आती है। कुछ दिन पूर्व विजय शाह ने एक ‘खुलासा’ भी किया था कि मुस्लिम युवक आदिवासी लड़कियों को बहकाकर उनसे शादी कर रहे हैं।

जाहिर है कि शाह अपने अजीबो-गरीब बयानों पर लोगोi से अपेक्षा रखते हैं कि वो खुश होकर तालियां बजाएं। उनकी अक्लमंदी की दाद दें। उनके ‘सेंस आॅफ ह्यूमर’ को एप्रिशिएट करें। बहरहाल यहां मुद्दा शिक्षकों से शिक्षकों के लिए तालियां बजवाने का है। ‍उत्कृष्ट शिक्षकों के राज्यस्तरीय सम्मान समारोह में मंत्रीजी गुरू की महिमा का बखान अपने ढंग से कर रहे थे। उन्होंने कहा कि गुरू गोविंद (ईश्वर) से भी बड़ा होता है। लिहाजा गुरू के सम्मान में ताली बजनी ही चाहिए। शिक्षा मं‍त्री के इस आग्रहनुमा आदेश को श्रोताअों ने संभवत: मजाक समझा और हाल में चुटकी भर तालियां ही बजीं। इससे खफा मंत्रीजी ने कहा कि  'मैं देख रहा हूं हमारे कुछ साथी ताली बजा नहीं रहे हैं, केवल हाथ हिलाकर ताली बजाने का बहाना कर रहे हैं।' उन्होंने चेतावनी के लहजे में कहा कि 'अगर गुरु के सम्मान में आपने तालियां नहीं बजाईं, तो अगले जन्म में घर-घर जाकर तालियां बजाना पड़ेगा।' इसके बाद उन्होंने सभी मौजूद लोगों से तालियां बजवाईं और तालियों की गड़गड़ाहट  सुनकर संतुष्टि जताई कि  'इसका मतलब है कि कोई अगले जन्म में घर-घर जाकर तालियां नहीं बजाना चाहता।

विचारणीय बात यह है कि मंत्री शाह ने शिक्षकों के सम्मान को तालियों की गड़गड़ाहट में ही क्यों बूझा? दूसरे,  इस जन्म में गुरू की महिमा का स्वीकार तालियों से नहीं किया तो अगले जन्म में घर-घर जाकर ताली बजाने की विवशता का क्या अर्थ है? ऐसा कहकर शिक्षा मंत्री कौन सी नई शिक्षा देना चाह रहे थे? क्या गुरू का स्वीकरण ताली पीटने तक सीमित है? अमूमन समाज में ताली बजाने का अर्थ यही है कि आप किसी व्यक्ति का स्वागत, सम्मान कर रहे हैं। उसके प्रति आदर प्रकट कर रहे हैं। किसी बात पर दाद दे रहे हैं, किसी को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ताल दे रहे हैं या फिर जोशीला समर्थन कर रहे हैं। इस हिसाब से गुरू के सम्मान में ताली बजाना, उसके प्रति आदर प्रकट करने का सभ्य तरीका ही है। लेकिन ताली न बजाने पर अगले जनम में घर-घर ताली पीटने के कई अर्थ हैं। यह उस किन्नर समुदाय  पर भी परोक्ष कटाक्ष है, जो ताली ठोक कर अपनी भावनाएं व्यक्त करता है। यह उनकी जीवन शैली का हिस्सा है। तो क्या मंत्री ताली न बजाने वालों को कोई ‘श्राप’ दे रहे थे? कोई शिक्षा मंत्री अपने अधीनस्थ शिक्षकों को लेकर ऐसा ‘स्वस्ति वाचन’ कैसे कर सकता है? इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि किसी मंत्री को अपनी ही बातों पर ताली बजवाने का आदेश देना पड़े। राजनीतिक सभाअों में कई बार प्रायोजित तालियां बजती हैं। लेकिन आम तौर पर ताली किसी सार्थक या सुंदर बात पर ही बजाने का रिवाज है।  लेकिन क्या शिक्षा मंत्री  की हिमाकत पर भी  आप ताली बजाना चाहेंगे? 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।